UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. (शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन और उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवा)

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BoardUP Board
TextbookNCERT
ClassClass 11
SubjectPsychology
ChapterChapter 8
Chapter Name8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P.
(शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन और उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवा)
Number of Questions Solved68
CategoryUP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. (शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन और उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवा)

दीर्घ उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निर्देशन की परिभाषा निर्धारित कीजिए। निर्देशन की आवश्यकता, उपयोगिता एवं महत्त्व का भी उल्लेख कीजिए।
या
निर्देशन क्या होता है?
उत्तर :

निर्देशन की संकल्पना एवं अर्थ
(Concept and Meaning of Guidance)

सामाजिक व्यक्ति के जीवन में निर्देशन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। निर्देशन सामाजिक सम्पर्को पर आधारित एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें एक व्यक्ति को इस प्रकार से सहायता प्रदान की जाती है कि वह अपनी जन्मजात और अर्जित योग्यताओं व क्षमताओं को समझते हुए उनका अपनी समस्याओं की स्वतः समाधान करने में उपयोग कर सके। निर्देशन एक सुनियोजित तथा सुव्यवस्थित ढंग की विशिष्टं प्रक्रिया का नाम है जो दो प्रकार के व्यक्तियों के मध्य होती है-पहला वह व्यक्ति जो निर्देशन चाहता है तथा दूसरा अन्य व्यक्ति जो निर्देशन प्रदान करता है। क्योंकि जीवन की प्रत्येक अवस्था में समस्याओं का उदय स्वाभाविक है; अतः निर्देशन प्राप्त केरने वाला व्यक्ति किसी भी आयु-वर्ग से सम्बन्धित हो सकता है, किन्तु निर्देशन प्रदान करने वाला व्यक्ति प्राय: वयस्क, शिक्षित, समझदार तथा अनुभवी होता है। तत्सम्बन्धी क्षेत्र में ज्ञान और अनुभव से युक्त उस व्यक्ति को निर्देशनदाता अथवा परामर्शदाता (Counsellor) या निर्देशन मनोवैज्ञानिक (Guidance Psychologist) के नाम से सम्बोधित करते हैं। निर्देशन प्राप्त करने वाला और निर्देशन प्रदान करने वाला इन दोनों व्यक्यिों में व्यक्तिगत सम्पर्क (Personal Contact) के स्थापित होने के बाद ही निर्देशन प्रक्रिया शुरू होती है। इस प्रक्रिया को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया जा सकता है –

  1. सर्वप्रथम निर्देशक-मनोवैज्ञानिक, निर्देशन चाहने (प्राप्त करने) वाले व्यक्ति को विभिन्न मनोवैज्ञानिक विधियों द्वारा इस योग्य बनाने के लिए विशेष सहायता देता है कि जिससे वह अपनी निजी क्षमताओं, शक्तियों तथा योग्यताओं का भली प्रकार ज्ञान प्राप्त कर सके।
  2. अब उस व्यक्ति को यह मालूम कराया जाता है कि वे अपनी इन समस्त शक्तियों के माध्यम से क्या-क्या कार्य करने में सक्षम है।
  3. इसके साथ ही उस व्यक्ति को उसके वातावरण के तत्वों का यथासम्भव सम्पूर्ण ज्ञान भी कराया जाता है।
  4. निर्देशन प्राप्त करने वाले व्यक्ति को अपनी समस्याओं का विश्लेषण करने तथा उन्हें भली प्रकार समझने हेतु भी सहायता प्रदान की जाती है।
  5. अन्ततः व्यक्ति को यह ज्ञान मिल जाता है कि वह अपनी समस्त क्षमताओं, शक्तियों तथा योग्यताओं का किस भाँति सदुपयोग करे ताकि उसे अपनी समस्याओं का समुचित समाधान तलाशने में सुविधा रहे |

निर्देशन की परिभाषा

प्रमुख विद्वानों के अनुसार निर्देशन को अग्रलिखित रूप से परिभाषित किया जा सकता है –

(1) स्किनर के शब्दों में, “निर्देशने एक प्रक्रिया है जो कि नवयुवकों को स्वयं अपने से, दूसने से तथा परिस्थितियों से समायोजन करना सिखाती है।”

(2) जोन्स के अनुसार, “निर्देशन एक ऐसी व्यक्तिगत सहायता है जो एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को, जीवन के लक्ष्यों को विकसित करने व समायोजन करने और लक्ष्यों की प्राप्ति में आयी हुई समस्याओं को हल करने के लिए प्रदान की जाती है।”

(3) मॉरिस के मतानुसार, “निर्देशन व्यक्तियों की स्वयं अपने प्रयत्नों से सहायता करने की एक क्रिया है जिसके द्वारा वे व्यक्तिगत सुख और सामाजिक उपयोगिता के लिए अपनी समस्याओं का पता लगाते हैं तथा उनका विकास करते हैं।”

(4) हसबैण्ड के कथनानुसार, “निर्देशन को, व्यक्ति को उसके भावी जीवन के लिए तैयार करने तथा समाज में उसको अपने स्थान को उपयुक्त बनाने में सहायता देने की प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

(5) शिक्षा मन्त्रालय भारत सरकार के अनुसार, “निर्देशन एक क्रिया है जो व्यक्ति को शिक्षा, जीविका, मनोरंजन तथा मानव-क्रियाओं के समाज-सेवा सम्बन्धी कार्यों को चुनने, तैयार करने, प्रवेश करने तथा वृद्धि करने में सहायता प्रदान करती है।”

निर्देशन के सन्दर्भ में वर्णित उपर्युक्त परिभाषाओं से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि निर्देशन मनुष्य के कल्याण हेतु प्रदान की गयी एक प्रकार की सहायता है जिसमें कोई व्यक्ति अन्य को कुछ देता नहीं, अपितु सहायता प्राप्त करने वाले व्यक्ति को ही इस योग्य बना दिया जाता है कि वह व्यक्ति अपनी सहायता अपने आप करने में सक्षम हो सके।

निर्देशन की आवश्यकता, महत्त्व एवं उपयोगिता (लाभ)।
(Need, Importance and Utility of Guidance)

मनुष्य की अनन्त इच्छाओं ने उसकी आवश्यकताओं को बढ़ाकर उसके व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा व्यावसायिक जीवन में अभूतपूर्व संकट और जटिलता उत्पन्न कर दी है। इन्हीं कारणों से वर्तमान काल के सन्दर्भ में निर्देशन की आवश्यकता बढ़ती चली जा रही है। जीवन में निर्देशन की आवश्यकता हम निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत पाते हैं

(1) व्यक्ति के दृष्टिकोण से निर्देशन की आवश्यकता – मानव-जीवन की जटिलता ने पग-पग पर नयी-नयी समस्याओं और संकट-कालीन परिस्थितियों को जन्म दिया है। मनुष्य का कार्य-क्षेत्र विस्तृत हो रहा है और उसकी नित्यप्रति की आवश्यकताओं में वृद्धि हुई है। बढ़ती हुई आवश्यकताओं तथा आर्थिक विषमताओं ने मनुष्य को व्यक्तिगत, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से प्रभावित किया है। जीवन के हर एक क्षेत्र में समस्याओं के मोर्चे खुले हैं जिनसे निपटने के लिए भौतिक एवं मानसिक दृष्टि से निर्देशन की अत्यधिक आवश्यकता है।

(2) औद्योगीकरण से उत्पन्न समस्याएँ – मनुष्य प्राचीन समय में अधिकांश कार्य अपने हाथों से किया करता था, किन्तु आधुनिक युग मशीनों का युग’ कहा जाता है। तरह-तरह की मशीनों के अविष्कार से उद्योग-धन्धों का उत्पादन बढ़कर कई गुना हो गया है, किन्तु उत्पादन की प्रक्रिया जटिल-से-जटिल होती जा रही है। औद्योगिक जगत् के विस्तार से नये-नये मानव-सम्बन्ध विकसित हुए हैं जिनके मध्य सन्तुलन स्थापित करने की दृष्टि से निर्देशन बहुत आवश्यक है।

(3) नगरीकरण से उत्पन्न समस्याएँ – क्योंकि अधिकांश उद्योग-धन्धे तथा कल-कारखाने बड़े-बड़े नगरों में स्थापित हुए, इसलिए पिछले अनेक दशकों से लोगों का प्रवाह गाँवों से नगरों की ओर हुआ। नगरों में तरह-तरह की सुख-सुविधाओं, मनोरंजन के साधनों, शिक्षा की व्यवस्था, नौकरी के अवसर तथा सुरक्षा की भावना ने नगरों को आकर्षण का केन्द्र बना दिया। फलस्वरूप नगरों की संरचना में काफी जटिलता आने से समायोजन सम्बन्धी बहुत प्रकार की समस्याएँ भी उभरी हैं; अत: नगरीय जीवन से उपयुक्त समायोजन करने हेतु निर्देशन की परम आवश्यकता अनुभव होती है।

(4) जाति-प्रथा का विघटन – आजकल जाति और व्यवसाय का आपसी सम्बन्ध टूट गया है। इसका प्रमुख कारण जाति-प्रथा का विघटन है। पहले प्रत्येक जाति के बालकों को अपनी जाति के व्यवसाय का प्रशिक्षण परम्परागत रूप से उपलब्ध होता था। उदाहरणार्थ-ब्राह्मण का बेटा पण्डितई करता है, लोहार का बेटा लोहारी और बनिये का बेटा व्यापार। यह व्यवस्था अब लगभग समाप्त प्रायः हो गयी है। इन परिवर्तित दशाओं ने व्यवसाय के चुनाव तथा प्रशिक्षण, इन दोनों ही क्रियाओं के लिए निर्देशन को आवश्यक बना दिया है।

(5) व्यावसायिक बहुलता – वर्तमान समय में अनेक कारणों से व्यवसायों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप कार्य के प्रत्येक क्षेत्र में विशेषीकरण की समस्या भी बढ़ी है। व्यावसायिक बहुलता और विशेषीकरण के विचार ने प्रत्येक बालक और किशोर के सम्मुख यह एक गम्भीर समस्या खड़ी कर दी है कि वह इतने व्यवसायों के बीच से समय की माँग के अनुसार कौन-सा व्यवसाय चुने और चयनित व्यवसाय से सम्बन्धित प्रशिक्षण किस प्रकार प्राप्त करे। निश्चय ही, इस समस्या का हल निर्देशन से ही सम्भव है।

(6) मन के अनुकूल व्यवसाय का न मिलना – बेरोजगारी की समस्या आज न्यूनाधिक विश्व के प्रत्येक देश के सम्मुख विद्यमान है। हमारे देश में किसी नवयुवक के मनोनुकूल, अच्छा एवं उपयुक्त व्यवसाय मिल पाना अत्यन्त दुष्कर कार्य है। हर कोई उत्तम व्यवसाय प्राप्त करने की महत्त्वाकांक्षा रखता है, किन्तु रोजगार के अवसरों का अभाव उसे असफलता और निराशा के अतिरिक्त कुछ नहीं दे पाता। निराश, चिन्तित, तनावग्रस्त तथा उग्र बेरोजगार युवकों को सही दिशा दिखलाने की आवश्यकता है। उन्हें देश की आवश्यकताओं के अनुकूल तथा जीवन के लिए हितकारी शारीरिक कार्य करने की प्रेरणा देनी होगी। यह कार्य निर्देशन द्वारा ही सम्भव है।

(7) विशेष बालकों की समस्याएँ – विशेष बालकों से हमारा अभिप्राय पिछड़े हुए/मन्द बुद्धि या प्रतिभाशाली ऐसे बालकों से है जो सामान्य बालकों से हटकर होते हैं। ये असामान्य व्यवहार प्रदर्शित करते हैं तथा सामाजिक परिस्थितियों से स्वयं को आसानी से अनुकूलित नहीं कर पाते। कुसमायोजन के कारण इनके सामंते नित्यप्रति नयी-नयी समस्याएँ आती रहती हैं। ऐसे असामान्य एवं विशेष बालकों की समस्याएँ निर्देशन के माध्यम से ही पूरी हो सकती हैं।

(8) शैक्षिक विविधता सम्बन्धी समस्याएँ – शिक्षा के विविध क्षेत्रों में हो रहे अनुसन्धान कार्यों के कारण ज्ञान की राशि निरन्तर बढ़ती जा रही है जिससे एक ओर, ज्ञान की नवीन शाखाओं को जन्म हुआ है तो दूसरी ओर, हर सत्र में नये पाठ्यक्रमों का समावेश करना पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त, सामान्य शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त प्रत्येक बालक के सम्मुख यह समस्या आती है कि वह शिक्षा के विविध क्षेत्रों में से किस क्षेत्र को चुने और उसमें विशिष्टीकरण प्राप्त करे। समाज की निरन्तर बढ़ती हुई आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जो नये एवं विशेष व्यवसाय जन्म ले रहे हैं उनके लिए किन्हीं विशेष पाठ्य-विषयों का अध्ययन अनिवार्य है। विभिन्न व्यवसायों की सफलता भिन्न-भिन्न बौद्धिक एवं आर्थिक स्तर, रुचि, अभिरुचि, क्षमता व योग्यता पर आधारित है। व्यक्तिगत भिन्नताओं का ज्ञान प्राप्त करके उनके अनुसार बालक को उचित शैक्षिक मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए निर्देशन की अत्यधिक आवश्यकता है, क्योकि निर्देशन का अपना महत्त्व है।

(9) पाश्चात्य सभ्यता से समायोजन – आज के वैज्ञानिक युग में और क्षेत्रीय दूरी कम होने से पृथ्वी के दूरस्थ देश एवं उनकी सभ्यताएँ, अर्थात् संस्कृतियाँ, परम्पराएँ तथा रीति-रिवाज एक-दूसरे के काफी नजदीक आ गये हैं। अंग्रेजों के पदार्पण एवं शासन ने भारतीयों के मस्तिष्क पाश्चात्य सभ्यता में रँग डाले हैं। पश्चिमी देशों के भौतिकवादी आकर्षण ने भारतीय युवाओं को इस सीमा तक सम्मोहित किया है कि वे अपने पुराने रीति-रिवाज और परम्पराएँ भुला बैठे हैं और एक प्रकार से भारतीय मूल्यों की अवमानना व उपेक्षा हो रही है। इसमें असंख्य विसंगतियाँ तथा कुसमायोजन के दृष्टान्त दृष्टिगोचर हो रहे हैं। भारतीय युवाओं को इन परिस्थितियों में गम्भीर प्रतिकूल प्रभावों से बचाने के लिए समुचित निर्देशन की आवश्यकता है।

(10) यौन सम्बन्धी समस्याएँ – काम-वासना’ एक नैसर्गिक मूल-प्रवृत्ति है, जो युवावस्था में विषमलिंगी व्यक्तियों में एक-दूसरे के प्रति अपूर्व आकर्षण पैदा करती है। किन्तु समाज की मान-मर्यादाओं तथा रीति-रिवाजों की सीमाओं को लाँघकर पुरुष एवं नारी का पारस्परिक मिलन नाना प्रकार की अड़चनों से भरा है। समाज ऐसे मिलन का घोर विरोध करता है। आमतौर पर काम-वासना की इस मूल-प्रवृत्ति का अवदमन होने से व्यक्ति में ग्रन्थियाँ बन जाती हैं तथा उसका व्यवहार असामान्य हो जाता है। यौन सम्बन्धों के कारण जनित विकृतियों में सुधार लाने के लिए तथा व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से निर्देशन की आवश्यकता होती है।

(11) व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास – व्यक्तिगत एवं सामाजिक हित में मानव-शक्ति का सही दिशा में अधिकतम उपयोग अनिवार्य है जिसके लिए व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास की आवश्यकता है। बालकों के व्यक्तित्व के सर्वांगीण तथा सन्तुलित विकास के लिए उन्हें घर-परिवार, पास-पड़ोस, विद्यालय तथा समाज में प्रारम्भिक काल से ही निर्देशन प्रदान करने की अतीव आवश्यकता है।

प्रश्न 2.
समाज में समुचित निर्देशन व्यवस्था के अभाव की स्थिति में होने वाली हानियों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन का क्षेत्र अत्यधिक व्यापक और महत्त्वपूर्ण है। सम्यक् निर्देशन की सहायता से व्यक्ति का जीवन व्यवस्थित हो जाता है और अपनी समस्याओं को हल करके वह सुखी एवं सफल व्यक्ति के रूप में अपने उज्ज्वल भविष्य की रक्षा हेतु तत्पर होता है। इसके विपरीत, समुचित निर्देशन और परामर्श के अभाव में व्यक्ति का पूर्ण विकास नहीं हो पाता और वह अपनी क्षमताओं एवं योग्यताओं के अनुसार एक सफल नागरिक नहीं बन पाता है।

समुचित निर्देशन के अभाव में हानियाँ

अनिवार्यता के बावजूद भी समुचित निर्देशन प्रदान न करने की दशा में निम्नलिखित हानियाँ दृष्टिगोचर होती हैं –

(1) शारीरिक विकास एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी दोष – उचित निर्देशन के अभाव में शरीर में घर कर गयीं अनेक बीमारियाँ बढ़ती जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप शारीरिक बल तथा साहस का अभाव पाया जाता है। निर्देशन के अभाव में शारीरिक आकर्षण घटता जाता है। अत्यधिक लम्बे या छोटे कद के अतिरिक्त अनेक शारीरिक विकृतियों; यथा—हकलाना, तुतलाना, गूंगा-बहरा या अन्धापन, कुरूपता इत्यादि पर अंकुश न होने से ये बढ़ते ही जाते हैं।

(2) घर-परिवार विषयक समस्याओं में वृद्धि – माता-पिता में से किसी एक की मृत्यु, तलाक या परित्याग के कारण खण्डित हुए परिवार को दुष्प्रभाव सीधे बच्चों पर पड़ता है। उचित निर्देश न मिलने के कारण बालाकों में परस्पर ईष्र्या, द्वेष, मन-मुटाव, अपराध भावना तथा लड़ाई-झगड़ा व्याप्त रहता है। घुटन-भरा कलहपूर्ण वातावरण तथा सद्भाव की कमी बालक-बालिकाओं को घर छोड़ने पर मजबूर कर देते हैं जो बाहर निकलकर सामाजिक दोषों व आपराधिक जीवन के शिकार हो जाते हैं।

(3) व्यक्तित्व का असन्तुलित विकास – प्रायः देखने में आता है कि व्यक्तित्व के असन्तुलित विकास के कारण बालक में अत्यधिक लापरवाही, आत्मविश्वास की कमी, अत्यधिक घमण्ड तथा स्वार्थ, संवेगात्मक अस्थिरता, भ्रान्तियाँ, अधिक भावुकता, लज्जा एवं संकोच तथा प्रबल अरुचियाँ जन्मै ले बैठती हैं। समुचित निर्देशन के अभाव में ये समस्याएँ एवं दोष व्यक्तिगत और सामाजिक कुसमायोजन में वृद्धि करते हैं, जिसकी परिणति निराशा तथा असफल जीवन में होती है।

(4) विद्यालयी जीवन से सम्बन्धित विकास – प्राय: निर्देशन के अभाव में विद्यार्थीगण अपनी रुचि के अनुकूल एवं जीवनोपयोगी पाठ्य-विषयों का चयन नहीं कर पाते, जिसके परिणामस्वरूप उनको पाठ्य-विषयों में ध्यान नहीं लगता और मन उचटता रहता है। उनमें अनुशासनहीनता घर कर जाती है और वे पढ़ाई-लिखाई से बचकर कक्षा छोड़ने के आदी हो जाते हैं। जिन बालकों में पढ़ाई-लिखाई से सम्बन्धित गलत आदतें निर्मित हो जाती हैं, वे उचित निर्देशन के अभाव में स्वयं को विद्यालयी कार्यक्रमों से अभियोजित नहीं कर पाते, समय नष्ट करते रहते हैं, गृह कार्य करके नहीं लाते, मेहनत से जी चुराते हैं तथा फेल होने के भय से चिन्ताग्रस्त रहने लगते हैं।

