UP Board Solutions for Class 9 Hindi Chapter 7 ठेले पर हिमालय (गद्य खंड)

In this chapter, we provide UP Board Solutions for Class 9 Hindi Chapter 7 ठेले पर हिमालय (गद्य खंड), Which will very helpful for every student in their exams. Students can download the latest UP Board Solutions for Class 9 Hindi Chapter 7 ठेले पर हिमालय (गद्य खंड) pdf, free UP Board Solutions Class 9 Hindi Chapter 7 ठेले पर हिमालय (गद्य खंड) book pdf download. Now you will get step by step solution to each question. Up board solutions Class 9 Hindi पीडीऍफ़

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. निम्नांकित गद्यांशों में रेखांकित अंशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या और तथ्यपरक प्रश्नों के उत्तर दीजिये-
(1)
ठेले पर बर्फ की सिलें लादे हुए बर्फ वाला आया। ठण्डे, चिकने, चमकते बर्फ से भाप उड़ रही थी। मेरे मित्र का जन्म स्थान अल्मोड़ा है, वे क्षण भर उस बर्फ को देखते रहे, उठती हुई भाप में खोये रहे और खोये-खोये से ही बोले, “यही बर्फ तो हिमालय की शोभा है।” और तत्काल शीर्षक मेरे मन में कौंध गया, ‘ठेले पर हिमालय’ । पर आपको इसलिए बता रहा हूँ कि अगर आप नये कवि हों तो भाई, इसे ले जायँ और इस शीर्षक पर दो-तीन सौ पंक्तियाँ बेडौल-बेतुकी लिख डालें-शीर्षक मौजूं है और अगर नयी कविता से नाराज हों, सुललित गीतकार हों तो भी गुंजाइश है, इस बर्फ को डाँटें, “उतर आओ। ऊँचे शिखर पर बन्दरों की तरह क्यों चढ़े बैठे हो? ओ नये कवियो! ठेले पर लादो । पान की दुकानों पर बिको।”
प्रश्न
(1)
उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) हिमालय की शोभा क्या है?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ के ठेले पर हिमालय’ नामक पाठ से उद्धत है। इसके लेखक डॉ० धर्मवीर भारती जी हैं। प्रस्तुत अवतरण में लेखक ने बर्फ का वर्णन किया है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- ठेले पर लदे हुए बर्फ को देखकर लेखक कहता है कि एक मेरा मित्र है जिनका जन्मस्थान अल्मोड़ा है। वे पल भर उसे बर्फ को एकटक देखते रहे। बर्फ से उठती हुई भाप को देखकर वे बोले कि ‘यही बर्फ तो हिमालय की शोभा है’। मेरे मन में तुरन्त यह शीर्षक प्रवेश कर गया, ‘ठेले पर हिमालय।’ मैं आपको इसलिए बताना उचित समझता हूँ कि यदि आप एक नये कवि हों तो आप इसे ले जायें और इस पर दो-तीन सौ पंक्तियों में रचना कर दीजिए। यह शीर्षक बहुत ही रुचिकर है। यदि आपकी नयी कविता में रुचि नहीं है और सुललित कवि हैं तो झड़प लगावें कि नीचे उतर जाइये। ऊँचे शिखर पर बन्दरों की भाँति क्यों बैठे हो। ठेले पर चढ़ो और चाय, पान आदि की दुकानों पर बिको ।
  3. हिमालय की शोभा बर्फ है।

