UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 11 Educational Systems: Kindergarten Method (शिक्षा प्रणालियाँ: किण्डरगार्टन पद्धति)

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 11 Educational Systems: Kindergarten Method (शिक्षा प्रणालियाँ: किण्डरगार्टन पद्धति)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किण्डरगार्टन प्रणाली (पद्धति) का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इस प्रणाली के आधारभूत सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
या
किण्डरगार्टन प्रणाली के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

किण्डरगार्टन पद्धति का अर्थ
(Meaning of Kindergarten Method)

किण्डरगार्टन प्रणाली के जन्मदाता प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री फ्रॉबेल थे। उन्होंने छोटे बच्चों को सही ढंग से शिक्षित करने के लिए एक शिक्षण-पद्धति का निर्माण किया, जो किण्डरगार्टन पद्धति के नाम से विख्यात है। किण्डरगार्टन का अर्थ है, ‘बच्चों का बगीचा’। किण्डरगार्टन नामक विद्यालय की स्थापना सन् 1940 में फ्रॉबेल ने की थी। फ्रॉबेल का कहना था, “बालक एक अविकसित पौधा है, जो शिक्षकरूपी माली की देखरेख में अपने आन्तरिक नियमों के अनुसार विकसित होता है।” फ्रॉबेल ने शिक्षक को अधिनायक न मानकर केवल पथप्रदर्शक के रूप में स्वीकार किया है। इस प्रकार के विद्यालयों में समय-सारणी और पाठ्य-पुस्तकों का कोई बन्धन नहीं होता है। बालकों से प्रेम तथा सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार किया जाता है। रस्क (Rusk) ने लिखा है, “किण्डरगार्टन छोटे बच्चों के लिए एक स्कूल है, जिसमें कपड़ों को उचित प्रकार से तह करने, चटाई बुनने, मिट्टी की मूर्तियाँ बनाने, सांकेतिक खेल तथा क्रियात्मक गाने उचित ढंग तथा क्रम से सिखाए जाते हैं।”

किण्डरगार्टन पद्धति के आधारभूत सिद्धान्त
(Fundamental Principles of Kindergarten Method)

किण्डरगार्टन प्रणाली का क्रियात्मक रूप प्रमुख रूप से फ्रॉबेल की दार्शनिक विचारधारा पर आधारित है। उसकी शिक्षा-पद्धति के आधारभूत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं|

1. एकता का सिद्धान्त- फ्रॉबेल ईश्वरवादी था और दैवी एकता के सिद्धान्त में विश्वास रखता था। फ्रॉबेल का विश्वास था कि सभी वस्तुएँ ईश्वर द्वारा निर्मित हैं और सभी में ईश्वर व्याप्त है। वह बालक को शिक्षा के माध्यम से ईश्वर आधारभूत सिद्धान्त द्वारा स्थापित एकता का अनुभव कराना चाहता था। उसका विचार था कि ईश्वर बीज रूप में है और सम्पूर्ण सृष्टि उस बीज के बढ़े हुए वृक्ष के रूप में है। ऊपर से देखने में संसार में विभिन्नताएँ हैं, किन्तु हर जीव में एक आत्मा है। वह आत्मा ईश्वर का अंश है और इस प्रकार संसार की सभी वस्तुओं में एकता है। दूसरे शब्दों में, ईश्वर का साक्षात्कार कराना तथा ईश्वर में स्थित विभिन्न वस्तुओं की एकता को पहचान लेना ही शिक्षा का उद्देश्य है। इसी सिद्धान्त के आधार पर उन्होंने पढ़ाए जाने वाले सभी विषयों में समन्वय स्थापित करने का सुझाव रखा। इस समन्वय के द्वारा ही बालक सरलतापूर्वक एकता के नियम का अनुभव कर सकते हैं।

2. स्वतः विकास का सिद्धान्त- फ्रॉबेल का कथन था कि इस संसार का प्रत्येक प्राणी विकास की ओर उन्मुख होता है। प्रत्येक वस्तु का विकास उसके आन्तरिक नियमों के अनुसार स्वत: होता है, बाहर से थोपा नहीं जाता। किसी भी प्रकार के बाह्य हस्तक्षेप से बालक का विकास कुण्ठित हो जाता है। उसका विश्वास था कि जिस प्रकार बीज के अन्दर विकास शक्ति निहित होती है और उसे प्रयोग में लाने पर वह अन्दर से बाहर की ओर विकसित होती है, उसी प्रकार से बालक का भी विकास अन्दर से बाहर की ओर होता है। उसके अनुसार, “बालक.ज़ो कुछ भी होगा, वह उसके भीतर है, चाहे उसका कितना ही कम संकेत हमें क्यों न मिले।’