(5) सामाजिक एवं नैतिक पतन – सम्यक् निर्देशन के अभाव में व्यक्ति सामाजिक एवं नैतिक पतन को प्राप्त होता है। अनेकानेक कारणों से बालक को असामाजिक प्रवृत्तियाँ तथा नैतिक मान्यताओं का अभाव झेलना पड़ता है। वह बेईमानी, झूठ, चालबाजी, दगाबाजी, चोरी तथा धोखाधड़ी का व्यवहार अर्जित करता है। नैतिक गुणों के अभाव में वह मादक द्रव्यों; जैसे-शराब, सिगरेट, भाँग, गाँजा, अफीम आदि का सेवन करने लगता है। दूसरों के मतों व विश्वासों के प्रति असहिष्णुता के साथ-साथ उसमें अधिकारियों के प्रति विद्रोह की भावना बढ़ती है। कभी-कभी युवा प्रेम में असफलता के कारण असामाजिक व अनैतिक व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। उनमें लैंगिक जीवन की गलत आदतों के अतिरिक्त विषमलिंगी व्यक्तियों के प्रति असभ्य और असंगत व्यवहार भी देखने को मिलता है। इससे नागरिक उत्तरदायित्वों का भली प्रकार पालन नहीं कर पाते और श्रेष्ठ नागरिकता के मार्ग से भटक जाते

(6) व्यावसायिक अक्षमताएँ – प्रायः देखा गया है कि माता-पिता की किसी व्यवसाय-विशेष में इच्छा व रुचि होती है जिसे वे अपनी सन्तान पर बलात् थोपना चाहते हैं। उचित मार्गदर्शन के अभाव में अपनी योग्यताओं व क्षमताओं के विरुद्ध व्यवसाय अपनाने के कारण बालक-बालिकाएँ अपनी व्यावसायिक परिस्थितियों से उचित तालमेल नहीं बैठा पाते। इसके अतिरिक्त उचित परामर्श न मिलने के कारण व्यवसाय को प्रारम्भ करने सम्बन्धी तथा समय, स्थान व साधनों सम्बन्धी दोष व्यावसायिक विफलताओं को जन्म देते हैं।

(7) धार्मिक समस्याएँ – एक ओर, धर्म भारतीय जन-जीवन का प्राण कहलाता है तो दूसरी ओर, विज्ञान और तकनीकी के अगणित चमत्कारों से मानव-मस्तिष्क को चिन्तन के नये-नये आयाम मिले हैं। इसके फलस्वरूप वैज्ञानिक मान्यताओं तथा धार्मिक मूल्य व अवस्थाओं के बीच एक संघर्ष और विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। धार्मिक आशंकाएँ, अन्धविश्वास तथा बलात् धर्म परिवर्तन को लेकर उत्पन्न हुए प्रश्नों का मनोवैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत न करने से समाज को भारी क्षति होती है।

(8) अवकांराजनित दोषों से हानियाँ – प्रायः लोगों को अवकाश के सदुपयोग के साधनों की उचित जानकारी नहीं रहती है। उचित मार्गदर्शन प्राप्त न होने की स्थिति में दुर्बलता, कमजोरी या शारीरिक-मानसिक असमर्थता के कारण उनमें खेलकूद अथवा मनोरंजन के किसी साधन में सफलतापूर्वक भाग ले सकने की असमर्थता देखने में आती है।

उपर्युक्त विवेचने से स्पष्ट होता है कि उचित निर्देशन के अभाव में व्यक्ति को अनेकानेक क्षेत्रों से सम्बन्धित दुष्कर समस्याओं का समाना करना पड़ता है, जिससे अपूरणीय हानि की सम्भावना बनी रहती है।

प्रश्न 3.
शैक्षिक निर्देशन से आप क्या समझते हैं? शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
शैक्षिक निर्देशन का अर्थ समझाइए।
उत्तर :

शैक्षिक निर्देशन का अर्थ
(Meaning of Educational Guidance)

निर्देशन का एक मुख्य स्वरूप शैक्षिक निर्देशन (Educational Guidance) है। शैक्षिक निर्देशन का सम्बन्ध मुख्य रूप से शैक्षिक परिस्थितियों से होता है।

शैक्षिक निर्देशन बालक को अपने शैक्षिक कार्यक्रम को बुद्धिमत्तापूर्वक नियोजित कर पाने में सहायता करता है। यह बालकों को ऐसे पाठ्य-विषयों का चुनाव करने में सहायता देता है जो उनकी बौद्धिक क्षमताओं, रुचियों, योग्यताओं तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं के अनुकूल हों। यह उन्हें इस योग्य बना देता है ताकि वे शिक्षा सम्बन्धी कुछ विशेष समस्याओं तथा विद्यालय की विभिन्न परिस्थितियों से भली प्रकार समायोजन कर अपने शैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें।

शैक्षिक निर्देशन की परिभाषा
(Definition of Educational Guidance)

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों एवं विद्वानों ने शैक्षिक निर्देशन को परिभाषित करने का प्रयास किया है। उनमें से कुछ का उल्लेख अग्रलिखित है –

(1) ऑर्थर जे० जोन्स के अनुसार,“शैक्षिक निर्देशन का तात्पर्य उस व्यक्तिगत सहायता से है। जो विद्यार्थियों को इसलिए प्रदान की जाती है कि वे अपने उपयुक्त विद्यालय,,पाठ्यक्रम, पाठ्य-विषय एवं विद्यालय-जीवन का चयन कर सकें तथा उनसे समायोजन स्थापित कर सकें।”

(2) रूथ स्ट्राँग के कथनानुसार, “व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने का मुख्य लक्ष्य उसे समुचित कार्यक्रम के चुनाव तथा उसमें प्रगति करने में सहायता प्रदान करना है।”

(3) एलिस के शब्दों में, “शैक्षिक निर्देशन से तीन विशेष क्षेत्रों में सहायता मिलती है- (अ) कार्यक्रम और पाठ्य-विषयों का चयन, (ब) चालू पाठ्यक्रम में कठिनाइयों का मुकाबला करना तथा (स) अगले प्रशिक्षण हेतु विद्यार्थियों का चुनाव।”

शैक्षिक निर्देशन सम्बन्धी उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि यह प्रक्रिया बालकों के पाठ्यक्रम चयन की सर्वोत्तम विधि है। उसमें बालकों की व्यक्तिगत विभिन्नताओं, शैक्षिक उपलब्धियों, प्राप्तांकों, अभिभावकों की आशाओं-महत्त्वाकांक्षाओं तथा मनोवैज्ञानिकों के परामर्श को मुख्य रूप से ध्यान में रखा जाता है, क्योंकि इसके अन्तर्गत एक निर्देशक द्वारा प्रदान किये गये निर्देशन की जाँच भी सम्भव है, इसलिए यह विधि वैज्ञानिक एवं प्रामाणिक भी है।

शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया
(Process of Educational Guidance)

पाठ्य-विषयों के चयन में निर्देशक के जानने योग्य बातें

हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा और जूनियर हाईस्कूल स्तर तक शिक्षा में अधिक विविधता नहीं है। और समस्त विद्यार्थी लगभग एक समान विषयों का ही अध्ययन करते हैं, किन्तु जब बालक माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूल में प्रवेश करते हैं तब उन्हें पाठ्य-विषयों के चयन सम्बन्धी समस्या का सामना करना पड़ता है। शिक्षा के मार्ग पर बढ़ने का यह वह स्थल है जहाँ पाठ्यक्रम अनेक भागों में बँट जाता है और बालक को उनमें से किसी एक का चयन करना होता है। पाठ्य-विषयों के चयन सम्बन्धी शैक्षिक निर्देशन के निम्नलिखित तीन मुख्य पहलू हैं –

(अ) बालक के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना।

जिसे बालक/व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन देना है, उसके सम्बन्ध में निर्देशक को निम्नलिखित सूचनाएँ प्राप्त कर लेनी चाहिए –

(1) बौद्धिक स्तर – शैक्षिक निर्देशन में बालक के बौद्धिक स्तर का पता लगाना अति आवश्यक है। तीव्र बुद्धि वाला बालक कठिन विषयों का अध्ययन करने के योग्य होता है और इसीलिए विज्ञान एवं गणित जैसे विषयों का चुनाव कर सकता है। वह उच्च कक्षाओं तक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों के साथ सुगमतापूर्वक पहुँच जाता है। कला-कौशल और रचनात्मक कार्यों में अपेक्षाकृत कम बुद्धि की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार, बालक के लिए पाठ्य-विषयों का चुनाव करने में उसके बौद्धिक स्तर का ज्ञान आवश्यक है।

(2) शैक्षिक सम्प्राप्ति – शैक्षिक सम्प्राप्ति अथवा शैक्षिक उपलब्धि (Scholastic Attainment) की मुँचना अक्सर पिछली कक्षाओं के प्राप्तांकों द्वारा मिलती है, लेकिन निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत ‘सम्प्राप्ति परीक्षणों तथा सम्बन्धित अध्यापकों द्वारा भी शैक्षिक उपलब्धियों का ज्ञान कर लिया जाता है। किसी विशेष विषय में अधिक प्राप्तांकों की प्रवृत्ति, बालक की उस विषय में रुचि का संकेत करती है। मान लीजिए, एक विद्यार्थी आठवीं कक्षा तक विज्ञान में सर्वाधिक अंक लेकर उत्तीर्ण हुआ है तो कहा जा सकता है कि भविष्य में भी वह विज्ञान में अधिक अंक प्राप्त करेगा। इन प्राप्तांकों या उपलब्धियों को आधार मानकर माध्यमिक स्तर पर विषय चुनने का परामर्श दिया जाना चाहिए।

(3) मानसिक योग्यताएँ – शिक्षा-निर्देशक को बालक की मानसिक योग्यताओं का भी समुचित ज्ञान होना चाहिए, क्योंकि विभिन्न प्रकार के पाठ्य-विषयों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की मानसिक योग्यताएँ उपयोगी सिद्ध होती हैं। उदाहरण के लिए-साहित्यकार, अधिवक्ता, व्याख्याता, नेता तथा शिक्षक बनाने में शाब्दिक योग्यता’; गणितज्ञ, वैज्ञानिक तथा इन्जीनियर बनाने में सांख्यिक योग्यता’; दार्शनिक, विचारक, गणितज्ञ अधिवक्ता बनाने में ‘तार्किक योग्यता’ सहायक होती है। मानसिक योग्यताओं को ज्ञान तत्सम्बन्धी मनोवैज्ञानिक परीक्षणों तथा शिक्षकों की सूचना द्वारा लगाया जा सकता है।

(4) विशिष्ट मानसिक योग्यताएँ एवं अभिरुचियाँ – बालक के लिए पाठ्य-विषय का चयन करते समय बालक की विशिष्ट मानसिक योग्यताओं तथा अभिरुचियों का ज्ञान परमावश्यक है। विभिन्न पाठ्य-विषयों की सफलता अलग-अलग प्रकार की विशिष्ट योग्यताओं तथा अभिरुचियों पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए-संगीत एवं कला की विशिष्ट योग्यता तथा अभियोग्यता वाले बालक-बालिकाओं को प्रारम्भ से ही संगीत एवं कला विषयों का चुनाव कर लेना चाहिए।

(5) रुचियाँ – बालक की जिस विषय में अधिक रुचि होगी उस विषय के अध्ययन में वह अधिक ध्यान लगाएगा। अत: निर्देशक को बालक की रुचि का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। रुचियों का ज्ञान रुचि परीक्षणों तथा रुचि परिसूचियों के अतिरिक्त अभिभावकों, शिक्षकों तथा दैनिक निरीक्षण के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।

(6) व्यक्तित्व की विशेषताएँ – माध्यमिक स्तर पर किसी बालक को विषयों के चयन से सम्बन्धित परामर्श देने के लिए उसके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं का ज्ञान आवश्यक है। व्यक्तित्व विभिन्न प्रकार की विशेषताओं और गुणों; यथा-आत्मविश्वास, धैर्य, लगन, मनन, अध्यवसाय आदि का संगठन है। साहित्यिक विषयों का चयन भावुक व्यक्ति को, विज्ञान और गणित का चयन तर्कयुक्त एवं दृढ़ निश्चयी व्यक्ति को तथा रचनात्मक विषयों का चयन उद्योगी एवं क्रिया-प्रधान व्यक्तियों को करना चाहिए। व्यक्तित्व के गुणों का ज्ञान जिन व्यक्तित्व परीक्षणों से किया जाता है उनमें साक्षात्कार, व्यक्तित्व परिसूचियाँ, प्रश्नसूची, व्यक्ति-इतिहास, निर्धारण-मान आदि प्रमुख हैं।

(7) शारीरिक दशा – कुछ विषयों को चयन करते समय निर्देशक को बालक की शारीरिक रचना तथा स्वास्थ्य की दशाओं का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। कृषि विज्ञान एवं प्राविधिक विषय इन्हीं के अन्तर्गत आते हैं। कृषि सम्बन्धी अध्ययन जमीन के साथ कठोर श्रम पर निर्भर है जिसके लिए हृष्ट-पुष्ट शरीर होना आवश्यक है। इसी प्रकार प्राविधिक विषयों का प्रयोगात्मक ज्ञान कार्यशाला में कई घण्टे काम करके ही उपलब्ध किया जा सकता है। अतः पाठ्य-विषय के चयन से पूर्व चिकित्सक से शारीरिक विकास की जाँच करा लेनी चाहिए तथा रुग्ण या दुर्बल शरीर वाले बालकों को ऐसे विषय का चुनाव नहीं करना चाहिए।

(8) पारिवारिक स्थिति – पारिवारिक परिस्थितियों; विशेषकर आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर शिक्षा-निर्देशक उन्हीं विषयों के चयन का परामर्श देता है जिन्हें निजी परिस्थितियों के अन्तर्गत आसानी से पढ़ा जा सके। माध्यमिक स्तर पर कुछ ऐसे विषय निर्धारित हैं जिनमें उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अभिभावकों को अत्यधिक धन खर्च करना पड़ता है; यथा-विज्ञान पढ़ने के बाद मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश। बालक की योग्यताओं, उच्च बौद्धिक स्तर तथा अभिरुचि के होते हुए भी इन कॉलेजों में अपने बच्चों को भेजना प्रत्येक माता-पिता के वश की बात नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में विद्यार्थी के लिए पाठ्य-विषयों के चयन में उसके परिवार की आर्थिक दशा को ध्यान में रखना अपरिहार्य है।

(ब) पाठ्य-विषयों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना

निर्देशन एवं परामर्श प्रदान करने वाले विशेषज्ञ को बालक के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने के उपरान्त पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित विस्तृत जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित दो प्रकार की जानकारियाँ आवश्यक हैं –

(1) पाठ्य-विषयों के विभिन्न वर्ग – जूनियर स्तर से निकलकर माध्यमिक स्तर में प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों के लिए पाठ्यक्रम को कई वर्गों में विभक्त किया गया है; यथा –

  1. साहित्यिक
  2. वैज्ञानिक
  3. वाणिज्य
  4. कृषि सम्बन्धी
  5. प्रौद्योगिक
  6. रचनात्मक तथा
  7. कलात्मक।

इन वर्गों के विषय में ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त यह जानना आवश्यक है कि सम्बन्धित विद्यालय में कौन-कौन-से वर्स के पाठ्य-विषय पढ़ाये जाते हैं और विद्यार्थी की रुचि के विषय भी वहाँ उपलब्ध हो सकेंगे या नहीं।

(2) विविध पाठ्य-विषयों के अध्ययन हेतु आवश्यक मानसिक योग्यताएँ – किन विषयों के लिए कौन-सी योग्यताएँ ज़रूरी हैं और उस विद्यार्थी में कौन-कौन-सी योग्यताएँ विद्यमान हैं, इन सभी बातों की विस्तृत जानकारी, शिक्षा-निर्देशक को होनी चाहिए, तभी वह उपयुक्त पाठ्य-विषयों के चयन में विद्यार्थियों की सहायता कर सकता है।

(स) पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित व्यवसायों की जानकारी प्राप्त करना

प्रत्येक विद्यार्थी अपनी शिक्षा से निवृत्त होकर जीवन-यापन के लिए किसी-न-किसी व्यवसाय का चयन करता है। आजकल अधिकांश व्यवसायों में विशेषीकरण होने से तत्सम्बन्धी प्रशिक्षण पहले से ही प्राप्त करना पड़ता है। अत: निर्देशक को पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित व्यवसायों के विषय में ये सूचनाएँ प्राप्त करना अति आवश्यक है –

(1) व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए किन पाठ्य-विषयों का अध्ययन आवश्यक है – सबसे पहले निर्देशक को यह जानना चाहिए कि किसी विशेष व्यवसाय से सम्बन्धित प्रशिक्षण कोर्स में प्रवेश पाने के लिए और अध्ययन की शुरुआत के लिए किन विषयों का ज्ञान आवश्यक है। उदाहरणार्थ-डॉक्टर बनने के लिए 9वीं कक्षा से जीवविज्ञान पढ़ना चाहिए, जबकि इंजीनियर बनने के लिए विज्ञान वर्ग में गणित पढ़ना चाहिए।

(2) विभिन्न वर्गों के पाठ्य-विषयों का अध्ययन किन व्यवसायों के योग्य बनाता है – पाठ्य-विषयों के चयन में व्यवसाय सम्बन्धी जानकारी आवश्यक है। निर्देशक को पहले ही यह ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए कि किसी व्यवसाय-विशेष का सीधा सम्बन्ध किन-किन विषयों से है ताकि व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त न करके भी उन विषयों का ज्ञान व्यवसाय के कार्य में मदद दे सके। उदाहरण के लिए-कॉमर्स लेकर कोई विद्यार्थी वाणिज्य या व्यापार के क्षेत्र में तो प्रवेश कर सकता है, किन्तु डॉक्टरी या इंजीनियरिंग के क्षेत्र में नहीं।

बालक को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने से पूर्व उपर्युक्त समस्त बातों की विस्तृत एवं वास्तविक जानकारी एक सफल शिक्षा-निर्देशक (Educational Guide) को होनी चाहिए।

प्रश्न 4.
शैक्षिक निर्देशन के लाभ अथवा उपयोगिता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

शैक्षिक निर्देशन के लाभ (उपयोगिता अथवा महत्त्व)
[Merits (Utility or Importance) of Educational Guidance)

वर्तमान शिक्षा-पद्धति एक जटिल व्यवस्था है जिसमें बालकों की क्षमताएँ, शक्तियाँ, योग्यताएँ, समय तथा धन आदि का अपव्यय होता है और वे अपने शैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल रहते हैं। इन असफलताओं तथा निराशाओं के बीच शैक्षिक निर्देशनं आशा की किरणों के साथ शिक्षा के क्षेत्र में अवतरित होता है जिसकी उपयोगिता या महत्त्व सन्देह से परे है। इसके लाभों की पुष्टि निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत हो जाती है –

(1) पाठ्य-विषयों का चयन – माध्यमिक विद्यालयों में विभिन्न व्यवसायों से सम्बन्धित विविध पाठ्य-विषयों के अध्ययन की व्यवस्था है। निर्देशन की सहायता से विद्यार्थी अपने बौद्धिक स्तर, क्षमताओं, योग्यताओं तथा रुचियों के अनुसार पाठ्य-विषयों का चुनाव कर सकता है। इस भाँति वह अपने मनोनुकूल व्यवसाय की प्राप्ति कर सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है।

(2) भावी शिक्षा का सुनिश्चय – हाईस्कूल स्तर के पश्चात् विद्यार्थियों के लिए यह सुनिश्चित कर पाना दूभर हो जाता है कि उनकी भावी शिक्षा का लक्ष्य एवं स्वरूप क्या होगा, अर्थात् वे किस व्यावसायिक विद्यालय में प्रवेश लें, व्यापारिक विद्यालय में या औद्योगिक विद्यालय में। यदि किन्हीं कारणों से वे अनुपयुक्त शिक्षा संस्थान में भर्ती हो जाते हैं तो कुसमायोजन के कारण उन्हें बीच में ही संस्था छोड़नी पड़ सकती है जिसके फलस्वरूप काफी हानि उठानी पड़ती है। इसके सन्दर्भ में निर्देशन सही पथ-प्रदर्शन करता है।