(2) सच तो यह है कि सिर्फ बर्फ को बहुत निकट से देख पाने के लिए ही हम लोग कौसानी गये थे। नैनीताल से रानीखेत और रानीखेत से मझकाली के भयानक मोड़ों को पार करते हुए कोसी । कोसी से एक सड़क अल्मोड़ा चली जाती है, दूसरी कौसानी। कितना कष्टप्रद, कितना सूखी और कितना कुरूप है वह रास्ता । पानी का कहीं नाम-निशान नहीं, सूखे भूरे पहाड़, हरियाली का नाम नहीं । ढालों को काटकर बनाये हुए टेढ़े-मेढ़े खेतं, जो थोड़े से हों तो शायद अच्छे भी लगें, पर उनको एकरस सिलसिला बिल्कुल शैतान की आँत मालूम पड़ता है।
प्रश्न
(1)
उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) बर्फ को पास से देखने के लिये लेखक कहाँ गया?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में धर्मवीर भारती द्वारा लिखित ‘ठेले परे हिमालय’ से लिया गया है। लेखक बर्फ को निकट से देखने के लिए कौसानी जाता है। वह रास्ते में पड़े मुख्य दृश्यों का वर्णन करता है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक बताता है कि कौसानी जाने के लिए नैनीताल से रानीखेत जाना पड़ता है। और रानीखेत से मझकाली के दुर्गम मोड़ों को पार करते हुए एक रास्ता कोसी जाता है। कोसी से एक सड़क अल्मोड़ा को जाती है और दूसरी सड़क कौसानी को जाती है। यह मार्ग अत्यन्त कष्टप्रद और दुर्गम है। मार्ग में पानी कहीं नहीं दिखायी पड़ता है। सूखे-सूखे पहाड़ दिखायी पड़ते हैं। हरे-भरे दृश्य देखने को मन तरस जाता है। ढालों को काटकर टेढ़े-मेढ़े खेत तैयार किये जाते हैं, जो देखने में अच्छे नहीं लगते हैं।
  3. बर्फ को पास से देखने के लिये लेखक कौसानी गया।

(3) कौसानी के अड्डे पर जाकर बस रुकी। छोटा-सा, बिल्कुल उजड़ा-सा गाँव बर्फ का तो कहीं नाम-निशान नहीं। बिल्कुल ठगे गये हम लोग। कितना खिन्न था मैं, अनखाते हुए बस से उतरा कि जहाँ था वहीं पत्थर की मूर्ति-सा स्तब्ध खड़ा रह गया। कितना अपार सौन्दर्य बिखरा था, सामने की घाटी में। इसे कौसानी की पर्वतमाला ने अपने अंचल में यह जो कत्यूर की रंग-बिरंगी घाटी छिपा रखी है; इसमें किन्नर और यक्ष ही तो वास करते होंगे। पचासों मील चौड़ी यह घाटी, हरे मखमली कालीनों जैसे खेत, सुन्दर गेरू की शिलाएँ काटकर बने हुए लाल-लाल रास्ते, जिनके किनारेकिनारे सफेद-सफेद पत्थरों की कतार और इधर-उधर से आकर आपस में उलझ जानेवाली बेलों की लड़ियों-सी नदियाँ। मन में बेसाख्ता यहाँ आया कि इन बला की लड़ियों को उठाकर कलाई में लपेट लें, आँखों से लगा हूँ।
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) कौन-सी घाटी थी, जिसमें अनन्त सौन्दर्य बिखरा पड़ा था?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यावतरण डॉ० धर्मवीर भारती द्वारा रचित ‘ठेले पर हिमालय’ नामक यात्रा-वृत्तान्त से उद्धृत है। यह यात्रा-वृत्तान्त हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में संकलित है। यहाँ नैनीताल से कौसानी तक की यात्रा का वर्णन अत्यन्त रोचक ढंग से किया गया है तथा कौसानी की पर्वत-श्रृंखला के आसपास के सौन्दर्य की झाँकी प्रस्तुत की गयी है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- धर्मवीर भारती कहते हैं कि कौसानी के सामने की घाटी के सौन्दर्य और उसके आकर्षण से खिंचा हुआ मैं मन्त्रमुग्ध-सा उसे देखता रहा। वह कत्यूर घाटी थी, जिसमें अनन्त सौन्दर्य बिखरा पड़ा था। जिस प्रकार कोई सुन्दरी अपने सौन्दर्य को अपने आँचल में छिपाकर रखती है, उसी प्रकार कौसानी की इस पर्वत-श्रृंखला ने कत्यूर घाटी के सौन्दर्य को छिपा रखा था। कत्यूर घाटी के सौन्दर्य में जो आकर्षण है, उससे आकर्षित होकर निश्चय ही प्रेम, सौन्दर्य तथा संगीत के उपासक यक्ष और किन्नर यहाँ आते रहते होंगे। तात्पर्य यह है कि इस कत्यूर घाटी के सौन्दर्य से आकर्षित होकर देवता भी यहाँ आने के लिए उत्सुक रहे। होंगे। यह घाटी लगभग पचास मील चौड़ी है। इस घाटी में हरे-भरे खेत भी हैं, जो हरी मखमली चादर के समान प्रतीत होते हैं। यहाँ गेरू की लाल-लाल शिलाएँ काटकर रास्ते बनाये गये हैं, जो लाल रंग के हैं और अत्यन्त आकर्षक लगते हैं। इन लाल-लाल रास्तों के किनारे सफेद पर्वत खड़े हैं, जो ऐसे लगते हैं मानो सफेद रंग की कोई रेखा खींचे दी गयी हो। उलझी हुई बेलों की लड़ियों के समान नदियाँ वहाँ गॅथी हुई प्रतीत होती हैं। इस सौन्दर्य ने मेरा मन मोह लिया और सहसा मेरे मन में यह विचार आया कि इन बेलों की लड़ियों को उठाकर, अपनी कलाई में लपेटकर आँखों से लगा लूंगा।
  3. कत्यूर घाटी में अनन्त सौन्दर्य बिखरा पड़ा था।