इसी सिद्धान्त के आधार पर फ्रॉबेल ने बालक की उपमा पौधे से, पाठशाला की बगीचे से और शिक्षक की माली से देते हुए कहा है, “पाठशाला एक बाग है, जिसमें बालकरूपी पौधा शिक्षकरूपी माली की देखरेख में बढ़ता है।” फ्रॉबेल का कहना है कि शिक्षक को बालक के आन्तरिक विकास में कम-से-कम हस्तक्षेप करना चाहिए और उसे केवल पथ-प्रदर्शक के रूप में कार्य करना चाहिए।

3. स्वक्रिया का सिद्धान्त- फ्रॉबेल की मान्यता थी कि बालकों की आन्तरिक शक्तियों के विकास के लिए क्रियाशीलता अत्यन्त आवश्यक है। इस सिद्धान्त का अर्थ स्वयं सक्रिय होकर कार्य करने से है। फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-पद्धति में इस सिद्धान्त को अत्यधिक महत्त्व दिया है और कहा है कि वास्तविक विकास स्वक्रिया द्वारा ही सम्भव है। क्रियाशील रहने से बालक की मानसिक तथा शारीरिक शक्तियाँ दोनों ही विकसित रहती हैं। स्वयं कार्य करने से बालक परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करता है और स्वयं को वातावरण के अनुकूल बना लेता है, इसलिए बालक की शिक्षा का प्रारम्भ वहीं से होना चाहिए अर्थात् बालक को करके सीखना चाहिए। फ्रॉबेल ने स्वयं लिखा है, “अपनी प्रेरणाओं एवं भावनाओं को पूरा करने के लिए बालक स्वयं अपने मन से सक्रिय होकर काम करे।”

4. खेल का सिद्धान्त- फ्रॉबेल ने सर्वप्रथम खेल के माध्यम से बालकों को शिक्षा देने का प्रयत्न किया। उसने खेल को बालक की शिक्षा का प्रमुख साधन माना। उनका मत था कि खेल बालक की स्वाभाविक प्रकृति होती है, इसलिए बालकों को खेलों के माध्यम से शिक्षा दी जानी चाहिए। फ्रॉबेल के शब्दों में, “बचपन के खेल मनुष्य के शुद्ध आध्यात्मिक कार्य हैं और साथ-ही-साथ खेल में मनुष्य का आन्तरिक जीवन प्रकट होता है। इसलिए वह आनन्द, स्वतन्त्रता, सन्तोष, आन्तरिक एवं बाह्य आराम तथा संसार के साथ शान्ति प्रदान करता है। खेल समस्त अच्छाइयों का उद्गम है।”

5. स्वतन्त्रता का सिद्धान्त- फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-पद्धति में स्वतन्त्रता के सिद्धान्त को बहुत अधिक महत्त्व दिया है। जब बालक को पूर्ण स्वतंन्त्रता दी जाएगी तभी बालक स्वक्रिया द्वारा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। इसीलिए फ्रॉबेल का कहना है कि शिक्षक को बालकों के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, बल्कि उनका निरीक्षण करना चाहिए। इस सिद्धान्त के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए दुग्गन (Duggan) ने लिखा है, शिक्षक को प्रत्येक बालक के स्वतन्त्र व्यक्तित्व के विकास के लिए अवसर प्रदान करना चाहिए। उसे मार्ग निर्देशन करना चाहिए, अवरोध नहीं उपस्थित करना चाहिए। उसे प्रत्येक बालक के देवत्व के विकास के साथ हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।’

6. सामाजिकता तथा सामूहिकता का सिद्धान्त- फ्रॉबेल ने मनुष्य को सामाजिक प्राणी माना है। उसका विचार था कि बालक मानवीय गुणों को समाज में रहकर ही प्राप्त कर सकता है। इसके लिए फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-पद्धति में सामूहिक खेल, सामूहिक गान और अन्य सामूहिक कार्यों पर बल दिया है। इन सभी कार्यों द्वारा बालकों में सहयोग, सहानुभूति और एकता की भावना का विकास होता है।