(3) नवीन विद्यालय में समायोज – शैक्षिक निर्देशन उन विद्यार्थियों की सहायता करता है ज़ो किसी नये विद्यालय में प्रवेश पाते हैं और वहाँ के वातावरण के साथ समायोजित नहीं हो पाते हैं।

(4) पाठ्यक्रम का संगठन – विद्यार्थियों की व्यक्तिगत भिन्नताओं को दृष्टिगत रखते हुए उनका पाठ्यक्रम निर्धारित एवं संगठित किया जाना चाहिए। पाठ्यक्रम संगठन का कार्य शैक्षिक निर्देशन के माध्यम से किया जाता है।

(5) परिवर्तित विद्यालयी प्रबन्ध, पाठ्यक्रम एवं शिक्षण-विधि के सन्दर्भ में – विद्यालय एक लघु समाज है। समाज की प्रजातान्त्रिक व्यवस्था का सीधा प्रभाव विद्यालयी प्रबन्ध एवं व्यवस्थाओं पर पड़ता है। प्रजातान्त्रिक शिक्षा समाज के सभी व्यक्तियों को समान अवसर प्रदान करती है। व्यक्तिगत विभिन्नता के सिद्धान्त पर आधारित गत्यात्मक प्रकार की प्रजातान्त्रिक विद्यालयी व्यवस्था, पाठ्यक्रम तथा शिक्षण विधियों की आवश्यकताओं की ओर पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए। इन परिवर्तित देशाओं के कारण पैदा होने वाली समस्याओं का समाधान एकमात्र शैक्षिक निर्देशन की सहायता से ही सम्भव है।

(6) मन्द बुद्धि, पिछड़े तथा मेधावी बालकों के लिए – शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत मन्द बुद्धि, पिछड़े तथा मेधावी बालकों की पहचान करके उनकी क्षमतानुसार शिक्षा की व्यवस्था की जाती है। इस विशिष्ट व्यवस्था को लाभ अलग-अलग तीनों ही वर्गों के बालकों अर्थात् । मन्द बुद्धि, पिछड़े व मेधावी बालकों को प्राप्त होता है।

(7) अभिभावकों की सन्तुष्टि के लिए – कभी-कभी अभिभावकों की महत्त्वाकांक्षाओं तथा बालकों की मानसिक योग्यताओं व क्षमताओं के मध्य गहरा अन्तर होता है। निर्देशन के माध्यम से वे अपने बालक की विशेषताओं की सही वास्तविक झलक पाकर तदनुकूल शिक्षा की व्यवस्था कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त वे शिक्षा-संस्थानों के कार्यक्रमों से परिचित होकर उन्हें अपना योगदान प्रदान कर सकते हैं।

(8) अनुशासन की समस्या के समाधान के लिए – क्योंकि शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया में बालक की क्षमताओं, रुचियों तथा अभिरुचियों को ध्यान में रखकर उसकी शिक्षा सम्बन्धी व्यवस्था की जाती है; अत: पाठ्यक्रम बालक को भार-स्वरूप नहीं लगता। इसके विपरीत, वह चयनित विषयों में रुचि लेकर अनुशासित रूप में अध्ययन करता है जिससे अनुशासन की समस्या का एक बड़ी सीमा तक समाधान निकल आता है।

(9) जीविकोपार्जन का समुचित ज्ञान – प्रायः विद्यार्थियों को विभिन्न पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित एवं आगे चलकर उपलब्ध हो सकने वाले व्यावसायिक अवसरों की जानकारी नहीं होती। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति किसी विशेष व्यवसाय में जानकारी व रुचि न होने के कारण बार-बार अपना व्यवसाय बदलते हैं जिससे व्यावसायिक अस्थिरता में वृद्धि के कारण हानि होती है। अतः रोजगार के अवसरों का ज्ञान प्राप्त करने तथा जीविकोपार्जन सम्बन्धी समुचित ज्ञान पाने की दृष्टि से शैक्षिक निर्देशन अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होता है।

(10) अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या का अन्त – अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या के अन्त ज्यादातर बालक-बालिकाएँ विभिन्न कारणों से स्थायी साक्षरता प्राप्त किये बिना ही विद्यालय का त्याग कर देते हैं जिससे प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर अत्यधिक अपव्यय हो रहा है। इसके अतिरिक्त परीक्षा में फेल होने वाले विद्यार्थियों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। इस समस्या का अन्त शैक्षिक निर्देशन के माध्यम से ही सम्भव है।

प्रश्न 5.
वैयक्तिक एवं सामूहिक शैक्षिक निर्देशन की विधि और प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

शैक्षिक निर्देशन की विधि
(Method of Educational Guidance)

प्राथमिक एवं जूनियर हाईस्कूल की सीमाओं को लाँघकर माध्यमिक स्तर की दहलीज पर आकर सभी विद्यार्थियों को सचमुच ही यह ज्ञात नहीं होता कि उनके जीवन की भावी दिशा एवं व्यूह-नीति क्या होगी। न केवल इतना ही, अपितु उनके अभिभावकगण भी उनके भावी जीवन के विषय में अधिक स्पष्ट नहीं होते। देश के असंख्य बालकों की एक विशाल भीड़ को उचित मार्ग-दर्शन एवं परामर्श की तलाश होती है जिसे निर्धारित एवं कम समय में प्रदान करना होता है। इस सन्दर्भ में ‘निर्देशन’ (Guidance) एक सर्वोत्तम विधि एवं कला है। शैक्षिक निर्देशन की दो विधियाँ प्रचलित हैं – (I) वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन तथा (II) सामूहिक शैक्षिक निर्देशन।

(i) वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन
(Personal Educational Guidance)

वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन के अन्तर्गत परामर्शदाता या निर्देशक बालक से व्यक्तिगत स्तर पर सम्पर्क स्थापित करके उसकी विभिन्न समस्याओं को अध्ययन करता है। ये समस्याएँ व्यक्तिगत, सामाजिक या संवेगात्मक इत्यादि हो सकती हैं। वह बालक के बौद्धिक स्तर, शैक्षिक उपलब्धियों, मानसिक योग्यताओं, रुचियों, अभिरुचियों, पारिवारिक तथा शारीरिक दशाओं से परिचय प्राप्त करने का भरपूर प्रयास करता है। इसके लिए निम्नलिखित प्रमुख विधियों का प्रयोग किया जाता है –

(1) भेंट या साक्षात्कार – निर्देशक या परामर्शदाता बालक से भेंट करके या साक्षात्कार द्वारा उसके सम्बन्ध में आवश्यक सूचनाएँ एकत्र करता है तथा निर्देशन की प्रक्रिया में सहायक विभिन्न तथ्यों की जानकारी उपलब्ध कराता है।

(2) प्रश्नावली – बालक के सम्बन्ध में तथ्यों का पता लगाने अथवा उसके व्यक्तिगत विचारों से परिचित होने के उद्देश्य से एक प्रश्नावली निर्मित की जाती है जिसके उत्तर स्वयं बालक को देने होते हैं। प्रश्नावली के माध्यम से बालक की आदतों, पारिवारिक वातावरण, अवकाशकालीन क्रियाओं, शिक्षा और व्यवसाय सम्बन्धी योजनाओं के विषय में ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

(3) व्यक्तिगत इतिहास –व्यक्तिगत इतिहास के माध्यम से बालक की व्यक्तिगत, सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी प्राप्त की जाती है। इसके अतिरिक्त बालक के अभिभावक, मित्र, परिवार के सदस्य एवं आस-पड़ोस के लोग भी उसके विषय में बताते हैं, जिससे उसकी समस्याओं का निदान एवं समाधान किया जाता है।

(4) संचित अभिलेख – विद्यालय में प्रत्येक विद्यार्थी से सम्बन्धित एक ‘संचित अभिलेख’ होता है। इस अभिलेख में विद्यार्थी की प्रगति, योग्यता, बौद्धिक स्तर, रुचि, पारिवारिक दशा तथा शारीरिक स्वास्थ्य सम्बन्धी सूचनाएँ संगृहीत रहती हैं। इन अभिलेखों का अध्ययन करके परामर्शदाता, निर्देशन की दिशा निर्धारित करता है।

(5) बुद्धि एवं ज्ञानार्जन परीक्षण – इन परीक्षणों के माध्यम से निर्देशक इस बात की जाँच करता है कि विद्यार्थी ने विभिन्न पाठ्य-विषयों में कितना ज्ञानार्जन किया है, उसका बौद्धिक स्तर कितना है, शिक्षक ने उसे कितनी प्रभावशालता के साथ पढ़ाया है तथा उसकी योग्यताएँ व दुर्बलताएँ। क्या हैं? इन सभी बातों का ज्ञान विद्यार्थी की भावी प्रगति के सन्दर्भ में अनुमान लगाने में निर्देशक की सहायता करता है।

(6) परामर्श – निर्देशक विद्यार्थियों की समस्या का ज्ञान प्राप्त करके तथा उनके विषय में समस्त तथ्यों का संकलन करके उन्हें शिक्षा सम्बन्धी परामर्श प्रदान करता है। यह परामर्श उनकी समस्याओं का उचित समाधान करने में सहायक होता है।

(7) अनुगामी कार्यक्रम – निर्देशन प्रदान करने के उपरान्त अनुगामी कार्य द्वारा यह जाँच की। जाती है कि निर्देशन के बाद विद्यार्थी की प्रगति सन्तोषजनक रही है अथवा नहीं। असन्तोषजनक प्रगति इस बात की द्योतक है कि विद्यार्थी के विषय में निर्देशक के अनुमान गलत थे तथा निर्देशन ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर पाया। इसलिए उसमें संशोधन करके पुनः निर्देशन प्रदान किया जाना चाहिए।

वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन की विधि के उपर्युक्त सोपान किसी विद्यार्थी की शैक्षिक समस्याओं के सम्बन्ध में समुचित परामर्श एवं समाधान प्रस्तुत करने में सहायक सिद्ध होते हैं। लेकिन इस विधि की कुछ परिसीमाएँ भी हैं; यथा – एक ही विद्यार्थी के लिए विशेषज्ञ या मनोवैज्ञानिक की आवश्यकता होती है तथा इसमें अधिक समय और धन का व्यय भी होता है। सामूहिक शैक्षिक निर्देशन से इन कमियों को पूरा करने का प्रयास किया गया है।

(ii) सामूहिक शैक्षिक निर्देशन (Group Educational Guidance)

सामूहिक शैक्षिक निर्देशन की विधि के विभिन्न सोपानों का संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है

(1) अनुस्थापन वार्ताएँ – सामूहिक निर्देशन के अन्तर्गत सर्वप्रथम, मनोवैज्ञानिक विद्यालय में जाकर बालकों को वार्ता के माध्यम से निर्देशन का महत्त्व समझाता है। ये वार्ताएँ विद्यार्थियों को स्वयं अपनी आवश्यकताओं, क्षमताओं, शैक्षिक उद्देश्यों एवं रुचियों इत्यादि के सम्बन्ध में सोचने-समझने हेतु प्रेरित व उत्साहित करती हैं।

(2) मनोवैज्ञानिक परीक्षण – विद्यार्थियों को उचित दिशा में निर्देशित करने के उद्देश्य से मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है। इन परीक्षणों की सहायता से विद्यार्थियों की सामान्य एवं विशिष्ट बुद्धि, मानसिक योग्यता, रुचि, अभिरुचि, भाषा एवं व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं का ज्ञान हाता है। इससे निर्देशक का कार्य सुगम हो जाता है।

(3) साक्षात्कार – व्यक्तिगत निर्देशन के समान ही साक्षात्कार का प्रयोग सामूहिक निर्देशन में भी किया जाता है। इसके लिए निर्देशक समिति एवं बालकों से भेंट करके विभिन्न पाठ्य-विषयों के प्रति उनकी रुचि, भावी शिक्षा और व्यवसाय-योजना आदि के सम्बन्ध में सूचनाएँ एकत्र करते हैं। इसके लिए स्वयं-परिसूची’ (Self-Inventory) का भी प्रयोग किया जाता है।

(4) विद्यालय से तथ्य संकलन – मनोवैज्ञानिक, बालकों की विभिन्न पाठ्य-विषयों की ‘शैक्षिक सम्प्राप्ति की जानकारी के लिए, पूर्व परीक्षाओं के प्राप्तांकों पर विचार करता है। इस सम्बन्ध में ‘संचित-लेखा’ (Cumulative Record) के साथ-साथ अध्यापकों की राय लेना भी जरूरी एवं महत्त्वपूर्ण है।

(5) सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का अध्ययन – शिक्षा से सम्बन्धित समुचित निर्देशन प्रदान करने की दृष्टि से विद्यार्थियों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का अध्ययन आवश्यक है। निर्देशक को समाज, आस-पड़ोस, घर-गृहस्थी, मित्र-मण्डली, परिचितों तथा अभिभावकों से उनके विषय में पूरी-पूरी सामाजिक-आर्थिक जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।

(6) परिवार से सम्पर्क – माता-पिता ने बालकों को जन्म दिया है, पालन-पोषण किया है, उन्हें शनैः-शनैः विकसित होते हुए देखा है तथा उसकी भावी उन्नति व व्यवसाय आदि का स्वप्न देखा है; अतः मनोवैज्ञानिक को बालकों के माता-पिता के विचारों को अवश्य समझना चाहिए। इसके लिए पत्र-व्यवहार द्वारा या माता-पिता से व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित करके तथ्यों का संकलन किया जा सकता है।

(7) पाश्र्व-चित्र – अनेकानेक स्रोतों से एकत्रित की गयी सूचनाओं व तथ्यों को एक पार्श्व-चित्र (Profile) में व्यक्त किया जाता है। इस प्रयास में उनकी विभिन्न योग्यताओं, क्षमताओं तथा भिन्न-भिन्न परीक्षण स्तर के चित्र अंकित किये जाते हैं। पाश्र्व-चित्र को देखकर बालकों के सम्बन्ध में एक साथ ही ढेर सारी महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ ज्ञात हो जाती हैं। इन सूचनाओं के आधार पर विद्यार्थियों को पाठ्य-विषय के चुनाव के सम्बन्ध में निर्देशन दिया जाता है जो प्रायः लिखित रूप में होता है।

(8) अनुगामी कार्य – अनुगामी कार्य का एक नाम अनुवर्ती अध्ययन (Follow-up study) भी है। निर्देशन से सम्बन्धित यह अन्तिम सोपान या कार्य है। निर्देशन पाने के बाद जब बालक किसी विषय का चयन करके उसका अध्ययन शुरू कर देता है तो मनोवैज्ञानिक या निर्देशक को यह जाँच करनी होती है कि बालक उस विषय को सफलता से अध्ययन कर रहा है अथवा नहीं। बालक की ठीक प्रगति का अभिप्राय है कि निर्देशन सन्तोषजनक रहा, अन्यथा उसे फिर से निर्देशन प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 6.
व्यावसायिक निर्देशन से आप क्या समझते हैं। व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया का भी विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
व्यवसाय प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का सहारा तथा जीविकोपार्जन का एक सशक्त साधन है। जिसके द्वारा जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। शिक्षा के विभिन्न उद्देश्यों में से एक महत्त्वपूर्ण एवं मुख्य उद्देश्य विद्यार्थी को व्यावसायिक दृष्टि से कुशल बनाना है। गाँधी जी के अनुसार, “सच्ची शिक्षा बेरोजगारी के विरुद्ध एक प्रकारे का आश्वासन होना चाहिए। प्राय: देखने में आता है कि लोग बिना सोचे-समझे किसी भी व्यवसाय को शुरू कर देते हैं, किन्तु बाद में कार्य-दशाओं के प्रतिकूल होने पर उन्हें वह व्यवसाय छोड़ना पड़ता है जिसमें श्रम, समय और धन की हानि होती है। अतः । व्यवसाय को चुनाव उचित और उपयोगी होना चाहिए जिसके लिए निर्देशन अत्यधिक उपयोगी सिद्ध होता है।

व्यावसायिक निर्देशन का अर्थ
(Meaning of Vocational Guidance)

व्यावसायिक निर्देशन एक ऐसी मनोवैज्ञानिक सहायता है जो व्यक्ति (विद्यार्थी) को जीवन के एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य जीविकोपार्जन’ की प्राप्ति में सहायक है। इसका मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को यह निर्णय करने में मदद देना है कि वह जीविकोपार्जन के लिए कौन-सा उपयुक्त व्यवसाय चुने जो उसकी बुद्धि, अभिरुचि तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं के अनुकूल हो। इसके अतिरिक्त, यह व्यक्ति को व्यवसाय-चयन, वातावरण से उचित सामंजस्य तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण आदि में चयन हेतु उचित पथ-प्रदर्शन एवं सहायता प्रदान करता है। वस्तुतः जीविकोपार्जन का स्पष्ट एवं गहरा प्रभाव मानव-जीवन की प्रत्येक वृत्ति पर पड़ता है, इसलिए वर्तमान परिस्थितियों में तो इसका क्षेत्र मात्र व्यक्ति तक ही सीमित न होकर समूचे समाज तथा विश्व के प्रत्येक राष्ट्र तक विस्तृत हो गया है।

व्यावसायिक निर्देशन की परिभाषा
(Definition of Vocational Guidance)

(1) क्रो एवं क्रो के अनुसार, “व्यावसायिक निर्देशन की व्याख्या सामान्यत: उस सहायता के रूप में की जाती है, जो विद्यार्थियों को किसी व्यवसाय को चुनने, उसके लिए तैयारी करने तथा उसमें उन्नति प्रदान करने के लिए दी जाती है।”

(2) अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की राय में, “व्यावसायिक निर्देशन वह सहायता है जो एक व्यक्ति को व्यवसाय चुनने से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान हेतु प्रदान की जाती है जिससे व्यक्ति की क्षमताओं का तत्सम्बन्धी व्यवसाय-सुविधाओं के साथ समायोजन हो सके।

(3) जोन्स के अनुसार, “व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति को ऐसी व्यक्तिगत सहायता प्रदान करने का प्रयास है, जिसके द्वारा वह स्वयं अपने लिए उचित व्यवसाय का चुनाव, उसके लिए तैयारी तथा उसमें प्रवेश करके उन्नति कर सके।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि व्यावसायिक निर्देशन, उपयुक्त व्यवसाय के चुनाव में किसी व्यक्ति की सहायता करने की प्रक्रिया है। यह उसे व्यावसायिक परिस्थितियों से स्वयं को अनुकूलित करने में मदद देती है जिससे कि समाज की मानव-शक्ति का सदुपयोग हो सके तथा अर्थव्यवस्था में समुचित सन्तुलन स्थापित हो सके। इन्हीं तथ्यों को ‘वोकेशनल गाइडेन्स नामक पत्रिका में इन शब्दों में स्पष्ट किया गया है, “व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति को सहायता प्रदान करने की वह क्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति अपने लिए कोई उपयुक्त व्यवसाय चुनता है, उसके लिए स्वयं को तैयार करता है, उसे अपनाता है तथा उसमें प्रगति करता है। व्यावसायिक निर्देशन का मुख्य कार्य व्यक्ति को अपने भविष्य के सम्बन्ध में ऐसे निर्णय एवं उद्देश्य चयन करने में सहायता करना होता है, जो उसके सन्तोषजनक व्यावसायिक समायोजन के लिए आवश्यक होते हैं।”

व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया : व्यवसाय का चयन
(Process of Vocational Guidance : Selection of Vocation)

किसी व्यक्ति के लिए उपयुक्त व्यवसाय चुनने की दृष्टि से व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया प्रारम्भ की जाती है। यह प्रक्रिया निर्देशक से अग्रलिखित दो प्रकार की जानकारियों की माँग करती है –