(4) हिमालय की शीतलता माथे को छू रही है और सारे संघर्ष, सारे अन्तर्द्वन्द्व, सारे ताप जैसे नष्ट हो रहे हैं। क्यों पुराने साधकों ने दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों को ताप कहा था और उसे नष्ट करने के लिए वे क्यों हिमालय जाते थे, यह पहली बार मेरी समझ में आ रहा था और अकस्मात् एक दूसरा तथ्य मेरे मन के क्षितिज पर उदित हुआ। कितनी, कितनी पुरानी है यह हिमराशि । जाने किस आदिम काल से यह शाश्वत, अविनाशी हिम इन शिखरों पर जमा हुआ। कुछ विदेशियों ने इसीलिए इस हिमालय की बर्फ को कहा है-चिरन्तन हिम।
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) कुछ विदेशियों ने हिमालय की बर्फ को चिरन्तन हिम क्यों कहा है?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में धर्मवीर भारती द्वारा रचित ‘ठेले पर हिमालय’ नामक पाठ से लिया गया है। इन पंक्तियों में लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि प्राचीनकाल से साधकों के हिमालय पर जाने का क्या प्रयोजन था?
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक स्पष्ट करता है कि पुराने साधकों ने दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों को ताप की संज्ञा दी थी और वे इस कष्ट से मुक्त होने के लिए हिमालय जाते थे। यह बात मेरी समझ में आयी । हिमालय तापे का नाशक और शीतलता का सूचक है। एकाएक मेरे मन में यह विचार आया कि यह हिमराशि कितनी पुरानी है, न जाने किस काल से यह उत्तुंग शिखरों पर जमा हुआ है। इसीलिए विदेशियों ने हिमालय की बर्फ को चिरंतन हिम की संज्ञा प्रदान की है।
  3. न जाने किस आदिम काल से यह शाश्वत, अविनाशी हिम इन शिखरों पर जमा हुआ। कुछ विदेशियों ने इसीलिए इस हिमालय की बर्फ को चिरन्तन हिम भी कहा है।

(5) सूरज डूबने लगा और धीरे-धीरे ग्लेशियरों में पिघली केसर बहने लगी। बर्फ कमल के लाल फूलो में बदलने लगी, घाटियाँ गहरी नीली हो गयीं। अँधेरा होने लगा तो हम उठे और मुँह-हाथ धोने और चाय पीने में लगे। पर सब चुपचाप थे, गुमसुम जैसे सबका कुछ छिन गया हो या शायद सबको कुछ ऐसा मिल गया हो, जिसे अन्दर-ही-अन्दर सहजेने में सब आत्मलीन हो अपने में डूब गये हों।
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) किस समय बर्फ कमल के लाल फूलों में बदलने सी प्रतीत होने लगी?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में धर्मवीर भारती द्वारा रचित ‘ठेले पर हिमालय’ नामक पाठ से लिया गया है। प्रस्तुत अवतरण में लेखक ने कौसानी की सायंकालीन बेला का चित्रण किया है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक कहता है कि जब सूर्य अस्त होने का समय आया तो ग्लेशियरों में पिघली केसर प्रवाहित होने लगी। बर्फ कमल के लाल फूलों में बदलने-सी प्रतीत होने लगी और घाटियाँ नीली दिखायी पड़ने लगीं। अँधेरा हो गया। मैं उठा और हाथ-मुँह धोकर चाय पीने लगा। उस समय का वातावरण बिल्कुल शान्त था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सबका सर्वस्व छिन गया हो या सभी को सब कुछ मिल गया हो और ऐसा लग रहा था जैसे सभी अन्दर-अन्दर संजोने में तल्लीन होकर आत्मविभोर हो गये हों। यह दृश्य अत्यन्त मनमोहक था।
  3. सूर्य अस्त के समय बर्फ कमल के लाल फूलों में बदलने सी प्रतीत होने लगी।