(अ) व्यक्ति के विषय में जानकारी (Study of the Individual)

व्यावसायिक निर्देशन के अन्तर्गत उपयुक्त व्यवसाय का चुनाव करते समय, सर्वप्रथम, व्यक्ति के शारीरिक विकास, उसके बौद्धिक स्तर, मानसिक योग्यताओं, रुचियों, अभिरुचियों तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं का अध्ययन करना आवश्यक है। व्यक्ति के इस भाँति अध्ययन को ‘व्यक्ति-विश्लेषण (Individual Analysis) का नाम दिया जाता है। व्यक्ति-विश्लेषण में निम्नलिखित बातें जानना आवश्यक समझा जाता है

(1) शैक्षणिक योग्यता (Educational Qualifications) – किसी व्यवसाय के चयन में उसके लिए अपेक्षित शिक्षा के स्तर तथा शैक्षणिक योग्यता की जानकारी आवश्यक होती है। कुछ व्यवसायों के लिए प्रारम्भिक स्तर, कुछ के लिए माध्यमिक स्तर तो कुछ के लिए उच्च स्तर की शिक्षा अपेक्षित है। प्रोफेसर, इन्जीनियर, डॉक्टर, वकील तथा प्रशासक आदि के व्यवसाय हेतु उच्च शिक्षा की आवश्यकता होती है, किन्तु ओवरसियर, कम्पाउण्डर, स्टेनोग्राफर, क्लर्क, मिस्त्री तथा प्राथमिक स्तर के शिक्षक हेतु सामान्य शिक्षा ही पर्याप्त है। कृषि, निजी व्यापार, दुकानदारी आदि के लिए थोड़ी-बहुत शिक्षा से ही काम चल जाता हैं। इसके अतिरिक्त अनेक व्यवसायों में शैक्षणिक योग्यताओं के साथ-साथ विशेष परीक्षण और ओवरसियर तथा कम्पाउण्डर बनने के लिए विशेष प्रशिक्षण में सम्मिलित होना पड़ता है।

(2) बुद्धि (Intelligence) – यह बात सन्देह से परे है कि भिन्न-भिन्न व्यवसायों में सफलता प्राप्त करने के लिए भिन्न-भिन्न बौद्धिक स्तर की आवश्यकता होती है। निर्देशक या परामर्शदाता को व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता का ज्ञान निम्नलिखित तालिका से हो सकता है –

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 1
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 1

(3) मानसिक योग्यताएँ (Mental Abilities) – अलग-अलग व्यवसायों के लिए विशिष्ट मानसिक योग्यताओं की आवश्यकता होती है। निर्देशक को चाहिए कि वह सम्बन्धित व्यक्ति में विशिष्ट योग्यता की जाँच कर उसे तत्सम्बन्धी व्यवसाय चुनने का परामर्श दे। उदाहरण के लिए संगीत की विशेष योग्यता संगीतज्ञ के लिए; यान्त्रिक (Mechanical) व आन्तरिक्षक (Spatial) योग्यता इन्जीनियर और मिस्त्रियों के लिए; शाब्दिक व शब्द-प्रवाह सम्बन्धी योग्यताएँ वकील, अध्यापक और लेखक आदि के लिए आवश्यक समझी जाती हैं।

(4) अभियोग्यताएँ (Aptitudes) – विभिन्न प्रकार के व्यवसायों की सफलता हेतु विभिन्न प्रकार की अभियोग्यताएँ या अभिरुचियाँ आवश्यक हैं। सर्वमान्य रूप से, प्रत्येक व्यक्ति में किसी विशेष प्रकार का कार्य करने से सम्बन्धित योग्यता जन्म से ही होती है। यदि जन्म से चली आ रही योग्यता को ही प्रशिक्षण देकर अधिक परिष्कृत एवं प्रभावशाली बनाया जाए तो व्यक्ति की व्यावहारिक कार्यकुशलता में अभिवृद्धि हो सकती है। यान्त्रिक कार्य के लिए यान्त्रिक अभिरुचि, कला सम्बन्धी कार्य के लिए कलात्मक अभिरुचि तथा लिपिक के लिए लिपिक अभिरुचि आवश्यक है।

(5) रुचियाँ (Interests) – किसी कार्य की सफलता के लिए उसमें व्यक्ति की रुचि का होना आवश्यक है। किसी ऐसे कार्य को करना उचित है जिसमें पहले से व्यक्ति की रुचि हो, अन्यथा मिले हुए कार्य में बाद में रुचि विकसित की जा सकती है। प्रायः योग्यता और रुचि साथ-साथ पाये जाते हैं। और कम योग्यता वाले क्षेत्र में व्यक्ति रुचि प्रदर्शित नहीं करता। ऐसी दशा में रुचि और योग्यता में से किसे प्रमुखता दी जाए यह बात विचारणीय बन जाती है।

(6) व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताएँ (Personality Qualities) – अनेक व्यवसायों की सफलता व्यक्तित्व सम्बन्धी विशिष्ट गुणों पर आधारित होती है; अत: निर्देशक को व्यवसाय के चयन सम्बन्धी परामर्श प्रदान करते समय व्यक्तित्व की विशेषताओं पर भी ध्यान देना चाहिए। एजेण्ट या सेल्समैन के लिए मिलनसार, आत्मविश्वासी, खुश-मिजाज, व्यवहारकुशल तथा बहिर्मुखी व्यक्तित्व का होना परमावश्यक है। कुछ व्यवसाय ऐसे होते हैं जिनमें संवेगात्मक स्थिति, धैर्य, एकाग्रता, सामाजिकता आदि गुणों की आवश्यकता होती है; जैसे-डॉक्टर, इन्जीनियर, बैंक लिपिक, ड्राइवर इत्यादि। लेखक, विचारक और समीक्षक का व्यक्तित्व चिन्तनशील एवं अन्तर्मुखी होता है।

(7) शारीरिक दशा (Physical Condition) – प्रत्येक कार्य में शारीरिक शक्ति का उपभोग होता ही है; अत: सभी व्यवसायों के चयन में शारीरिक विकास, स्वास्थ्य आदि शारीरिक दशाओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए। कुछ व्यवसायों; जैसे-पुलिस, सेना आदि में अधिक शारीरिक क्षमता की अपेक्षा होती है और उनके लिए शारीरिक दृष्टि से क्षमतावान व्यक्तियों को ही चुना जाता है। ऐसे व्यवसायों में कम क्षमता वाले, अस्वस्थ या रोगी व्यक्तियों को कदापि नहीं लिया जा सकता, चाहे वे कितने ही बुद्धिमान क्यों न हों।

(8) आर्थिक स्थिति (Economic Condition) – बालक को व्यवसाय चुनने सम्बन्धी परामर्श प्रदान करने में उसके परिवार की आर्थिक दशा का ज्ञान निर्देशक को अवश्य रहना चाहिए। कुछ व्यवसाय ऐसे हैं जिनके प्रशिक्षण में अधिक समय और अधिक धन दोनों की आवश्यकता होती है; उदाहरणार्थ-डॉक्टरी और इन्जीनियरिंग। लम्बे समय तक शिक्षा पर भारी धन व्यय करना प्रत्येक परिवार के वश की बात नहीं है। इसी कारण से अनेक योग्य एवं प्रतिभाशाली युवक-युवतियाँ धनाभाव के कारण इन व्यवसायों का चयन नहीं कर पाते हैं।

(9) लिंग (Sex) – लैंगिक भेद के कारण व्यक्तियों के कार्य-क्षेत्र में अन्तर आ जाता है, इसलिए व्यवसाय चयन की प्रक्रिया में निर्देशक को व्यक्ति के लिंग का भी ध्यान रखना चाहिए। सेना और पुलिस जैसे विभाग पुरुषों के लिए ही उपयुक्त समझे जाते हैं, जबकि अध्यापन, परिचर्या, लेखन आदि स्त्रियों के लिए अधिक ठीक रहते हैं। वस्तुतः स्त्रियाँ बौद्धिक कार्य तो पुरुषों के समान कर सकती हैं लेकिन उनमें पुरुषों के समान कठोर शारीरिक श्रम करने की क्षमता नहीं होती। वर्तमान परिस्थितियों में लिंग भेद की मान्यता क्रमशः घट रही है। अब महिलाएँ पुलिस, सेना तथा वायुसेना में भी सफँलतापूर्वक पदार्पण कर रही हैं।

(10) आयु (Age) – बहुत-से व्यवसायों में राज्य की ओर से सेवाओं में प्रवेश पाने की आयु-सीमाएँ निर्धारित कर दी गयी हैं। प्रशिक्षण प्राप्त करने की भी सीमाएँ सुनिश्चित कर दी गयी हैं। अतः किसी व्यवसाय के चयन हेतु निर्देशक को व्यक्ति की आयु सीमा पर भी विचार कर लेना चाहिए।

(ब) व्यवसाय-जगत् सम्बन्धी जानकारी (Study of Vocational world)

व्यावसायिक निर्देशक को व्यवसाय-जगत् की पूरी जानकारी रहनी चाहिए। विश्व-भर में कितने प्रकार के व्यवसाय हैं, किन क्षेत्रों में कौन-से व्यवसाय उपलब्ध हैं, किसी व्यवसाय की विभिन्न शाखाओं व उपशाखाओं का ज्ञान, व्यवसाय-विशेष के लिए आवश्यक शैक्षिक-बौद्धिक-मानसिक योग्यताएँ तथा व्यक्तिगत भिन्नता के साथ अपनाये गये व्यवहार का समायोजन-इन सभी बातों को लेकर जानकारी आवश्यक है। व्यवसाय-जगत् से पूर्ण परिचय के लिए निर्देशक का निम्नलिखित तथ्यों से अवगत होना परमविश्यक है –

(1) व्यवसायों का वर्गीकरण – व्यावसायिक निर्देशन के लिए व्यवसायों के प्रकारों का समझना सबसे पहला और अनिवार्य कदम है। व्यवसायों को कई आधारों पर वर्गीकृत किया है। तीन प्रमुख आधार ये हैं–(i) कार्य के स्वरूप की दृष्टि से व्यवसायों का वर्गीकरण, (i) शिक्षा, बौद्धिक स्तर, प्रशिक्षण, सामाजिक सम्मान आदि की दृष्टि से व्यवसायों का वर्गीकरण तथा (ii) रुचियों की दृष्टि से व्यवसायों का वर्गीकरण।

(2) व्यवसाय-परिवार एवं उनके विभिन्न स्तरीय कार्य – व्यवसाय जगत् से सम्बन्धित दूसरी जानकारी व्यवसाय-परिवार (Job-Family) तथा उसके विभिन्न स्तरीय कार्य (Levels of work) हैं। व्यवसाय-परिवार का अर्थ उन एक ही तरह के व्यवसायों से है जो कार्य की प्रवृत्ति, कार्य की दशा, अपेक्षित बौद्धिक क्षमता, शैक्षिक स्तर तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं के आधार पर एकसमान होते हैं। उदाहरण के तौर पर-“यान्त्रिक व्यवसाय-परिवार में ऊँचे स्तर पर इन्जीनियरिंग का कार्य होता है, मध्यम स्तर पर ओवरसियर, विद्युत-मिस्त्री तथा निम्न स्तर पर फिटर व मैकेनिक होते हैं। निर्देशक को इन सभी बातों को यथोचित ज्ञान होना चाहिए।

(3) व्यवसायों के विषय में जानकारी के स्रोत – विभिन्न व्यवसायों के विषय में जानकारी हासिल करने के स्रोतों का ज्ञान व्यावसायिक निर्देशक को अवश्य होना चाहिए। ये स्रोत इस प्रकार हैं –

  1. सरकारी विभागों की ओर से प्रकाशित सूचनाएँ
  2. रोजगार कार्यालय
  3. व्यापार एवं उद्योग सम्बन्धी सूचनाएँ
  4. पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से
  5. विभिन्न व्यवसायों के विशेषज्ञों की वार्ताओं को रेडियो प्रसारण
  6. व्यवसायों से सम्बन्धित कल-कारखानों या संस्थाओं में स्वयं जाकर
  7. व्यावसायिक एवं औद्योगिक यूनियनों के भाषण व लेख
  8. देश-विदेश के विशेषज्ञों के माध्यम से जानकारी
  9. व्यावसायिक क्षेत्रों में स्वतः कार्य अनुभव प्राप्त करके तथा
  10. निर्देशन मनोवैज्ञानिक एवं परामर्शदाताओं से सम्पर्क स्थापित करके। इस प्रकार व्यवसाय सम्बन्धी लाभप्रद सूचनाएँ ज्ञात की जा सकती हैं।

(4) व्यवसाय से सम्बन्धित कुछ स्मरणीय तथ्य – व्यवसाय की जानकारी संकलित करते समय निर्देशक के लिए ध्यान देने योग्य बातें इस प्रकार हैं –

  1. व्यवसाय में कार्य का स्वरूप (अर्थात् कार्य का प्रकार, उसकी प्रकृति, कार्मिक का उत्तरदायित्व व कर्तव्य)
  2. कार्य करने की दशाएँ (अर्थात् बन्द जगह में होता है या खुली जगह में, कार्य के घण्टे, कार्य बैठकर करते हैं या खड़े होकर, वातावरण आदि कैसा है?)
  3. बुद्धि, मानसिक योग्यता, रुचि तथा अभिरुचि से सम्बन्धित सूचनाएँ
  4. व्यवसाय के लिए व्यक्तित्व के किन गुणों की आवश्यकता है और उनका प्रयोग कब व कहाँ करना है?
  5. प्रशिक्षण सम्बन्धी अनेक जानकारियाँ प्राप्त कर लेना
  6. व्यवसाय के लिए शारीरिक दशाएँ कैसी हों?
  7. आगे चलकर पदोन्नति के अवसर भी मिलेंगे या नहीं?
  8. व्यवसाय में कितनी अमिदनी हो सकती है?
  9. समाज या बाजार में व्यवसाय की कितनी माँग है?
  10. व्यवसाय में प्रवेश हेतु क्या प्रक्रिया अपनायी जाती है; परीक्षण होता है या नहीं और किस प्रकार का?
  11. उस व्यवसाय का समाज में सम्मान होता है या नहीं? आदि।

प्रश्न 7.
व्यावसायिक निर्देशन के लाभ एवं उपयोगिता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

व्यावसायिक निर्देशन के लाभ एवं उपयोगिता
(Advantages and Utility of Vocational Guidance)

व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति एवं समुदाय के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं लाभकारी सिद्ध होता है। इसकी उपयोगिता को संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है

(1) व्यक्तिगत भेद एवं व्यावसायिक निर्देशन – मनोविज्ञान एवं सर्वमान्य रूप से कोई भी दो व्यक्ति एकसमान नहीं हो सकते और हर मामले में आनुवंशिक और परिवेशजन्य भेद पाये जाते हैं। इन्हीं भेदों के कारण हर व्यक्ति पृथक् एवं दूसरों की अपेक्षा बेहतर कार्य कर सकता है तथा इन्हीं के आधार पर व्यक्ति को सही और उपयुक्त व्यवसाय चुनने होते हैं। व्यावसायिक निर्देशन के माध्यम से व्यक्तिगत गुणों एवं क्षमताओं के आधार पर व्यवसाय चुनने से व्यक्ति को सफलता मिलती है।

(2) व्यावसायिक बहुलता एवं निर्देशन – आजकल व्यवसाय अपनाने का आधार सामाजिक परम्पराएँ व जाति-व्यवस्था नहीं रहा। समय के साथ-साथ व्यावसायिक बहुलता ने व्यवसाय के चुनाव की समस्या को जन्म दिया है। व्यावसायिक निर्देशन में विविध व्यवसायों व कार्यों का विश्लेषण करके उनके लिए आवश्यक गुणों वाले व्यक्ति को चुना जाता है।

(3) सफल एवं सुखी जीवन के लिए सोच – समझकर व्यवसाय चुनने से व्यक्ति के जीवन में स्थायित्व एवं उन्नति आती है। व्यवसाय का उपयुक्त चुनाव सफलता को जन्म देता है जिससे जीवन में सुख और समृद्धि आती है।

(4) आर्थिक लाभ – व्यवसाय में योग्य, सक्षम, बुद्धिमान एवं रुचि रखने वाले कर्मियों को नियुक्त करने से न केवल उत्पादन की मात्रा बढ़ती है, बल्कि उत्पादित वस्तुओं में गुणात्मक वृद्धि भी होती है जिससे व्यवसाय को अधिक लाभ होता है। इस लाभ का अंश कर्मचारियों में भी विभाजित होता है और वे आर्थिक लाभ अर्जित करते हैं।

(5) शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य – विवशतावश किसी व्यवसाय को अपनाने से रुचिहीनता, निराशा, उत्साहविहीनता, कुण्ठाओं एवं तनावों का जन्म होता है; अत: शारीरिक-मानसिक क्षमताओं व शक्तियों का भरपूर लाभ उठाने के लिए तथा दुर्बलताओं से बचने के लिए व्यावसायिक निर्देशन महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी है।

(6) अवांछित प्रतिस्पर्धा की समाप्ति एवं सहयोग में वृद्धि – अच्छे व्यवसाय में पद बहुत कम हैं, जबकि उनके पीछे बेतहाशा दौड़ रहे अभ्यर्थियों की भीड़ अधिक है। इससे अवांछित एवं गला-काट प्रतिस्पर्धा का जन्म हुआ है। व्यावसायिक निर्देशन का सहारा लेकर यदि व्यक्ति अपनी योग्यता, क्षमता वे, शक्ति को आँककर सही व्यवसाय चुन लेगा तो समाज में अवांछित प्रतिस्पर्धा से उत्पन्न भग्नाशा समाप्त हो जाएगी। इससे पारस्परिक सहयोग में वृद्धि होगी।

(7) मानवीय संसाधनों का सुनियोजित एवं अधिकतम उपयोग – मानव-शक्ति को समझना, आँकना और उसके लिए उपयुक्त व्यवसाय की तलाश करना व्यावसायिक निर्देशन का कार्य है। यह निर्देशन राष्ट्रीय नियोजन कार्यक्रम का भी एक महत्त्वपूर्ण अंग है, जिसके अन्तर्गत मानवीय संसाधनों का अधिकाधिक उपयोग सम्भव होता है, जिससे व्यक्तिगत एवं समष्टिगत कल्याण में अभिवृद्धि की जा सकेगी।

(8) समाज की गत्यात्मकता एवं प्रगति – समाज की प्रकृति गत्यात्मक है। हर पल नयी-नयी परिस्थितियाँ जन्म ले रही हैं। बढ़ती हुई मानवीय आवश्यकताओं, उपलब्ध किन्तु सीमित साधनों एवं प्रगति की परिवर्तनशील अवधारणाओं ने मानव व उसके समाज के मध्य समायोजन की दशाओं को विकृत कर डाला है। इस विकृत दशा में सुधार लाने की दृष्टि से तथा व्यावसायिक सन्तुष्टि के विचार को पुष्ट करने हेतु व्यक्ति को उचित कार्य देना होगा। इसके लिए व्यावसायिक निर्देशन ही एकमात्र उपाय दीख पड़ता है।

प्रश्न 8.
व्यावसायिक सूचना के विभिन्न स्रोतों को सामान्य परिचय दीजिए।
या
भारत में व्यवसाय सम्बन्धी सूचनाओं के स्रोत का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

व्यावसायिक सूचना के मुख्य स्रोत

व्यावसायिक निर्देशन एवं व्यवसाय-चयन के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्ति को अपनी रुचियों तथा क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए अनुकूल व्यवसाय की खोज करनी चाहिए। इसके लिए उसे विभिन्न व्यवसायों के विषय में सूचनाएँ एकत्र करनी चाहिए। अपने व्यवसाय और जीवन को गम्भीरता से लेने वाले व्यक्ति स्वयं के अनुकूल व्यवसाय को चयन करने हेतु अनेकानेक स्रोतों से आवश्यक सूचनाएँ एकत्र करते हैं और विभिन्न क्षेत्रों में सफल व्यक्तियों, उच्च पदाधिकारियों तथा संस्थाओं में कार्यरत प्रभावशाली लोगों से सम्पर्क साधते हैं। इसके अलावा समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, पुस्तकों, संचार-साधनों द्वारा प्रकाशित व प्रचारित व्यावसायिक सूचनाओं का तल्लीनता से अवलोकन भी करते है। व्यवसाय से सम्बद्ध ऐसी सूचनाएँ प्रदान करने में व्यावसायिक सूचना कक्ष’ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। व्यावसायिक सूचना के मुख्य स्रोतों का सामान्य परिचय अग्रलिखित है –

(1) समाचार-पत्र – विविध समाचार-पत्रों में रोजगार सम्बन्धी सूचनाएँ प्रकाशित होती हैं जो व्यवसाय के इच्छुक व्यक्ति के लिए आवश्यक तथा उपयोगी हैं। समाचार-पत्र दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक तथा मासिक हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त, सिर्फ रोजगार से सम्बन्धित सूचनाएँ प्रकाशित करने वाले समाचार-पत्र भी प्रकाशित होते हैं।

(2) रोजगार पत्रिकाएँ – अलग-अलग आयु वर्गों तथा योग्यता से सम्बन्धित रोजगार के अवसरों तथा प्रशिक्षण सम्बन्धी सूचनाएँ देने वाली रोजगार पत्रिकाएँ युवा वर्ग का मार्गदर्शन करती हैं। व्यावसायिक सूचना कक्ष में श्रम एवं रोजगार से सम्बद्ध बहुत-सी पत्रिकाएँ मिलती हैं।

(3) सरकारी सूचनाएँ – सरकार की ओर से समय-समय पर बेरोजगार युवक-युवतियों के लाभार्थ सूचनाएँ प्रकाशित की जाती हैं। ऐसी सूचनाएँ राजकीय संस्थानों में नियुक्ति तथा प्रशिक्षण से सम्बन्धित होती हैं।

(4) रोजगार कार्यालय – रिक्त पदों एवं प्रशिक्षण आदि से सम्बन्धित सूचनाएँ रोजगार कार्यालयों से प्राप्त हो सकती हैं। ये कार्यालय बेरोजगार तथा महत्त्वाकांक्षी युवक-युवतियों के लिए समय-समय पर व्यावसायिक सूचनाएँ उपलब्ध करते हैं। इस उद्देश्य से प्रायः प्रत्येक जिले में एक रोजगार कार्यालय होता है।

(5) वार्ताएँ – व्यावसायिक सूचना-कक्ष समय-समय पर विभिन्न प्रकार के व्यवसायों के सम्बन्ध में वार्ताएँ करते हैं। इन वार्ताओं में अलग-अलग क्षेत्रों से विशेषज्ञ आमन्त्रित किये जाते हैं।

(6) औद्योगिक संस्थान – औद्योगिक संस्थानों में समय-समय पर पद रिक्त होते रहते हैं या नये पद सृजित होते हैं। अक्सर बड़े-बड़े प्रतिष्ठान ऐसे पदों का विज्ञापन दैनिक समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, रेडियो या दूरदर्शन के माध्यम से कराते रहते हैं। इसके अलावा औद्योगिक संस्थानों द्वारा व्यावसायिक सूचना केन्द्र को भी अपनी आवश्यकता का ज्ञान कराया जाता है।

प्रश्न 9.
व्यक्तिगत निर्देशन से आप क्या समझते हैं? इसकी आवश्यकता कब पड़ती है? व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
व्यक्तिर्गत निर्देशन का अर्थ बताइए। व्यक्तिगत निर्देशन के सोपानों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर :

व्यक्तिगत निर्देशन का अर्थ
(Meaning of Personal Guidance)

व्यक्ति के जीवन से सम्बन्धित कुछ ऐसी भी समस्याएँ हैं जिन्हें शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन के अन्तर्गत स्थान प्राप्त नहीं होता। ये समस्याएँ उसकी व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याएँ होती हैं। इन समस्याओं के समाधान से सम्बन्धित निर्देशन को व्यक्तिगत निर्देशन (Personal Guidance) कहा जाता है। व्यक्तिगत निर्देशन एक ऐसी सहायता है जो व्यक्ति को उसकी संवेगात्मक सामाजिक, धार्मिक, नैतिक एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को हल करने में प्रदान की जाती है। व्यक्तिगत निर्देशन के फलस्वरूप व्यक्ति निजी व्यक्तित्व का समुचित विकास पर सन्तुलन की अवस्था प्राप्त कर पाता है। इस भाँति व्यक्तिगत निर्देशन से अभिप्राय किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत सहायता देने वाली उस विशिष्ट प्रक्रिया से है जिसके माध्यम से वह अपनी व्यक्तित्व सम्बन्धी समस्याओं के मौलिक कारणों को समझता है, उनके निराकरण का प्रयत्न करता है तथा एक ऐसी जीवन शैली अपनाता है ताकि अपने व्यक्तित्व का सन्तुलित विकास करते हुए वह जीवन की विभिन्न सरल एवं जटिल परिस्थितियों से उपयुक्त समायोजन स्थापित कर सके।

विभिन्न व्यक्तिगत समस्याएँ तथा व्यक्तिगत निर्देशन की आवश्यकता
(Various Personal Problems and Need for Personal Guidance)

आज की संक्रमणकालीन परिस्थितियों में प्रत्येक व्यक्ति का जीवन विभिन्न प्रकार की समस्याओं से भरा हुआ है। व्यक्तिगत समस्याओं और उनके विविध स्वरूपों की विशद् व्याख्या तो यहाँ प्रस्तुत नहीं की जा सकती, किन्तु उन्हें एक प्रारूप के रूप में प्रदर्शित अवश्य किया जा सकता है; यथा –

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 2
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 2

व्यक्तिगत समस्याओं की नींव व्यक्ति के शैशवकाल में ही पड़ जाती है, जबकि उसके जीवन में स्नेह, सुरक्षा, स्वतन्त्रता और उचित पोषण की कमी के कारण भविष्य में असन्तुलन की सम्भावनाएँ बल पकड़ती हैं। व्यक्ति की निजी समस्याएँ दो प्रकार की हो सकती हैं-एक, शारीरिक समस्याएँ तथा दो, मानसिक समस्याएँ। शारीरिक समस्याएँ चिकित्सा के क्षेत्र में आती हैं, किन्तु शारीरिक समस्याओं के कारण उत्पन्न कुछ मानसिक दशाएँ भी निजी समस्याएँ पैदा करती हैं; जैसे—बार-बार रोगग्रस्त होने के कारण दुर्बलत्, चिड़चिड़ापन, थकान, सुस्ती आदि। इन समस्याओं को मानसिक निर्देशन के माध्यम से हल किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त संवेगात्मक समस्याएँ; जैसे-भय, चिन्ता, निराशा आदि का तो मानसिक संमस्याओं के रूप में ही अध्ययन किया जाता है। किशोरावस्था में प्रजनन अंगों के विकास के कारण अनेक यौन समस्याओं का उदय होता है। संकोच या लज्जा के कारण किशोर-किशोरियाँ इन समस्याओं को अभिव्यक्त नहीं कर पाते और अन्धविश्वास व लज्जास्पद घुटन के कारण समस्याएँ उलझती चली जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप ये बढ़ते-बढ़ते भयानक स्वरूप धारण कर लेती हैं।

निजी समस्याओं के अतिरिक्त सामाजिक समयोजन से जुड़ी हुई भी अनेक समस्याएँ हैं; जैसे–पारिवारिक, आर्थिक एवं नैतिक समस्याएँ। पारिवारिक समस्याओं में घरों के कलह, पति-पत्नी के मध्य मनमुटाव, परिवार के अन्य सदस्यों के कारण घर में तनाव की स्थिति आदि प्रमुख हैं। आर्थिक समस्याओं में बेकारी और निर्धनता के कारण घर में आर्थिक तंगी आदि तथा नैतिक समस्याओं में व्यक्ति के आदर्श एवं समाज की यथार्थ स्थिति के बीच संघर्षपूर्ण स्थिति मुख्य हैं। कभी-कभी आदर्शवादी व्यक्ति को भी मजबूरी में रिश्वत जैसे गलत साधनों का प्रयोग करना पड़ता है जिसके परिणामस्वरूप उसे नैतिक द्वन्द्व की स्थिति से होकर गुजरना पड़ता है। यह नैतिक द्वन्द्व अक्सर मानसिक रोगों के रूप में अभिव्यक्त होता है।

कुछ अन्य व्यक्तिगत समस्याएँ –

  1. अतिशय लज्जावृत्ति एवं एकाकीपन के कारण स्वयं को समाज से दूर रखने का प्रयास
  2. अधिक संवेदनशीलता के कारण विषमता का जन्म
  3. अधिक क्रियाशीलता के कारण उद्दण्ड हो जाना
  4. निरर्थक क्रियाएँ; जैसे-अनेक बार लगातार हाथ धोना, हाथ मलते रहना
  5. चोरी, झूठ बोलना, गाली-गलौज, मारपीट तथा काम से पलायन जैसे व्यवहार सम्बन्धी दोष
  6. खुले स्थान, बन्द स्थान, पानी, छत या चूहे जैसी छोटी-छोटी चीजों से डरने सम्बन्धी अकारण भय
  7. अनवरत चिन्ता और उदासी तथा
  8. मनुष्य में दोहरा व्यक्तित्व पन्न हो जाना, इत्यादि दोष व्यक्तित्व से सम्बन्धित हैं और व्यक्तिगत समस्याओं के रूप में प्रकट होते हैं।

व्यक्तिगत निर्देशन, उपर्युक्त वर्णित समस्त व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान हेतु मनोविज्ञान के विशेषज्ञ द्वारा प्रदत्त मार्गदर्शन है। इस मार्गदर्शन को समस्या का समाधान नहीं कहा जा सकता, यह तो समस्या के प्रति व्यक्ति विशेष का दृष्टिकोण परिवर्तित करने वाला एक मनोवैज्ञानिक उपाय है। वस्तुत: यह एक परामर्श या सूत्र है जिसे विशेषज्ञ द्वारा समस्या को पूरी तरह समझ लेने के बाद पीड़ित व्यक्ति को दिया जाता है। यह परामर्श निष्पक्ष, वस्तुनिष्ठ एवं मनोवैज्ञानिक होता है जिससे समस्या से। ग्रस्त व्यक्ति की समझ, लोच तथा परिस्थितियों के साथ सामंजस्य की क्षमता बढ़ जाती है।

व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया के प्रमुख चरण
(Main Steps of the Process of Personal Guidance)

मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया के दो मुख्य पहलू (Aspects) स्वीकार किये हैं – (1) समस्या का निदान (Diagnosis of the Problem) तथा (2) समस्या का उपचार (Treatment of the Problem)। किन्तु कुछ विख्यात विद्वानों ने व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया में स्थूल रूप से पाँच चरण या सोपान स्वीकार किये हैं। प्रक्रिया से सम्बन्धित उपर्युक्त दोनों पहलू भी इन्हीं पाँच सोपानों में सम्मिलित हैं। व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया के ये पाँच सोपान इस प्रकार हैं

(1) तथ्यों का संग्रह (Collection of Data) – व्यक्तिगत निर्देशन का सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण चरण ‘तथ्यों का संग्रह है, क्योंकि समस्या सम्पूर्ण व्यक्तित्व से सम्बन्धित होती है। अतः तथ्यों का संग्रह भी सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विषय में ही होता है। ये तथ्य दो रूपों में एकत्र किये जाते हैं–(अ) समस्या का इतिहास–वह विशेष समस्या कब और किस परिस्थिति में प्रकट हुई? इसे किस प्रकार अनुभव किया गया था और यह किस समय बढ़ी? आदि-आदि। (ब) व्यक्ति का जीवन-वृत्त-व्यक्ति के जीवन पक्षों का सम्पूर्ण विवरण, परिपक्वता एवं अभिवृत्त आदि के विषय में सूचनाएँ एकत्र करना। आवश्यक तथ्यों को हर सम्भव स्रोत से एकत्र किया जाता है तथा एकत्र किये गये तथ्यों को एक आश्व-चित्र के रूप में तैयार कर लिया जाता है।

(2) समस्या का निदान (Diagnosis of Problem) – आवश्यक तथ्यों के संग्रह के उपरान्त मनोवैज्ञानिक या निर्देशक निदान सम्बन्धी क्रियाएँ प्रारम्भ करता है। सरल एवं उत्तम उपचार के लिए अच्छा निदान आवश्यक है। निदान का तात्पर्य उस क्रिया से है जो किसी समस्या के मूल कारणों का पता लगाने के लिए प्रयोग की जाती है। मनोवैज्ञानिक प्राप्त तथ्यों या सूचनाओं को आपस में जोड़कर उनमें निहित प्रतिमानों (Patterns) की खोज करता है। प्रतिमानों के ज्ञान से समस्या की उत्पत्ति के कारणों की खोज की जाती है। मनोवैज्ञानिक तथ्यों का विश्लेषण एवं उनकी इस प्रकार व्याख्या करता है कि उनमें एक सम्बद्धता या रूपरेखा बन जाती है और यहीं से समस्या के वास्तविक कारणों के सही-सही अनुमान की शुरुआत हो जाती है। निदान की क्रिया परामर्शदाता के कौशल तथा पूर्व-अनुभव पर निर्भर होती है। विद्वानों ने इसे समस्या के उपचार की पृष्ठभूमि कहा है जिसकी सफ़लता उपचार की सफलता को सुनिश्चित करती है।

(3) फलानुमान (Prognosis) – फलानुमान (अर्थात् फल का अनुमान) का अभिप्राय यह अनुमान लगाने से है कि मनोवैज्ञानिक या परामर्शदाता समस्या का समाधान प्राप्त करने में कहाँ तक सफल हो सकता है। फलानुमान की क्रिया निदान के साथ-साथ चलती है। उदाहरणार्थ-मान लीजिए, कोई बालक निरन्तर अपनी कक्षा में अनुत्तीर्ण हो रहा है। मनोवैज्ञानिक उसकी बुद्धि का परीक्षण करके पाता है कि उसकी बुद्धि निम्न स्तर की है। इस प्रकार वह निदान करता है कि बालक की परीक्षा में बार-बार असफलता का कारण उसका बौद्धिक स्तर नीचा होना है। इसके साथ मनोवैज्ञानिक यह फलानुमान भी देता है कि बालक उच्च परीक्षा में सफलता प्राप्त नहीं कर सकेगा। लेकिन फलानुमान प्राप्त करना कोई आसान काम नहीं है, यह एक जटिल क्रिया है। इसके लिए अनेक कारक उत्तरदायी हैं; जैसे-पारिवारिक आयु, उच्चाकांक्षाएँ तथा वातावरण। व्यक्तिगत निर्देशन को फलानुमान करने से पहले व्यक्ति को प्रभावित करने वाले सभी कारकों पर ध्यान देना होता है।

(4) चिकित्सा या समस्या का उपचार (Therapy of Treatment of the Problem) – व्यक्तिगत समस्याओं से पीड़ित और परामर्श की इच्छा रखने वाले व्यक्ति की समस्याओं को समझने तथा उनके मूल कारणों की जानकारी प्राप्त करने के बाद उपचार का कार्य प्रारम्भ होता है। परामर्श का इच्छुक व्यक्ति जब अपने से सम्बन्धित समस्त परीक्षणों, साक्षात्कार एवं परिपार्श्व-चित्र का अवलोकन कर लेता है तो उसका दृष्टिकोण बदल जाता है और अपनी समस्या को वह स्वयं ही बहुत कुछ समझे भी लेता है। यही नहीं, समस्या का समुचित समाधान प्राप्त करने के लिए वह कोई-न-कोई उपयुक्त मार्ग भी खोज लेता है। इसी दौरान परामर्शदाता मनोवैज्ञानिक रूप से उसके सामने अपने सुझाव प्रस्तुत करता है। ये सुझाव अनेक प्रकार के व्यवहारों के रूप में होते हैं जिनमें से व्यक्ति कोई एक सुझाव अपने लिए चुन लेता है। उपचार सम्बन्धी सुझाव प्रस्तुत करते समय व्यक्ति की त्रुटियों की ओर संकेत नहीं करना चाहिए और उसे सुझाव कोई उपदेश-सा भी नहीं लगना चाहिए, अन्यथा वह सुझाव के प्रति विरोधी भाव व्यक्त कर सकता है।

(5) अनुवर्ती अनुशीलन (Follow-up Studies) – समस्या समाधान के बाद भी निर्देशक को यह देखना होता है कि व्यक्ति कैसा चल रहा है, उसका व्यक्तित्व पूरी तरह समायोजित है या नहीं, उसमें कोई गड़बड़ी या नया रोग तो उत्पन्न नहीं हो रही है? इसके लिए निर्देशक को व्यक्ति से लगातार सम्पर्क बनाये रखना पड़ता है और उसकी सहायता करनी पड़ती है। इसकी उपयोगिता दो बातों को लेकर है–एक, निर्देशक को अपनी सफलता/असफलता का ज्ञान होता रहता है जिससे उसे निर्देशन प्रक्रिया को सुधारते रहने का अवसर प्राप्त होता है तथा दो, परामर्श प्राप्त करने वाला व्यक्ति यह समझकर सन्तुष्ट रहता है कि निर्देशक उसका हितचिन्तक तथा शुभाकांक्षी है।

प्रश्न 10.
उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवाओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
उत्तर प्रदेश में राज्य स्तर पर, क्षेत्रीय स्तर पर तथा विद्यालय स्तर पर होने वाले निर्देशन कार्यों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवाओं के स्वरूप को विस्तार से लिखिए।
उत्तर :

भारत में निर्देशन सेवाओं के श्रीगणेश का श्रेय हमारे प्रदेश अर्थात् उत्तर प्रदेश को प्राप्त हुआ सर्वप्रथम 1937 ई० में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नियुक्त की गयी ‘आचार्य नरेन्द्र देव शिक्षा पुनर्व्यवस्था समिति ने अपनी रिपोर्ट में विद्यालयों की मनोवैज्ञानिक सेवाओं के लिए उत्तर प्रदेश में एक ‘मनोविज्ञानशाला’ (Bureau of Psychology) स्थापित करने की सिफारिश की थी। 1947 ई० में स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् ही इस सिफारिश को कार्यान्वित किया जा सका और इसे परिणामतः उ०प्र०, शिक्षा विभाग के तत्त्वावधान में ‘मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश, इलाहाबाद’ (Bureau of Psychology U.P, Allahabad) की स्थापना हुई।

उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवा
(Guidance Service in Uttar Pradesh)

मनोविज्ञानशाला उ० प्र०, इलाहाबाद को उद्देश्य माध्यमिक विद्यालयों के छात्रों को शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन प्रदान करना है। प्रथम पंचवर्षीय योजना (1952 ई०) में इस मनोविज्ञानशाला का कार्यक्षेत्र और विस्तृत हुआ तथा उत्तर प्रदेश के पाँच शैक्षिक क्षेत्रों-मेरठ, बरेली, लखनऊ, कानपुर तथा वाराणसी में पाँच जिला मनोविज्ञान केन्द्र खोले गये जिनकी संख्या तृतीय पंचवर्षीय योजना में बढ़कर सात हो गयी, क्योंकि आगरा और गोरखपुर में भी जिला मनोविज्ञान केन्द्र स्थापित हो गये थे। इस भाँति, कुमाऊँ को छोड़कर सभी क्षेत्रों में इस प्रकार के केन्द्र स्थापित कर दिये गये। दूसरी योजना के अन्तर्गत निर्देशन सेवा को विद्यालय स्तर तक पहुँचाने के लिए 25 बहुउद्देशीय विद्यालयों (Multi-purpose Schools) में विद्यालय मनोवैज्ञानिकों (School Psychologists) की नियुक्ति कर दी गयी थी। अब यह संख्या 25 से बढ़कर 53 हो गयी और इस भाँति 53 उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में विद्यालय-मनोवैज्ञानिक कार्यरत हैं।

उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग ने निर्देशन कार्य की व्यवस्था तीन स्तरों पर की है – (1) राज्य स्तर, (2) क्षेत्रीय स्तर तथा (3) विद्यालय स्तर। अब हम उ० प्र० में निर्देशन सेवा के तीनों स्तरों का विवेचन प्रस्तुत करेंगे-

(1) राज्य स्तर पर निर्देशन कार्य (Guidance Services at State Level)

मनोविज्ञानशाला उ० प्र०, इलाहाबाद – राज्य स्तर पर मनोविज्ञानशाला उ० प्र०, इलाहाबाद; सम्पूर्ण राज्य के निर्देशन का कार्य संचालित करती है। इसका प्रमुख कार्य समस्त राज्य के विद्यालयों के लिए मनोवैज्ञानिक सेवाओं की व्यवस्था करना है। मनोविज्ञानशाला के गठन एवं कार्यों का वर्णन इस प्रकार है –

(अ) मनोविज्ञानशाला का गठन – उत्तर प्रदेश मनोविज्ञानशाला के प्रारम्भिक संगठन में कुल मिलाकर पन्द्रह सदस्य विभिन्न पदों पर आसीन होते हैं। पद एवं उन पर कार्यरत अधिकारियों की संख्या इस प्रकार है –

  1. निर्देशक (एक)
  2. वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक (दो)
  3. मनोवैज्ञानिक (तीन)
  4. सहायक मनोवैज्ञानिक (तीन)
  5. व्यावसायिक निर्देशन अधिकारी (एक)
  6. वरिष्ठ परीक्षणकर्ता-पुरुष (एक)
  7. वरिष्ठ परीक्षणकर्ता-स्त्री (एक)
  8. सांख्यिक विशेषज्ञ (एक)
  9. परामर्शदाता (एक)
  10. बाल-निर्देशक (एक)

उल्लेखनीय रूप से डॉ० सोहनलाल एवं डॉ० चन्द्रमोहन भाटिया जैसे विख्यात मनोवैज्ञानिक इस मनोविज्ञानशाला के निर्देशक (Director) पद को सुशोभित कर चुके हैं।

(ब) मनोविज्ञानशाला के कार्य – मनोविज्ञानशाला उ० प्र०, इलाहाबाद के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं-(i) निर्देशन, (ii) प्रशिक्षण, (ii) शोध, (iv) चयन, (v) नियोजन एवं समन्वय तथा (vi) प्रकाशन। इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है –

(i) निर्देशन कार्य (Guidance) – मनोविज्ञानशाला का प्रथम महत्त्वपूर्ण एवं विशिष्ट कार्य शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन देना है, जिसे निपुण मनोवैज्ञानिकों की देख-रेख में वैयक्तिक और सामूहिक आधार पर सम्पन्न किया जाता है

(क) वैयक्तिक निर्देशन – किसी बालक की शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत समस्याओं का निदान व समाधान वैयक्तिक स्तर पर किया जाता है। तीव्र, मन्द या प्रखर बुद्धि के बालकों का मानसिक परीक्षण कर उनके विषय में पूरी जानकारी प्राप्त की जाती है। मानसिक परीक्षण में बुद्धि, रुचि, अभियोग्यता तथा व्यक्तित्व परीक्षण सम्मिलित हैं। साक्षात्कार भी होता है। बालक को परीक्षण की रिपोर्ट दी जाती है। यहाँ की प्रयोगशाला में समस्याग्रस्त बालकों का उपचार क्रीड़ा-चिकित्सा (Play Therapy) से करने की व्यवस्था है। पिछड़े तथा किसी खास विषय में कमजोर बालकों की विशेष सहायता की जाती है।

(ख) सामूहिक निर्देशन – मनोविज्ञानशाला का एक उद्देश्य बालकों को उपयुक्त पाठ्य-विषय में मदद देना है जिसके लिए कई सामूहिक परीक्षण हैं; जैसे-सामान्य मानसिक योग्यता परीक्षण, व्यावसायिक परीक्षण, रुचि परीक्षण तथा अभिरुचि परीक्षण आदि। कक्षा 8 तथा कक्षा 10 के बाद वैकल्पिक विषय चुनने में सामूहिक रूप से निर्देशन भी दिया जाता है। इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत साक्षात्कार के आधार पर निर्देशन तथा परीक्षणों की रिपोर्ट भी बालकों को भेजी जाती है।

(ii) प्रशिक्षण (Training) – मनोविज्ञानशाला द्वारा प्रदत्त ‘डिप्लोमा इन गाइडेन्स साइकोलॉजी प्रशिक्षण कोर्स पास करके मनोविज्ञान के शिक्षार्थी स्वयं निर्देशक बन सकते हैं। सन् 1973 ई० में ‘कैरियर मास्टर कोर्स’ नामक प्रशिक्षण व्यावसायिक निर्देशन के लिए भी दिया गया, जिसमें प्रदेश में मान्यता प्राप्त राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के अध्यापक/अध्यापिकाओं को अपने विद्यालय के शिक्षार्थियों को व्यवसाय-चयन में मदद देने के लिए प्रशिक्षण दिया गया। वस्तुत: यह प्रशिक्षण कार्यक्रम अधिक सफल नहीं हो सका और आगे नहीं चल सका।

(iii) अनुसन्धान कार्य (Research work) – मनोविज्ञानशाला निर्देशन सेवा के लिए अनुसन्धान कार्य भी करती है। यह कार्य विशेष रूप से परीक्षणों के क्षेत्र में किया गया जिसे निष्कर्षतः पाया गया कि भारतीय परिस्थितियों के लिए उपयुक्त मनोवैज्ञानिक परीक्षण उपलब्ध नहीं हैं। अतः विभिन्न प्रकार के मानसिक योग्यताओं के परीक्षणों पर तीन दिशाओं में शोध कार्य शुरू किया गया— (a) परीक्षणों की रचना, (b) परीक्षणों का भारतीयकरण तथा (c) प्रभावीकरण।

(iv) चयन कार्य (Selection) – मनोविज्ञानशाला विभिन्न विभागों को चयन-कार्य में सहायता देती है; जैसे-राज्य के ट्रेनिंग कॉलेजों में प्रशिक्षणार्थ आने वाले अभ्यर्थियों का चयन, शिक्षा विभाग में एक्सटेन्शन विभाग को विभिन्न पदों के चयन में सहायता करना। यह शाला विभिन्न मनोविज्ञान परीक्षाओं के माध्यम से चंयन,की प्रक्रिया द्वारा राज्य के विभिन्न विभागों की सहायता करने का कार्य भी करती है।

(v) नियोजन एवं समन्वय (Planning and Co-ordination) – मनोविज्ञानशाला इस सम्बन्ध में योजना बनाने, निरीक्षण करने व समन्वय करने का कार्य करती है कि राज्य में विभिन्न जिला मनोविज्ञान केन्द्रों तथा विद्यालय मनोवैज्ञानिकों को क्या कदम उठाने होंगे यह शाला राज्य के अन्य विभागों को मार्गदर्शन व परामर्श देती है तथा उनके कार्यों का समन्वय करती है। इसके अलावा समय-समय पर अनेक भाषण-मालाएँ भी आयोजित की जाती हैं।

(vi) प्रकाशन (Publication) – मनोविज्ञानशाला की ओर से मनोविज्ञान और निर्देशात्मक पत्र-पत्रिकाओं व साहित्य का प्रकाशन होता है जिससे अभिभावक, शिक्षक व मनोवैज्ञानिक लाभान्वित होते हैं। सन् 1950 ई० से लेकर आज तक दर्जनों प्रकाशन हुए हैं जिनसे मनोविज्ञान व हिन्दी का साहित्य समृद्ध हुआ है।

(2) क्षेत्रीय स्तर पर निर्देशन कार्य (Guidance Services at Regional Level)

जिला मनोविज्ञान केन्द्र – क्षेत्रीय या मण्डलीय स्तर पर सात जिला मनोविज्ञान केन्द्र अपने क्षेत्र अथवा मण्डल में सम्बन्धित निर्देशन कार्य का संचालन एवं देख-रेख करते हैं।

(अ) जिला मनोविज्ञान केन्द्र का गठन – जिला मनोविज्ञान केन्द्र के संगठन में कुल मिलाकर पाँच सदस्य होते हैं जिनके पद एवं उन पर कार्यरत अधिकारियों की संख्या इस प्रकार है -(i) जिला मनोवैज्ञानिक (एक), (i) व्यावसायिक निर्देशक (दो) तथा (ii) मनोवैज्ञानिक (दो)।

(ब) जिला मनोविज्ञान केन्द्र के प्रमुख कार्य – जिला मनोविज्ञान केन्द्र तीन प्रमुख कार्य करता है–(i) निर्देशन, (ii) अनुसन्धान तथा (iii) प्रकाशन। संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

  1. निर्देशन कार्य (Guidance) – जिला मनोविज्ञान केन्द्रों का मुख्य कार्य अपने-अपने क्षेत्र/मण्डल के माध्यमिक विद्यालय के बालक-बालिकाओं को वैयक्तिक तथा सामूहिक आधार
    पर शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन प्रदान करना है।
  2. अनुसन्धान कार्य (Research work) – निर्देशन कार्य करते हुए प्राप्त तथ्यों के आधार पर अनुसन्धान कार्य तथा अनुवर्ती अध्ययन करना, जिला मनोविज्ञान केन्द्रों का कार्य है।
  3. प्रकाशन कार्य (Publication) – जिला मनोविज्ञान केन्द्र, मनोविज्ञानशाला को निर्देशन सम्बन्धी साहित्य के सृजन तथा प्रकाशन में मदद देते हैं। ये केन्द्र कभी-कभी यह कार्य स्वयं भी करते हैं।

वस्तुतः जिला मनोविज्ञान केन्द्र, मनोविज्ञानशाला, उ०प्र०, इलाहाबाद तथा विद्यालय मनोवैज्ञानिक के बीच जोड़ने वाली कड़ी का काम करते हैं। ये इलाहाबाद से आने वाली सूचनाओं, परीक्षणों व आदेश को विद्यालयों को प्रेषित करते हैं। ये प्रमुखतया शैक्षिक निर्देशन का कार्य करते हैं, लेकिन इनकी संख्या (सात केन्द्र) इतनी सीमित है कि ये इतने विस्तृत एवं बड़े राज्य के सभी माध्यमिक विद्यालयों तक कदापि नहीं पहुँच सकते।

(3) विद्यालय स्तर पर निर्देशन कार्य (Guidance Services at School Level)

विद्यालय-मनोवैज्ञानिक – विद्यालय स्तर पर मनोवैज्ञानिक तीन कार्य करते हैं–(i) निर्देशन , (ii) शिक्षण तथा (ii) अनुसन्धान में सहायता। इन कार्यों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है

  1. निर्देशन कार्य (Guidance) – विद्यालय-मनोवैज्ञानिक का मुख्य कार्य कक्षा 8 के बाद बालकों को वैयक्तिक और समूह आधार पर शैक्षिक निर्देशन तथा 10वीं-12वीं कक्षा के बाद व्यावसायिक निर्देशन और व्यक्तिगत निर्देशन देना है।
  2. शिक्षण कार्य (Teaching) – मनोवैज्ञानिक निर्देशन कार्य की सफलता के लिए शिक्षण कार्य भी करते हैं, ऐसा करके उन्हें बालकों के अधिक निकट आने का अवसर मिलता है।
  3. अनुसन्धान में सहायता (Help in Research work) – विद्यालय-मनोवैज्ञानिक अनुसन्धान कार्य के लिए समय-समय पर निर्देशन सम्बन्धी तथ्य एवं आँकड़े मनोविज्ञानशाला को प्रदान करते हैं।

उपर्युक्त कार्यों के अतिरिक्त –

  1. बालकों का मनोवैज्ञानिक परीक्षण
  2. मनोविज्ञान व निर्देशन से सम्बन्धित वार्ताएँ
  3. पिछड़े बालकों का सुधार व उपचार
  4. प्रतिभाशाली बालकों के लिए विशेष प्रबन्ध
  5. असमायोजित वे कुसमायोजित बालकों को व्यक्तिगत निर्देशन
  6. माता-पिता/अभिभावकों से सम्पर्क स्थापित करना
  7. संचयित लेखा रखना तथा
  8. मनोविज्ञानशाला के लिए क्षेत्रीय खोजकर्ता का कार्य करना आदि कार्य भी विद्यालय मनोवैज्ञानिक करता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निर्देशन का एक सामान्य वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन का एक सामान्य वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत मुख्य रूप से निर्देशन के क्षेत्र को ध्यान में रखा गया है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत निर्देशन के मुख्य रूप से तीन प्रकारों या वर्गों का उल्लेख किया गया है जो कि निम्नलिखित हैं –

(i) शैक्षिक निर्देशन (Educational Guidance) – शिक्षा जीवन-पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया होने के बावजूद भी विशेष तौर पर मानव-जीवन के एक विशिष्ट काल और स्थान से सम्बन्ध रखती है। शैक्षिक जगत् में मनुष्य की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसने अपने अध्ययन के लिए किन विषयों या विशिष्ट क्षेत्र का चयन किया है। शैक्षिक निर्देशन के अन्तर्गत बालक की योग्यताओं व क्षमताओं के अनुसार उपयुक्त अध्ययन-क्षेत्र या विषयों का चुनाव किया जाता है तथा शैक्षिक समस्याओं के समाधान में सहायता प्रदान की जाती है।

(ii) व्यावसायिक निर्देशन (Vocational Guidance) – व्यवसाय व्यक्ति के जीवन-यापन का अनिवार्य माध्यम है जो व्यक्ति की रुचि और योग्यता के अनुसार होना चाहिए। व्यक्तिगत विभिन्नताओं को दृष्टिगत रखते हुए अनुकूल व्यवसाय चुनने में व्यक्ति की मदद करना व्यावसायिक निर्देशन का कार्य है। इसके अतिरिक्त नियोक्ता के लिए उपयुक्त व्यक्ति को तलाशने का कार्य भी इसी के अन्तर्गत आता है।

(iii) व्यक्तिगत निर्देशन (Personal Guidance) – प्रत्येक व्यक्ति का जीवन अनेक व्यक्तिगत समस्याओं से भरा होता है जो परिवार सम्बन्धी, मित्र सम्बन्धी, समायोजन सम्बन्धी, स्वास्थ्य सम्बन्धी, मानसिक ग्रन्थियों सम्बन्धी या यौन सम्बन्धी समस्याएँ हो सकती हैं। व्यक्तिगत समस्याओं का निराकरण व्यक्तिगत निर्देशन के अन्तर्गत होता है।

प्रश्न 2.
निर्देशन विधि के आधार पर किया गया निर्देशन का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :

निर्देशन प्रदान करने की विधि के आधार पर निर्देशन दो प्रकार का है –

(i) वैयक्तिक निर्देशन (Individual Guidance) – सर्वोत्तम समझे जाने वाले इस निर्देशन का प्रयोग व्यक्ति विशेष की गम्भीरतम समस्याओं को हल करने में किया जाता है। इसके अन्तर्गत निर्देशक समस्यायुक्त व्यक्ति से व्यक्तिगत सम्पर्क साधता है, उसका बारीकी से अध्ययन करता है, उसकी समस्याओं को स्वयं समझने का प्रयास करता है और इसके बाद व्यक्ति को इस योग्य बनाता है। कि वह अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं ही प्रस्तुत कर सके। व्यक्ति की समस्याओं का ज्ञान प्राप्त करने हेतु मनोवैज्ञानिक परीक्षण एवं साक्षात्कार के प्रयोग के अतिरिक्त उसकी पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का भी अध्ययन किया जाता है। प्राप्त सूचनाओं के आधार पर एक प्रोफाइल (Profile) तैयार की जाती है।

इस प्रकार के निर्देशन में मनोवैज्ञानिक या विशेषज्ञ एक बार में केवल एक व्यक्ति पर ध्यान दे पाता है। इस कारणवश यह निर्देशन धन और समय की दृष्टि से महँगा पड़ता है। इसके अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक/विशेषज्ञ के अभाव में इसका प्रयोग करना सम्भव नहीं है। अतः वैयक्तिक निर्देशन उसी समय प्रदान किया जाता है जबकि व्यक्ति से सम्बन्धित समस्या की प्रकृति जटिल हो गयी हो और वह सांवेगिक रूप से अत्यधिक उलझ गया हो।

(ii) सामूहिक निर्देशन (Group Guidance) – कभी-कभी एक समूह के समस्त व्यक्तियों की समस्या एक ही या एकंसमान होती है। उस दशा में व्यक्तियों के एक समूह को एक साथ निर्देशन प्रदान किया जाता है जिसे सामूहिक निर्देशन का नाम दिया जाता है। प्रसिद्ध विद्वान् ए० जे० जोन्स ने लिखा है, “सामूहिक निर्देशन वह प्रक्रिया है जो समूह में प्रत्येक व्यक्ति को इस प्रकार व्यक्तिगत सहायता प्रदान करती है जिससे वह अपनी समस्याओं को सुलझा सके तथा समायोजन स्थापित कर सके।” पाठ्य-विषयों के चुनाव से सम्बन्धित शैक्षिक निर्देशन एवं व्यावसायिक निर्देशन में यह विधि अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होती है।

प्रश्न 3.
मायर्स द्वारा प्रतिपादित निर्देशन का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
मायर्स (Myers) के अनुसार समस्याओं के आधार पर निर्देशन के आठ प्रकार बताये गये हैं, जो निम्नलिखित हैं –

  1. शैक्षिक निर्देशन–निर्देशन की यह शाखा व्यक्ति को शिक्षा सम्बन्धी समस्याओं के समाधान में सहायता करती है।
  2. व्यावसायिक निर्देशन-यह शाखा उपयुक्त व्यवसाय के चुनाव में मार्गदर्शन करती है।
  3. सामाजिक तथा नैतिक नैर्देशन—यह शाखा सामाजिक सम्बन्धों को स्वस्थ व दृढ़ बनाने, सामाजिक तनाव को कम करने तथा मनुष्यों की नैतिक मूल्यों में प्रतिष्ठा हेतु परामर्श देती है।
  4. नागरिकता सम्बन्धी निर्देशन–यह शाखा नागरिक के अधिकार एवं कर्तव्यों के सम्बन्ध में निर्देश एवं सुझाव देकर व्यक्ति को श्रेष्ठ नागरिक बनाने में मदद करती है।
  5. समाज-सेवा सम्बन्धी निर्देशन-यह शाखा समाज-सेवा सम्बन्धी कार्यों को सम्पादित करने तथा योजनाओं को पूरा करने में सहायता प्रदान करती है।
  6. नेतृत्व सम्बन्धी निर्देशन-इसके अन्तर्गत लोगों में नेतृत्व की क्षमता का विकास करने सम्बन्धी पथ-प्रदर्शन प्रदान किया जाता है।
  7. स्वास्थ्य सम्बन्धी निर्देशन–इसमें व्यक्तियों को स्वास्थ्य सम्बन्धी सलाह-मशवरा देने तथा अपने परिवार के सदस्यों का स्वास्थ्य बनाये रखने हेतु निर्देश और सुझाव मिलते हैं।
  8. मनोरंजन सम्बन्धी निर्देशन–निर्देशन की इस शाखा के अन्तर्गत लोगों को अपने खाली समय का सदुपयोग करने तथा श्रमोपरान्त मनोरंजन करने के उपायों से अवगत कराया जाता है।

प्रश्न 4.
भारत में निर्देशन की समस्याओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
वर्तमान औद्योगिक एवं नगरीय जीवन में विभिन्न प्रकार के निर्देशन की अत्यधिक आवश्यकता है। निर्देशन की व्यापक व्यवस्था को अनिवार्य माना जा रहा है तथा इसके लिए बहुपक्षीय प्रयास भी किये जा रहे हैं, परन्तु जन-साधारण निर्देशन सेवाओं से समुचित लाभ प्राप्त नहीं कर पा रहा। वास्तव में निर्देशन-क्षेत्र में कुछ समस्याएँ प्रबल हो रही हैं जिनके कारण अंभीष्ट परिणाम प्राप्त नहीं हो रहे। इस क्षेत्र की कुछ मुख्य समस्याओं का विवरण निम्नवर्णित है –

  1. हमारे विद्यालय में कुछ शिक्षकों का दृष्टिकोण पारम्परिक तथा रूढ़िवादी है। इस वर्ग के शिक्षक केवल पारम्परिक ढंग से शिक्षण कार्य ही करते हैं। वे आवश्यक परामर्श एवं निर्देशन की गतिविधियों को कोई महत्त्व नहीं देते।
  2. विभिन्न कारणों से हमारे विद्यालयों में शिक्षा सम्बन्धी आधुनिक साधनों की कमी है। इस स्थिति में निर्देशन के महत्त्व को स्वीकार करते हुए भी यथार्थ में निर्देशन सम्बन्धी समुचित व्यवस्था कर पाना प्रायः सम्भव नहीं होता।
  3. हमारे विद्यालयों में छात्र संख्या बहुत अधिक है। इस स्थिति में प्रभावशाली एवं उपयोगी निर्देशन की व्यवस्था कर पाना कठिन है।
  4. सामान्य रूप से सभी शिक्षकों पर कार्यभार काफी अधिक है। उन्हें शिक्षण के अतिरिक्त भी विभिन्न कार्य करने पड़ते हैं। इस स्थिति में वे छात्रों को आवश्यक निर्देशन देने में प्रायः असमर्थ रहते हैं।
  5. कुछ दृष्टिकोणों से हमारी शिक्षा प्रणाली भी दोषपूर्ण है। हमारी शिक्षा में व्यावसाग्निक पाठ्यक्रमों की समुचित व्यवस्था नहीं है। इस स्थिति में उपर्युक्त निर्देशन की व्यवस्था नहीं हो पा रही।
  6. हमारे देश में निर्देशन तथा परामर्श के क्षेत्र के शोध-कार्यों की समुचित व्यवस्था नहीं है। ऐसे में निर्देशन की उत्तम व्यवस्था कैसे हो सकती है?
  7. हमारे देश में निर्देशन तथा परामर्श के लिए आवश्यक मानक परीक्षणों की समुचित व्यैवस्था नहीं है। इस कमी के कारण भी उत्तम निर्देशन व्यवस्था को कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
  8. वर्तमान समय में हमारे देश में रोजगार के अवसरों की बहुत कमी है तथा बेरोजगारी का बोलबाला है। ऐसे में सफल एवं उत्तम निर्देशन की व्यवस्था कैसे हो सकती है?