(6) आज भी उसकी याद आती है तो मन पिरा उठता है। कल ठेले के बर्फ को देखकर मेरे मित्र उपन्यासकार जिस तरह स्मृतियों में डूब गये, उसे दर्द को समझता हूँ और जब ठेले पर हिमालय की बात कहकर हँसता हूँ तो वह उस दर्द को भुलाने का ही बहाना है। ये बर्फ की ऊँचाइयाँ बार-बार बुलाती हैं और हम हैं कि चौराहों पर खड़े ठेले पर लदकर निकलने वाली बर्फ को ही देखकर मन बहला लेते हैं। किसी ऐसे क्षण में ऐसे ही ठेलों पर लदे हिमालयों से घिरकर ही तो तुलसी ने कहा था-‘कबहुँक हैं यदि रहिन रहगो’-मैं क्या कभी ऐसे भी रह सकेंगा, वास्तविक हिमशिखरों की ऊँचाइयों पर?
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) किसने हिमालय के शिखरों पर रहने की इच्छा व्यक्त की है?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश धर्मवीर भारती द्वारा लिखित ‘ठेले पर हिमालय’ नामक पाठ से अवतरित है। इस अवतरण में लेखक कहता है कि मुझे बार-बार हिमालय का स्मरण आता है। हिमालय की ऊँचाइयों को देखने की इच्छा उसके मन में बार-बार उत्पन्न होती है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक कहता है कि आज भी जब हिमालय की याद आती है तो मन दर्द के मारे कराह उठता है। मेरे उपन्यासकार मित्र ठेले की बर्फ को देखकर स्मृतियों में डूब जाते थे। जब हिमालय का वास्तविक दर्शन होता तो क्या स्थिति होती। मैं उनके इस दर्द को भली-भाँति समझता हूँ। बर्फ की ऊँचाइयों को देखकर ऐसा मालूम होता है जैसे वे मुझे बुला रही हैं। हम ठेले पर लदे बर्फ को ही देखकर मन बहला लेते हैं। तुलसी ने भी हिमालय के शिखरों पर रहने की अपनी इच्छा व्यक्त की थी। उन्हें भी हिमालय की ऊँची-ऊँची शिखरों से बेहद लगाव था।
  3. तुलसी ने भी हिमालय के शिखरों पर रहने की इच्छा व्यक्त की है।

प्रश्न 2. डॉ० धर्मवीर भारती की जीवनी एवं कृतियों का उल्लेख कीजिए।

प्रश्न 3. डॉ० धर्मवीर भारती के साहित्यिक अवदान एवं भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।

प्रश्न 4. डॉ० धर्मवीर भारती का जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डालिए।
अथवी डॉ० धर्मवीर भारती का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा डॉ० धर्मवीर भारती के लेखन की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

डॉ० धर्मवीर भारती
( स्मरणीय तथ्य )

जन्म- 25 दिसम्बर, सन् 1926 ई० । मृत्यु- 4 सितम्बर, सन् 1997 ई० । जन्म-स्थान– इलाहाबाद (उ० प्र०) ।
शिक्षा- प्रयाग में । प्रयाग विश्वविद्यालय से पी-एच०डी० की उपाधि ।
रचनाएँ-काव्य- ‘ठण्डा लोहा’, ‘कनुप्रिया’, ‘सात गीत वर्ष’ और ‘अन्धायुग’।
कहानी संग्रह- चाँद और टूटे हुए लोग।
नाटक- नदी प्यासी थी, नीली झील (एकांकी संग्रह)।
उपन्यास- ‘गुनाहों का देवता’ और ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’।
समीक्षा-साहित्य- मानव मूल्य और साहित्य। सम्पादन- ‘संगम’ और ‘धर्मयुग’।
साहित्य-सेवा- कवि के रूप में, गद्य लेखक के रूप में एवं सम्पादक के रूप में।
भाषा- शुद्ध परिमार्जित खड़ीबोली । संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू के प्रचलित शब्दों का प्रयोग।
शैली- विषयानुकूल, शैली में पर्याप्त विविधता ।
अलंकार योजना- उपमा, मानवीकरण, रूपक तथा रूपकातिशयोक्ति।

  • जीवन-परिचय- आधुनिक हिन्दी के सशक्त कथाकार एवं ललित निबन्धकार डॉ० धर्मवीर भारती का जन्म इलाहाबाद में 25 दिसम्बर, सन् 1926 ई० को हुआ था। इन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम० ए० करने के पश्चात् पी-एच० डी० की उपाधि प्राप्त की। कुछ समय तक प्रयाग से निकलने वाले साप्ताहिक हिन्दी पत्र ‘संगम’ का सम्पादन किया तथा कुछ वर्षों तक प्रयाग विश्वविद्यालय में हिन्दी के अध्यापक भी रहे। सन् 1958 ई० में वे मुम्बई से प्रकाशित होनेवाले प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्र ‘धर्मयुग’ के सम्पादक हो गये। पत्रकारिता के प्रयोजन से आपने देश-विदेश का भ्रमण भी किया है। भारत सरकार ने सन् 1972 ई० में उनकी हिन्दी-सेवाओं एवं हिन्दी पत्रकारिता के लिए ‘पद्मश्री’ से अलंकृत कर सम्मानित किया। उन्होंने ‘धर्मयुग’ पत्रिका का सफलतापूर्वक सम्पादन किया। हिन्दी के यशस्वी साहित्यकार एवं ‘अंधायुग’ एवं ‘गुनाहों का देवता’ जैसी लोकप्रिय पुस्तकों के प्रणेता डॉ० धर्मवीर भारती का निधन 4 सितम्बर, सन् 1997 ई० को हो गया।
  • रचनाएँ-भारती जी की प्रतिभा बहुमुखी थी। इन्होंने कविता, नाटक, उपन्यास, कहानी आदि सभी कुछ लिखा है। इनकी रचनाएँ निम्न हैं –
  • काव्य- ‘ठण्डा लोहा’, ‘कनुप्रिया’, ‘सात गीत वर्ष’ और ‘अंधायुग’।
    1. निबन्ध-संग्रह-‘कहानी-अनकहनी’, ‘ठेले पर हिमालय’ और ‘पश्यन्ती’ आदि।
    2. उपन्यास- ‘गुनाहों का देवता’ और ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’।
    3. नाटक और एकांकी संग्रह- ‘नदी प्यासी थी’, ‘नीली झील’।
    4. कहानी- संग्रह-‘चाँद और टूटे हुए लोग।
    5. आलोचना- ‘मानव मूल्य और साहित्य’ ।
    6. सम्पादन- ‘संगम’ और ‘धर्मयुग’।
    7. अनुवाद- ‘देशान्तर’।
  • भाषा- भारती जी की भाषा शुद्ध तथा परिमार्जित खड़ीबोली है। नवीन शिल्प के प्रतिनिधि लेखक होने के नाते ये भावों को प्रकट करने के लिए किसी विशेष भाषा-शैली का मुँह नहीं ताकते। अत: इनकी भाषा में संस्कृत (मूर्ति, स्तब्ध, सहयोगी आदि), अंग्रेजी (कैमरा, अकादमी, थर्मस, शेड आदि), उर्दू (खासा, दिलचस्प, यकीन, गुंजाइश आदि) के प्रचलित शब्दों तथा देशज शब्दों और मुहावरों (शैतान की आँख, चाँद-तारों से बात करना) आदि का खुलकर प्रयोग हुआ है।
  • साहित्यिक विशेषताएँ- डॉ० धर्मवीर भारती एक प्रतिभाशाली कवि, कथाकार, नाटककार एवं ललित निबन्धकार थे। इनकी कविताओं में रागतत्त्व, कहानियों और उपन्यासों में सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्याओं को लेकर बड़े जीवन्त चरित्र प्रस्तुत किये गये हैं। डॉ० भारती में किसी भी दृश्य को शब्दों की सीमा में बाँधकर उसमें चित्रमयता प्रदान करने की अद्भुत क्षमता थी। समय-समय पर आपने जो संस्मरण, रेखाचित्र तथा ललित निबन्ध लिखे थे उनके माध्यम से हिन्दी में एक प्रयोग के संकेत मिलते हैं। इन्होंने अन्य भाषाओं की कुछ प्रसिद्ध रचनाओं के भी अनुवाद प्रस्तुत किये हैं।
  • भाषा और शैली- डॉ० भारती की भाषा अत्यन्त ही सरल, स्वाभाविक एवं प्रवाहपूर्ण है। उसमें विचारों की अभिव्यक्ति की अद्भुत क्षमता होने के साथ-साथ मधुर काव्यमयता है। भाषा ओज और प्रसाद गुणों से सम्पन्न है। लाक्षणिकता एवं व्यंग्य पुटों से भाषा और भी जीवन्त हो गयी है। डॉ० भारती की भाषा में देशज और अंग्रेजी-उर्दू आदि भाषाओं के शब्दों को हिन्दी में प्रयोग कर उन्हें पचा लेने की अद्भुत क्षमता थी। डॉ० भारती के गद्य की शैली वर्णनात्मक और विवरणात्मक दोनों प्रकार की हैं। संस्मरण, रेखाचित्र तथा यात्रा-विवरणों में विवरणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है। रिपोर्ताज में वर्णनात्मक शैली प्रयुक्त हुई है। उक्त सभी विधाओं में आत्मव्यंजक शैली भी प्रयोग में लायी गयी है।