प्रश्न 5.
व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

  1. व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी एवं मौलिक कारक व्यक्तिगत भिन्नता है। किसी व्यक्ति-विशेष के लिए कौन-सा व्यवसाय उपयुक्त होगा, इसके लिए व्यवसाय निर्देशन का कार्यक्रम अपेक्षित एवं अपरिहार्य है।
  2. विभिन्न व्यक्तियों में शरीर, मन या बुद्धि, योग्यता, स्वभाव, रुचि, अभिरुचि तथा व्यक्तित्व के अनेकानेक तत्त्वों की दृष्टि से पर्याप्त अन्तर दृष्टिगोचर होता है। व्यक्ति द्वारा चुने गये व्यवसाय एवं इन वैयक्तिक भिन्नताओं के मध्य समायोजन की दृष्टि से व्यावसायिक निर्देशन आवश्यक है।
  3. व्यक्ति और उसके समाज की दृष्टि से भी व्यवसाय में निर्देशन की जरूरत महसूस की जाती है। व्यक्ति द्वारा चयन किया गया व्यवसाय यदि उसकी वृत्तियों के अनुकूल हो और उसके माध्यम से वह अपना समुचित विकास स्वयं कर सके तो उसका जीवन सुखी हो सकता है। व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति की आजीविका के सम्बन्ध में अभीष्ट सहायता कर उसके हित में कार्य करता है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति का सुख मिलकर ही समूचे समाज को सुखी बनाता है।
  4. मानव संसाधनों का संरक्षण तथा व्यक्तिगत साधनों का समुचित उपयोग व्यावसायिक निर्देशन के बिना सम्भव नहीं है। व्यक्ति का आर्थिक विकास, प्रगति एवं समृद्धि उसके जीवन में प्रसन्नता उत्पन्न करती है= जिसके लिए व्यावसायिक निर्देशन की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।
  5. अनेकानेक व्यवसायों के लिए भिन्न-भिन्न क्षमताओं व योग्यताओं से युक्त व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। व्यावसायिक निर्देशन के माध्यम से किसी विशेष व्यवसाय के लिए विशेष क्षमता व योग्यता वाले उपयुक्त व्यक्तियों का सुगम व प्रभावशाली चयन किया जा सकता है।
  6. समाज गत्यात्मक एवं क्रियाशील है जिसकी परिस्थितियाँ एवं कार्य द्रुत गति से परिवर्तित हो। रहे हैं। नये-नये परिवर्तनों के साथ तालमेल बिठाने के लिए भी व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता पड़ती है। निष्कर्षत: व्यक्तिगत भिन्नता, व्यावसायिक बहुलता, विविध व्यवसायों से सम्बन्धित जानकारी तथा वातावरण के साथ उचित सामंजस्य बनाने के लिए व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता पड़ती।

प्रश्न 6.
कार्य के स्वरूप की दृष्टि से व्यवसायों का एक वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
कार्य के स्वरूप को ध्यान में रखकर व्यवसायों के निम्नलिखित वर्ग या प्रकार निर्धारित किये गये हैं

(i) पढ़ने-लिखने तथा मौलिक विचारों से सम्बन्धित व्यवसाय – इन व्यवसायों में सूक्ष्म बातों की खोज करके नवीन विचारों का प्रतिपादन किया जाता है। साहित्यकार, कवि, निबन्धकार, कथाकार, लेखक, नाटककार, वैज्ञानिक तथा दार्शनिक आदि सभी प्रकार के व्यवसाय इसी कोटि में आते हैं।

(ii) सामाजिक व्यवसाय – इस प्रकार के व्यवसायों में सामाजिक सम्पर्को व सम्बन्धों को आधार बनाया जाता है। डॉक्टर, वकील, नेता, दुकानदार, जीवन बीमा निगम के एजेण्ट आदि सभी के व्यवसाय सामाजिक सम्बन्धों पर आधारित होते हैं।

(iii) कार्यालय से सम्बन्धित व्यवसाय – आय-व्यय का हिसाब रखना, फाइलों को समझना उन पर टिप्पणी लिखना तथा व्यावसायिक-पत्रों के उत्तर देने आदि कार्यों का समावेश इस प्रकार के व्यवसायों में होता है। क्लर्क, मुनीम, कार्यालय अधीक्षक, मैनेजर, एकाउन्टेन्ट आदि इस वर्ग के
व्यवसाय हैं।

(iv) हस्त-कौशल सम्बन्धी व्यवसाय – इन व्यवसायों में विभिन्न यन्त्रों की सहायता से किसी-न-किसी चीज का निर्माण किया जाता है; जैसे-लोहार, मिस्त्री, बढ़ई, चर्मकार, जिल्दसाज, ओवरसियर व इन्जीनियर आदि।

प्रश्न 7.
व्यावसायिक निर्देशन के दृष्टिकोण से बैकमैन द्वारा प्रतिपादित व्यवसायों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
बैकमैन ने व्यक्ति की शिक्षा, बौद्धिक स्तर, प्रशिक्षण तथा सामाजिक सम्मान आदि कारकों को ध्यान में रखते हुए व्यवसायों के निम्नलिखित पाँच वर्गों का उल्लेख किया है –

(i) प्रशासकीय एवं उच्च स्तरीय व्यवसाय – इसके तीन उपवर्ग हैं -(क) भाषा सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे—विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, लेखक, वकील, सम्पादक, जज आदि। (ख) विज्ञान, सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे-डॉक्टर, इन्जीनियर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, ऑडिटर, एकाउण्टेन्ट आदि। (ग) प्रशासकीय व्यवसाय; जैसे—प्रशासक तथा मैनेजर आदि के व्यवसाय।।

(ii) व्यापार एवं मध्यम स्तरीय व्यवसाय-इसके दो उपवर्ग हैं – (क) व्यापार सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे-व्यापारी, विज्ञान के एजेण्ट, दुकानदार आदि। (ख) मध्यम स्तर के व्यवसाय; जैसे-डिजाइनर, अभिनेता, फोटोग्राफर आदि।।

(iii) कुशलतापूर्ण व्यवसाय – इनमें किसी-न-किसी कौशल की आवश्यकता होती है। इसके अन्तर्गत दो प्रकार के कौशल उपवर्ग हैं–(क) शारीरिक कौशल सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे-हँगाई, छपाई, बढ़ईगीरी, दर्जीगिरि, मिस्त्री आदि। (ख) बौद्धिक कौशल सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे-लिपिक, स्टेनोग्राफर, खजांची आदि।

(iv) अर्द्ध-कुशलतापूर्ण व्यवसाय – इनमें कुछ कौशल और कुछ यन्त्रवत् कार्य सम्मिलित हैं; जैसे-गार्ड, कण्डक्टर, पुलिस और ट्रैफिक का सिपाही, कार या ट्रक का ड्राइवर आदि।

(v) निम्न स्तरीय व्यवसाय – इन व्यवसायों में बुद्धि का सबसे कम प्रयोग किया जाता है; जैसे-चपरासी, चौकीदार, कृषि कार्य, रिक्शा-चालक, बोझा ढोना, मिल-मजदूर आदि।

प्रश्न 8.
व्यावसायिक कुशलता और रुचि के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
मनुष्य के जीवन में जीविकोपार्जन की समस्या महत्त्वपूर्ण है। जीविकोपार्जन का प्रत्यक्ष, स्थायी एवं महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध ‘व्यावसायिक कुशलता (Job Efficiency) से है। व्यावसायिक दृष्टि से कुशल व्यक्ति ही अपनी आजीविका कमाने में सफलता प्राप्त करता है। व्यावसायिक कुशलता का रुचि से गहरा सम्बन्ध है। डेवर के अनुसार, “रुचि किसी प्रवृत्ति का क्रियात्मक रूप है।” कार्य में रुचि रहने से कार्य अत्यन्त सरलता से किया जा सकता है, कठिन कार्य भी काफी सरल महसूस होता है। और व्यक्ति का ध्यान (अवधान) सम्बन्धित व्यवसाय में लगा रहता है।

रुचि परिवर्तनशील कही जाती है क्योंकि किसी खास व्यवसाय या कार्य में व्यक्ति की रुचि न होने पर भी बाद में उसकी रुचि पैदा की जा सकती है। यदि व्यक्ति में आवश्यक रुचियों के अंकुर पहले से हों तो वे कार्य से सम्बन्धित अन्य योग्यताओं के साथ मिलकर व्यावसायिक चयन की प्रक्रिया को सहज बना देते हैं। इन परिस्थितियों में यह निर्णय लेना ही श्रेयस्कर होगा कि व्यक्ति को उस व्यवसाय में जाना चाहिए जिसके प्रति पहले से रुचि हो और उसके लिए अन्य आवश्यक गुण भी मौजूद हों। निष्कर्षतः रुचि के कारण व्यावसायिक कुशलता पुष्ट एवं विकसित होती है।

प्रश्न 9.
टिप्पणी लिखिए-व्यावसायिक रुचि प्रपत्र।
उत्तर :
व्यक्ति की रुचि जानने की दृष्टि से क्यूडर द्वारा निर्मित प्रपत्र’ पर आधारित करके इलाहाबाद मनोविज्ञानशाला में व्यावसायिक रुचि प्रपत्र (Vocational Preference Record) विकसित किया गया है, जिसमें समस्त व्यवसायों को दस बड़े रुचि क्षेत्रों में बाँटा गया है। इस सन्दर्भ में, निम्नलिखित तालिका से विभिन्न रुचियों का व्यवसाय से सम्बन्ध ज्ञात होता है –

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 3
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 3

प्रश्न 10.
निर्देशन तथा मनोवैज्ञानिक परीक्षण में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन तथा मनोवैज्ञानिक परीक्षण में अन्तर

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 4
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 4
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 5
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 5

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शैक्षिक निर्देशन तथा व्यावसायिक निर्देशन का सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
शैक्षिक निर्देशन और व्यावसायिक निर्देशन एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। शैक्षिक निर्देशन के बाद व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता होती है, क्योंकि मानव-जीवन की सफलता इसी निर्देशन पर निर्भर करती है। शिक्षा ग्रहण करते समय विद्यार्थी उन्हीं विषयों का चयन करता है, जिनका ज्ञान उसके व्यावसायिक जीवन के लिए आवश्यक होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि शैक्षिक तथा व्यावसायिक निर्देशन की समान उपयोगिता और महत्त्व है।

प्रश्न 2.
वैयक्तिक तथा सामूहिक निर्देशन में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन की विधि के आधार पर किये गये वर्गीकरण के अन्तर्गत निर्देशन के दो वर्ग निर्धारित किये गये हैं, जिन्हें क्रमश: वैयक्तिक निर्देशन तथा सामूहिक निर्देशन कहा जाता है। इन दोनों  में मुख्य अन्तर निम्नलिखित हैं –

  1. वैयक्तिक निर्देशन में एक समय में केवल एक व्यक्ति को निर्देशन प्रदान किया जाता है, जबकि सामूहिक निर्देशन में सम्बन्धित समूह को एक साथ निर्देशन प्रदान किया जाता है।
  2. वैयक्तिक निर्देशन से अधिक लाभ प्राप्त होता है, जबकि सामूहिक निर्देशन से सीमित लाभ की सम्भावना होती हैं।
  3. वैयक्तिक निर्देशन में समय एवं धन अधिक खर्च होता है, जबकि सामूहिक निर्देशन में धन एवं समय कम खर्च होता है।
  4. वैयक्तिक निर्देशन के लिए अधिक संख्या में विशेषज्ञ निर्देशकों की आवश्यकता होती है, जबकि सामूहिक निर्देशन में ऐसा नहीं होता है।

प्रश्न 3.
व्यावसायिक निर्देशन के मुख्य उद्देश्य लिखिए।
उत्तर :
व्यावसायिक निर्देशन स्वयं में उपयोगी एवं आवश्यक प्रक्रिया है। व्यावसायिक निर्देशन का मुख्य उद्देश्य सम्बन्धित व्यक्ति को उसकी योग्यता एवं क्षमता के अनुसार व्यवसाय चुनने में सहायता प्रदान करना है। इसके अतिरिक्त इसका एक अन्य उद्देश्य प्रत्येक कार्य के लिए योग्य व्यक्ति के चुनाव में सहायता प्रदान करना भी है। व्यावसायिक निर्देशन से समाज एवं राष्ट्र की उन्नति एवं प्रगति भी एक उद्देश्य है।

प्रश्न 4.
शैक्षिक निर्देशन से किसी विद्यार्थी को क्या लाभ होता है?
उत्तर :
शैक्षिक निर्देशन केवल विद्यार्थियों के लिए ही आयोजित किया जाता है। शैक्षिक निर्देशन से विद्यार्थियों को पाठ्य-विषयों के चुनाव में सहायता प्राप्त होती है तथा भावी शिक्षा के स्वरूप को निर्धारित करने में सहायता प्राप्त होती है। शैक्षिक निर्देशन प्राप्त करके छात्र विद्यालय के वातावरण में अच्छे ढंग से समायोजित हो जाते हैं। शैक्षिक निर्देशन से छात्र एक हद तक अनुशासित बने रहते हैं, इससे अनेक लाभ होते हैं। शैक्षिक निर्देशन से छात्र-छात्राओं के परीक्षा में सफल होने की दर बढ़ जाती है। इससे अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या घटती है। शैक्षिक निर्देशन छात्रों को जीविका-उपार्जन के क्षेत्र में भी सहायता प्रदान करता है।

प्रश्न 5.
शैक्षिक निर्देशन की किन्हीं दो आवश्यकताओं के बारे में लिखिए।
उत्तर :

  1. विद्यालय के वातावरण में समायोजित होने के लिए शैक्षिक निर्देशन की आवश्यकता होती है।
  2. पाठ्य-विषयों के चुनाव तथा भावी जीवन के विषय में निर्णय लेने के लिए निर्देशन की आवश्यकता है।

प्रश्न 6.
व्यक्तिगत निर्देशन की आवश्यकता क्यों पड़ती है ?
उत्तर :
निर्देशन के दो स्वरूप सम्भव हैं – सामूहिक निर्देशन तथा व्यक्तिगत निर्देशन। किसी व्यक्ति की गम्भीर, जटिल एवं विशिष्ट प्रकार की समस्या के उपयुक्त समाधान प्राप्त करने के लिए या निवारण के लिए व्यक्तिगत निर्देशन की आवश्यकता है। व्यक्तिगत निर्देशन में गहनता पर बल दिया जाता है। निर्देशन के इस स्वरूप के अन्तर्गत सम्बन्धित समस्या का विस्तृत विश्लेषण किया जाता है। तथा समस्या का सर्वोत्तम हल खोजा जाता है।

प्रश्न 7.
रुचियों के आधार पर किये गये व्यवसायों के वर्गीकरण का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
व्यवसायों को एक वर्गीकरण व्यक्तियों की रुचियों के आधार पर भी किया गया है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत किया गया व्यवसायों का वर्गीकरण इस प्रकार है-

  1. यान्त्रिक व्यवसाय
  2. गणनात्मक व्यवसाय
  3. बाह्य जीवन से सम्बन्धी व्यवसाय
  4. वैज्ञानिक व्यवसाय
  5. कलात्मक व्यवसाय
  6. प्रभावात्मक व्यवसाय
  7. साहित्यिक व्यवसाय
  8. संगीतात्मक व्यवसाय
  9. समाज सेवी सम्बन्धी व्यवसाय तथा
  10. लिपिक सम्बन्धी व्यवसाय।

प्रश्न 8.
व्यक्तिगत निर्देशन के लिए तथ्य-संग्रह के साधनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
व्यक्तिगत निर्देशन के लिए सम्बन्धित व्यक्ति के जीवन से सम्बन्धित विस्तृत जानकारी आवश्यक है। इसके लिए तथ्यों को विभिन्न साधनों से एकत्र किया जाता है। इस प्रकार के मुख्य साधन हैं –

  1. निरीक्षण
  2. प्रश्नावली
  3. साक्षात्कार
  4. डॉक्टरी जाँच
  5. जीवन-वृत्त
  6. सामूहिक अभिलेख
  7. बुद्धि, मानसिक योग्यताओं, अभिरुचि तथा रुचि सम्बन्धी परीक्षण
  8. विद्यालय का संचित आलेख
  9. सामान्य सेवाओं के औपचारिक आलेख; जैसे-जन्म-मृत्यु लेखा, अस्पतालों के आलेख, न्यायालय व सामाजिक एवं अन्वेषणात्मक क्रियाएँ।

प्रश्न 9.
निर्देश की प्रक्रिया के अन्तर्गत तैयार किये गये परिपाश्र्व-चित्र की रूपरेखा का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत विभिन्न स्रोतों एवं उपायों द्वारा आवश्यक तथ्यों को अर्जित किया जाता है तथा निर्देशन को अधिक उपयोग बनाने के लिए परिपार्श्व-चित्र तैयार किया जाता है। इस प्रकार परिपार्श्व-चित्र की रूपरेखा के अन्तर्गत अपनाये गये तथ्य इस प्रकार होते हैं-

  1. शारीरिक विवरण
  2. पारिवारिक विवरण
  3. पात्र के सामाजिक विकास का इतिहास
  4. विद्यालयी जीवन का इतिहास
  5. मानसिक योग्यताएँ तथा
  6. व्यक्तित्व के गुण।

प्रश्न 10.
अनुवर्ती अनुशीलन की विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन की प्रक्रिया में अनुवर्ती अनुशीलन का विशेष महत्त्व होता है। अनुवर्ती अनुशीलन द्वारा ही निर्देशन की सफलता/असफलता की जानकारी प्राप्त होती है। अनुवर्ती अनुशीलन के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियाँ हैं –