( लघु उत्तरीय प्रश्न )

प्रश्न 1. कौसानी की यात्रा में नैनीताल से कोसी तक लेखक का सफर कैसा रहा?
उत्तर- कौसानी की यात्रा में नैनीताल से कोसी तक लेखक का सफर कष्टप्रद था। भयानक-भयानक मोड़ थे और ऊबड़खाबड़ मार्ग था ।

प्रश्न 2. कोसी के आगे जो बदलाव आया उसका मुख्य कारण क्या था?
उत्तर- कोसी के आगे जो बदलाव आया उसका मुख्य कारण था कि प्रसन्नवदन शुक्ल जी मिल गये और उनकी सारी थकान दूर हो गयी।

प्रश्न 3. कौसानी पहुँचने पर पहले लेखक को अवाक् मूर्ति-सा स्तब्ध कर देने वाला कौन-सा दृश्य दिखायी दिया?
उत्तर- कौसानी के अड्डे पर बस रुकने पर जब लेखक को वहाँ एक उजड़ा-सा गाँव दिखा तो वह खिन्न हो उठा। वहाँ बर्फ का कहीं नामोनिशान तक नहीं था। लगता था जैसे लेखक ठगा गया हो लेकिन जब वह बस से नीचे उतरा तो वह जहाँ था वहाँ पत्थर की मूर्ति-सा स्तब्ध खड़ा रह गया यह देखकर कि सामने की घाटी में तो अपार सौन्दर्य बिखरा पड़ा है।

प्रश्न 4. कत्यूर घाटी के पार बादलों की ओट के बीच से दिखता हिमालय का एक श्रृंग उसे कैसा लगा? |
उत्तर- कत्यूर घाटी के पास बादलों की ओट के बीच से दिखता हिमालय का एक श्रृंग लेखक को ऐसा दिखा जैसे वह खिड़की से झाँक रहा है। लेखक प्रसन्नता से चीख उठा ‘बरफ’। सभी ने देखा लेकिन अकस्मात् वह फिर लुप्त हो गया।

( अतिलघु उत्तरीय प्रश्न )

प्रश्न 1. धर्मवीर भारती की दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर- धर्मवीर भारती की दो रचनाएँ- (1) गुनाहों का देवती, (2) सूरज का सातवाँ घोड़ा।

प्रश्न 2. धर्मवीर भारती किस युग के लेखक हैं?
उत्तर- धर्मवीर भारती आधुनिक युग के लेखक हैं।

प्रश्न 3. धर्मवीर भारती का जन्म कब हुआ था?
उत्तर- धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसम्बर सन् 1926 ई० को इलाहाबाद में हुआ था।

प्रश्न 4. हिमालय की शोभा क्या है? |
उत्तर- हिमालय की शोभा बर्फ है।

प्रश्न 5. हिम श्रृंग के क्षणिक दर्शन का उस पर क्या प्रभाव हुआ?
उत्तर- हिम श्रृंग के क्षणिक दर्शन से लेखक की सारी खिन्नता, निराशा, थकावट छुमन्तर हो गयी।

प्रश्न 6. पूरी हिम-श्रृंखला देखने पर लेखक के मन में कैसे भाव उदित हुए?
उत्तर- हिमालय की शीतलता लेखक के माथे को छू रही थी। लेखक के मन में भाव उत्पन्न हुआ कि पुराने साधक लोग दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों को नष्ट करने के लिए हिमालय की शरण में आते थे।

प्रश्न 7. रात होने पर चाँद दिखायी दिया तब लेखक को क्यों लगने लगा कि जैसे उसका मन कल्पनाहीन हो गया हो?
उत्तर- जब चाँद निकला तो सब शान्त था, जैसे हिम सो रहा हो। लेखक को लगा जैसे उसका मन अत्यन्त कल्पनाहीन हो गया। इसी हिमालय को देखकर लेखक एवं कवियों ने अनेक रचनाएँ कर डालीं । लेखक कहता है-यह मेरा मन है कि मैंने एक पंक्ति भी नहीं लिखी।

प्रश्न 8. बैजनाथ पहुँचकर गोमती में स्नान करते हुए लेखक के मन में हिमालय के प्रति कैसे भाव जगते हैं?
उत्तर- बैजनाथ पहुँचकर गोमती में स्नान करते हुए लेखक के मन में अनेक भाव उत्पन्न हुए। उसे लगा जैसे गोमती की उज्ज्वल जलराशि में हिमालय की बर्फीली चोटियों की छाया तैर रही हो। लेखक कहता है कि पता नहीं उन शिखरों पर कैसे और कब पहुँचूँगा ।

व्याकरण-बोध

प्रश्न 1. निम्न में समास-विग्रह कीजिए और समास का नाम भी बताइए-
हिमालय, शीर्षासन, जलराशि, पर्वतमाला, तन्द्रालस, प्रसन्नवदन।
उत्तर-
हिमालय – हिम का आलय – षष्ठी तत्पुरुष समास
शीर्षासन – शीर्ष के द्वारा आसन – तृतीया तत्पुरुष समास
जलराशि – जल की राशि – षष्ठी तत्पुरुष समास
पर्वतमाला – पर्वत की माला – षष्ठी तत्पुरुष समास
तन्द्रालस – तन्द्रा से पूर्ण आलस –  तृतीया तत्पुरुष समास
प्रसन्नवदन – प्रसन्न वदन वाला – कर्मधारय समास

प्रश्न 2. इस पाठ के आधार पर भारती जी की भाषा-शैली पर एक लेख लिखिए।
उत्तर- भारती जी की भाषा परिष्कृत एवं परिमार्जित खड़ीबोली है। इनकी भाषा में सरलता, सजीवता और आत्मीयता को पुट है तथा देशज, तत्सम एवं तद्भव शब्दों का प्रयोग हुआ है। मुहावरों और कहावतों के प्रयोग से भाषा में गति और बोधगम्यता आ गयी है। विषय और विचार के अनुकूल भारती जी की इस रचना में भावात्मक, समीक्षात्मक, वर्णनात्मक, चित्रात्मक शैलियों के प्रयोग हुए हैं।

प्रश्न 3. निम्न शब्दों से प्रत्यय अलग कीजिए –
सुहावनापन, कष्टप्रद, शीतलता।
उत्तर- पन, प्रद, ता।

All Chapter UP Board Solutions For Class 9 Hindi

—————————————————————————–

All Subject UP Board Solutions For Class 9 Hindi Medium

*************************************************

I think you got complete solutions for this chapter. If You have any queries regarding this chapter, please comment on the below section our subject teacher will answer you. We tried our best to give complete solutions so you got good marks in your exam.

यदि यह UP Board solutions से आपको सहायता मिली है, तो आप अपने दोस्तों को upboardsolutionsfor.com वेबसाइट साझा कर सकते हैं।

Leave a Comment

Your email address will not be published.