  1. परामर्श प्राप्त करने वाले व्यक्ति से पत्रों द्वारा सम्पर्क स्थापित करना
  2. व्यक्ति को सरल एवं स्पष्ट भाषा में तैयार की गयी प्रश्नावली भेजना
  3. व्यक्ति के सम्बन्ध में एक कार्ड-फाइल बनाना तथा
  4. टेलीफोन के माध्यम से विचार-विनिमय करना।

प्रश्न 11.
मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश निर्मित/संशोधित मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश द्वारा निर्मित/संशोधित मुख्य मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का विवरण निम्नलिखित है –

  1. शाब्दिक सामूहिक परीक्षण (वर्ष 12 +, 13+, 14 +, तथा वयस्कों के लिए-चार)।
  2. अशाब्दिक सामूहिक परीक्षण–पाँच।
  3. व्यक्तित्व परीक्षण (WAT, TAT’ एवं Rorscharch)-तीन।
  4. व्यक्तित्व पत्री।
  5. स्टैनफोर्ड बुद्धि परीक्षण का भारतीयकरण।
  6. उपलब्धि परीक्षण हिन्दी में (कक्षा 8 व कक्षा 10 के लिए)।
  7. व्यावसायिक रुचि प्रपत्र।
  8. यान्त्रिक अभिरुचि परीक्षण–एक।
  9. ट्वीजर यथार्थता व स्थिर परीक्षण–एक।
  10. डेटरॉय शारीरिक सामर्थ्य परीक्षण–तीन (अनुकूलित)

नवीन परीक्षण ये हैं – (1) सोहनलाल बुद्धि परीक्षण (11 + के लिए), (2) भाटिया बैट्री क्रियात्मक बुद्धि परीक्षण, (3) शाब्दिक सामूहिक बुद्धि परीक्षण (कक्षा 8 के लिए) तथा (4) गणित व अंग्रेजी में सामूहिक उपलब्धि परीक्षण।

प्रश्न 12.
उत्तर प्रदेश में गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा होने वाले निर्देशन कार्य का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
उत्तर प्रदेश में सरकारी संस्थाओं के अतिरिक्त अन्य विभागों, गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा भी निर्देशन किया जाता है। प्रदेश में श्रम विभाग की तरफ से लखनऊ, इलाहाबाद, आगरा, मेरठ तथा कानपुर में रोजगार कार्यालयों के अन्तर्गत व्यावसायिक निर्देशन विभाग स्थापित किये गये हैं जिनके द्वारा प्रतिवर्ष हजारों बालक-बालिकाओं को व्यावसायिक परामर्श प्रदान किया जाता है। राज्य के समाज कल्याण विभाग की ओर से आगरा व बनारस में शिशु निर्देशन केन्द्र कार्य कर रहे हैं जिनमें शिशुओं को निर्देशन दिया जाता है। व्यावसायिक निर्देशन कार्य में समन्वय स्थापित करने की दृष्टि से प्रान्तीय समन्वय समिति तथा युवक सेवायोजन सलाहकार समिति का निर्माण किया गया है। इसके अतिरिक्त, लखनऊ विश्वविद्यालय तथा बी० आर० कॉलेज, आगरा में भी मनोवैज्ञानिक निर्देशन एवं परामर्श के साथ मनोवैज्ञानिक परीक्षा तथा अनुसन्धान सम्बन्धी कार्य किया जाता है। इस भाँति, उत्तर प्रदेश में शैक्षिक व्यावसायिक निर्देशन का कार्य राज्य, मण्डल तथा विद्यालयी स्तर से लेकर केन्द्र तक विस्तृत है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखितं वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. किसी व्यक्ति की समस्या के समाधान में सहायता प्रदान करने की प्रक्रिया को मनोविज्ञान की भाषा में …………………. कहते हैं।
  2. निर्देशन मूल रूप में सामाजिक सम्पर्क पर आधारित एक …………………. प्रक्रिया है।
  3. शैक्षिक वातावरण से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान के लिए दिया जाने वाला निर्देशन …………………. कहलाता है।
  4. कभी-कभी माता-पिता की उच्च …………………. बालक को अनुपयुक्त पाठ्यक्रम चुनने के लिए प्रोत्साहित करती है।
  5. व्यवसाय वरण अथवा व्यवसाय सम्बन्धी समस्या के समाधान के लिए दिया जाने वाला निर्देशन …………………. कहलाता है।
  6. व्यक्ति की जटिल समायोजन सम्बन्धी के समाधान के लिए दिए जाने वाले निर्देशन की …………………. निर्देशन कहते हैं।
  7. व्यक्ति के व्यक्तिगत अथवा पारिवारिक जीवन से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान के लिए दिये जाने वाले निर्देशन को …………………. कहते हैं।
  8. एक समय में केवल एक व्यक्ति को निर्देशन प्रदान करने वाली निर्देशन-प्रक्रिया को …………………. कहते हैं।
  9. एक समय में अनेक व्यक्तियों को किसी समान समस्या के समाधान के लिए दिये जाने वाले निर्देशन को …………………. कहते हैं।
  10. शैक्षिक निर्देशन तथा व्यावसायिक निर्देशन …………………. है।
  11. उत्तम निर्देशन के लिए व्यक्ति का मनोवैज्ञानिक परीक्षण …………………. होता है।
  12. उत्तम शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया में व्यक्ति का …………………. परीक्षण सहायक होता है।
  13. उत्तम व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया में व्यक्ति का …………………. परीक्षण सहायक लेता है।
  14. निर्देशन प्रक्रिया में निर्देशन के परिणामों को जानने के अन्तिम चरण को …………………. कहते हैं।
  15. …………………. में स्थित मनोविज्ञानशाला इस प्रदेश की निर्देशन सेवाओं का संचालन करती है।
  16. इस प्रदेश में मनोवैज्ञानिक निर्देशन और परामर्श प्रदान करने वाली प्रमुख राजकीय संस्था का नाम …………………. है।

उत्तर :

  1. निर्देशन
  2. मनोवैज्ञानिक
  3. शैक्षिक निर्देशन
  4. आकांक्षा
  5. व्यावसायिक निर्देशन
  6. व्यक्तिगत
  7. व्यक्तिगत निर्देशन
  8. वैयक्तिक निर्देशन
  9. सामूहिक निर्देशन
  10. परस्पर पूरक
  11. आवश्यक
  12. बौद्धिक
  13. अभिरुचि
  14. अनुवर्ती अनुशीलन
  15. इलाहाबाद।
  16. मनोविज्ञानशाला।

प्रश्न II.
निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
निर्देशन से क्या आशय है?
उत्तर :
किसी भी व्यक्ति को किसी भी समस्या के समाधान के लिए किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दी जाने वाली सहायता को निर्देशन कहते हैं।

प्रश्न 2.
निर्देशन की एक सरल एवं स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
जोन्स के अनुसार, “निर्देशन एक ऐसी व्यक्तिगत सहायता है जो एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को, जीवन के लक्ष्यों को विकसित करने व समायोजन करने और लक्ष्यों की प्राप्ति में आयी हुई समस्याओं को हल करने के लिए प्रदान की जाती है।”

प्रश्न 3.
निर्देशन का कार्य सामान्य रूप से किस क्षेत्र के विद्वानों को सौंपा जाता है?
उत्तर :
निर्देशन का कार्य सामान्य रूप से मनोविज्ञान के क्षेत्र के विद्वानों को सौंपा जाता

प्रश्न 4.
क्या निर्देशक सम्बन्धित व्यक्ति की समस्या को स्वयं सुलझाता है तथा उसका आवश्यक कार्य करता है?
उत्तर :
नहीं, निर्देशक न तो सम्बन्धित व्यक्ति की समस्या को स्वयं सुलझाता है और न ही उसका कोई आवश्यक कार्य करता है।

प्रश्न 5.
निर्देशन की आवश्यकता किस व्यक्ति को होती है?
उत्तर :
प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में कभी-न-कभी अनिवार्य रूप से निर्देशन की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6.
सामान्य वर्गीकरण के अन्तर्गत निर्देशन के कौन-कौन से प्रकार सम्मिलित किये जाते हैं?
उत्तर :
सामान्य वर्गीकरण के अन्तर्गत

  1. शैक्षिक निर्देशन
  2. व्यावसायिक निर्देशन तथा
  3. व्यक्तिगत निर्देशन को सम्मिलित किया जाता है।

प्रश्न 7.
निर्देशन-विधि के आधार पर निर्देशन के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन-विधि के आधार पर निर्देशन के दो प्रकार होते हैं –

  1. वैयक्तिक निर्देशन तथा
  2. सामूहिक निर्देशन।

प्रश्न 8.
शैक्षिक निर्देशन की रुथ स्ट्रांग द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
रुथ स्ट्रांग के अनुसार, “व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने का मुख्य लक्ष्य उसे समुचित कार्यक्रम के चुनाव तथा उसमें प्रगति करने में सहायता प्रदान करता है।”

प्रश्न 9.
उत्तम शैक्षिक निर्देशन के लिए बालक के सम्बन्ध में कौन-कौन सी जानकारी प्राप्त करना आवश्यक होता है?
उत्तर :

  1. बौद्धिक स्तर
  2. शैक्षिक सम्प्राप्ति
  3. मानसिक योग्यताएँ
  4. विशिष्ट मानसिक योग्यता एवं अभिरुचियाँ
  5. रुचियाँ
  6. व्यक्तित्व की विशेषताएँ
  7. शारीरिक दशा तथा
  8. पारिवारिक स्थिति।

प्रश्न 10.
व्यावसायिक निर्देशन की क्रो एवं क्रो द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
क्रो एवं क्रो के अनुसार, “व्यावसायिक निर्देशन की व्याख्या सामान्यतः उस सहायता के रूप में की जाती है, जो विद्यार्थियों को किसी व्यवसाय को चुनने, उसके लिए तैयारी करने तथा उसमें उन्नति प्राप्त करने के लिए दी जाती है।”

प्रश्न 11.
व्यावसायिक सूचना के मुख्य स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. समाचार पत्र-पत्रिकाएँ
  2. रोजगार पत्रिकाएँ
  3. सरकारी सूचनाएँ
  4. रोजगार कार्यालय
  5. वार्ताएँ
  6. औद्योगिक संस्थानों की विज्ञप्ति।

प्रश्न 12.
व्यक्तिगत निर्देशन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर :
व्यक्तिगत निर्देशन से अभिप्राय किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत सहायता देने वाली उस विशिष्ट प्रक्रिया से है जिसके माध्यम से वह अपनी व्यक्तित्व सम्बन्धी समस्याओं के मौलिक कारणों को समझता है तथा उनके निराकरण का प्रयत्न करता है।

प्रश्न 13.
क्रो एवं क्रो द्वारा प्रतिपादित व्यक्तिगत निर्देशन की परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
क्रों एवं क्रो के अनुसार, “व्यक्तिगत निर्देशन वह सहायता है जो किसी व्यक्ति के जीवन के समस्त क्षेत्रों में, रवैयों और व्यवहार के विकास में ठीक तालमेल बैठाने हेतु दी जाती है।”

प्रश्न 14.
व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया के प्रमुख चरणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. तथ्यों का संग्रह
  2. समस्या का निदान
  3. फलानुमान
  4. समस्या का उपचार तथा
  5. अनुवर्ती अनुशीलन।

प्रश्न 15.
उत्तर प्रदेश में राज्य स्तर पर निर्देशन सेवाओं का संचालन किस केन्द्र द्वारा होता है?
उत्तर :
उत्तर प्रदेश में राज्य स्तर पर निर्देशन सेवाओं का संचालन मनोविज्ञानशाला उ० प्र०, इलाहाबाद के द्वारा होता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

प्रश्न 1.
किसी व्यक्ति की किसी समस्या के समाधान के लिए किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दी जाने वाली सहायता को कहते हैं –
(क) व्यक्तिगत सहायता
(ख) निर्देशन
(ग) आवश्यक सहायता
(घ) अनावश्यक हस्तक्षेप

प्रश्न 2.
“निर्देशन एक प्रक्रिया है जो कि नवयुवकों को स्वयं अपने से, दूसरे से तथा परिस्थितियों से समायोजन करना सिखाती है।” यह परिभाषा प्रतिपादित की है
(क) स्किनर
(ख) जोन्स
(ग) मॉरिस
(घ) हसबैण्ड

प्रश्न 3.
निर्देशन को आवश्यक एवं उपयोगी माना जाता है –
(क) सुचारु बाल-विकास के लिए।
(ख) शैक्षिक एवं व्यावसायिक समस्याओं के निराकरण के लिए
(ग) व्यक्तित्व के सामान्य विकास के लिए।
(घ) उपर्युक्त सभी के लिए।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन निर्देशन प्रक्रिया की विशेषता नहीं है?
(क) निर्देशन एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है
(ख) निर्देशन समायोजन स्थापित करने की प्रक्रिया है
(ग) निर्देशन समस्या समाधान की प्रक्रिया है।
(घ) निर्देशन केवल बच्चों को सहायता पहुँचाने की प्रक्रिया है।

प्रश्न 5.
स्कूल अथवा कॉलेज में छात्र-छात्राओं की समस्याओं के समाधान के लिए दिया जाने वाला निर्देशन कहलाता है –
(क) आवश्यक निर्देशन
(ख) अनावश्यक निर्देशन
(ग) व्यावसायिक निर्देशन
(घ) शैक्षिक निर्देशन

प्रश्न 6.
पाठ्य विषयों के चुनाव सम्बन्धी समस्या के समाधान के लिए दिया जाने वाला निर्देशन कहलाता है
(क) सामाजिक निर्देशन
(ख) व्यक्तिगत निर्देशन
(ग) शैक्षिक निर्देशन
(घ) व्यावसायिक निर्देशन

प्रश्न 7.
शैक्षिक सफलता में सहायता पहुँचाने के लिए दिया जाना वाला निर्देशन कहलाता है
(क) सामाजिक निर्देशन
(ख) व्यक्तिगत निर्देशन
(ग) शैक्षिक निर्देशन
(घ) व्यावसायिक निर्देशन

प्रश्न 8.
अनुकूल व्यवसाय के वरण के लिए दिया जाने वाला निर्देशन कहलाता है
(क) महत्त्वपूर्ण निर्देशन
(ख) अनावश्यक निर्देशन
(ग) शैक्षिक निर्देशन
(घ) व्यावसायिक निर्देशन

प्रश्न 9.
वैयक्तिकनिर्देशन के विषय में सत्य है
(क) इसके परिणाम अच्छे नहीं होते।
(ख) इसमें कम समय तथा कम धन खर्च होता है।
(ग) इसके परिणाम उत्तम होते हैं, परन्तु इसमें धन एवं समये अधिक खर्च होता है।
(घ) यह अनावश्यक एवं व्यर्थ है।

प्रश्न 10.
किन परिस्थितियों में सामूहिक निर्देशन उपयोगी होता है
(क) सम्बन्धित व्यक्तियों की समस्याएँ नितान्त भिन्न-भिन्न हों
(ख) समस्याएँ अति गम्भीर हो
(ग) सम्बन्धित व्यक्तियों की समस्या सामान्य हो तथा अधिक गम्भीर न हो
(घ) उपर्युक्त सभी स्थितियों में

प्रश्न 11.
जो वार्ताएँ विद्यार्थियों को स्वयं अपनी आवश्यकताओं, क्षमताओं, उद्देश्यों व रुचियों आदि के विषय में सोचने-समझने हेतु प्रेरित व उत्साहित करती हैं, निर्देशन के क्षेत्र में उन्हें क्या कहा जाता है?
(क) निर्देशन वार्ताएँ
(ख) अनुगामी वार्ताएँ।
(ग) अनुस्थापन वार्ताएँ
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 12.
प्रखर बौद्धिक क्षमता से युक्त और सम्बन्धित कौन-सा व्यवसाय उपयुक्त कहा जाएगा?
(क) उच्च न्यायालय का जज
(ख) व्यापार संचालक
(ग) समाज-सुधारक
(घ) ड्राफ्टमैन

प्रश्न 13.
व्यावसायिक निर्देशन लाभदायक एवं उपयोगी है, क्योंकि –
(क) इसके माध्यम से व्यक्ति को अपनी रुचि एवं योग्यता के अनुसार व्यवसाय उपलब्ध हो जाता है।
(ख) सभी औद्योगिक-व्यावसायिक संस्थानों को योग्य एवं कुशल कर्मचारी मिल जाते हैं
(ग) उत्पादन की गुणवत्ता तथा दर में वृद्धि होती है।
(घ) उपर्युक्त सभी लाभ एवं उपयोगिताएँ।

प्रश्न 14.
व्यावसायिक निर्देशन देने के लिए व्यक्ति के विषय में जानकारी के साथ-साथ निम्नलिखित में से किसकी जानकारी आवश्यक होती है –
(क) व्यक्ति की शिक्षा का स्तर
(ख) व्यक्तित्व के गुण
(ग) व्यवसाय जगत
(घ) प्रयोग विधि।

प्रश्न 15.
शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने में सहायक सिद्ध होता है –
(क) अभिरुचि परीक्षण
(ख) व्यक्तित्व परीक्षण
(ग) बौद्धिक परीक्षण
(घ) ये सभी परीक्षण

प्रश्न 16.
व्यक्ति की संवेगात्मक, धार्मिक, नैतिक एवं शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिए दिया जाने वाला निर्देशन कहलाता है
(क) शैक्षिक निर्देशन
(ख) व्यावसायिक निर्देशन
(ग) व्यक्तिगत निर्देशन
(घ) महत्त्वपूर्ण निर्देशन

प्रश्न 17.
व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान हेतु दिया जाने वाला निर्देशन है –
(क) शैक्षिक निर्देशन
(ख) सामाजिक निर्देशन
(ग) व्यावसायिक निर्देशन
(घ) व्यक्तिगत निर्देशन

प्रश्न 18.
विद्यार्थियों को निर्देशन और परामर्श देने हेतु इलाहाबाद में मनोविज्ञानशाला की स्थापना की गई थी
(क) सन् 1935 में
(ख) सन् 1947 में
(ग) सन् 1953 में
(घ) सन् 1966 में

प्रश्न 19.
मनोविज्ञानशाला द्वारा किये जाने वाले कार्य हैं –
(क) निर्देशने कार्य
(ख) प्रशिक्षण कार्य
(ग) अनुसन्धान एवं प्रकाशन कार्य
(घ) ये सभी कार्य

प्रश्न 20.
विद्यालय स्तर पर निर्देशक के कार्य हैं –
(क) निर्देशन कार्य
(ख) शिक्षण कार्य
(ग) अनुसन्धान में सहायता
(घ) ये सभी कार्य

उत्तर :

  1. (ख) निर्देशन
  2. (क) स्किनर
  3. (घ) उपर्युक्त सभी के लिए
  4. (घ) निर्देशन केवल बच्चों को सहायता पहुँचाने की प्रक्रिया है
  5. (घ) शैक्षिक निर्देशन
  6. (ग) शैक्षिक निर्देशन
  7. (ग) शैक्षिक निर्देशन
  8. (घ) व्यावसायिक निर्देशन
  9. (ग) इसके परिणाम उत्तम होते हैं, परन्तु इसमें धन एवं समय अधिक खर्च होता है
  10. (ग) सम्बन्धित व्यक्तियों की समस्या सामान्य हो तथा अधिक गम्भीर में हो
  11. (ग) अनुस्थापन वार्ताएँ
  12. (क) उच्च न्यायालय का जज
  13. (घ) उपर्युक्त सभी लाभ एवं उपयोगिताएँ
  14. (ग) व्यवसाय जगत
  15. (ग) बौद्धिक परीक्षण
  16. (ग) व्यक्तिगत निर्देशन
  17. (घ) व्यक्तिगत निर्देशन
  18. (ख) 1947 में
  19. (घ) ये सभी कार्य
  20. (घ) ये सभी कार्य।

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