प्रश्न 2.
किण्डरगार्टन शिक्षा-पद्धति की शिक्षण-सामग्री का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर:

किण्डरगार्टन पद्धति की शिक्षण-सामग्री।
(Device of Teaching in Kindergarten Method)

फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-पद्धति में निम्नलिखित शिक्षण-सामग्री को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है

1. खेल- फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-पद्धति में खेल को विशेष महत्त्व दिया है। इस पद्धति में खेल को शिक्षा का माध्यम स्वीकार किया गया है। विभिन्न प्रकार के खेलों के माध्यम से शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था की जाती है। सामान्य रूप से चार प्रकार के खेल अपनाए जाते हैं। ये खेल हैं क्रमश: मनोरंजक तथा रचनात्मक खेल सामूहिक भावना की वृद्धि करने वाले खेल, कल्पना-शक्ति का विकास करने वाले खेल तथा चरित्र का विकास करने वाले खेल।।

2. मातृ और शिशु गीत-यह एक लघु पुस्तिका होती है, जिसमें 50 गीतों का संग्रह होता है। इसमें प्रत्येक गीत की अलग-अलग व्याख्यात्मक टिप्पणी होती है। ये गीत बच्चों के खेल, व्यवसाय तथा कार्यों पर आधारित होते हैं। इन खेलों और गीतों का क्रम बालक की आयु और योग्यता के अनुसार रखा गया है। इन खेलों एवं गीतों द्वारा बालक और उसकी माता में एकता स्थापित होती है। इनके द्वारा बालक का शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास किया जाता है। इनके द्वारा बालक की विभिन्न ज्ञानेन्द्रियों व विभिन्न अंगों का विकास किया जाता है।

3. उपहार- फ्रॉबेल ने बालकों के खेलने के लिए उनकी | किण्डरगार्टन पद्धति की। अभिक्रिया को उत्तेजित करने के लिए उनकी ज्ञानेन्द्रियों को शिक्षा के शिक्षण-सामग्री लिए कुछ वस्तुओं की व्यवस्था की, जिन्हें उसने उपहार नाम दिया है। खेल इन उपहारों की संख्या 20 है। इसमें 7 उपहार प्रमुख हैं, जो बेलन, मातृ और शिशु गीत गोला और घन से बने होते हैं। इनका वर्गीकरण और क्रम बालकों की आयु तथा विकास के क्रमानुसार रखा जाता है। इनमें से प्रमुख उपहार व्यापार या कार्य । निम्नलिखित हैं–

  • ऊन की छह गेंदें- ये गेंदें लाल, पीले, हरे, नीले आदि भिन्न-भिन्न रंगों से रंगी होती हैं। इनके प्रयोग द्वारा बालकों को रूप, रंग, स्पर्श, गति, कठोरता, कोमलता एवं दिशा का ज्ञान कराया जाता है। इनसे खेलने में बालक अपनी मांसपेशियों का उपयोग करता है।
  • बेलन, गोले तथा घन- लकड़ी तथा अन्य किसी ठोस वस्तु से बने बेलन, गोले व घन की सहायता से बालक किसी वस्तु की स्थिरता, गतिशीलता, समानता व भिन्नता का ज्ञान प्राप्त करते हैं।
  • आठ छोटे घनों का एक बड़ा घन- यह उपहार एक ऐसे बड़े घन का होता है, जो छोटे-छोटे आठ घनों से मिलकर बनता है। इन छोटे-छोटे टुकड़ों से बालक अपनी रचनात्मक शक्ति का विकास करते हैं और छोटी-छोटी वस्तुएँ बनाते हैं; जैसे–मेज, कुर्सी आदि। इनकी सहायता से बालक को प्रारम्भिक गणित का भी ज्ञान कराया जाता है।
  • आठ आयताकार घनों का ऐक बड़ा घन- इसमें आठ आयताकार घनों का बना हुआ एक बड़ा घन होता है, जिनकी सहायता से बालक विभिन्न प्रकार की आकृतियों का निर्माण करते हैं और उन्हें संख्याओं का भी ज्ञान हो जाता है।
  • सत्ताइस घनों का एक बड़ा घन- यह एक इतना बड़ा घन होता है, जो छोटे-छोटे 27 घनों से मिलकर बनता है। इनकी सहायता से भी बालकं विभिन्न प्रकार की आकृतियों का निर्माण करते हैं और उन्हें संख्याओं का भी ज्ञान हो जाता है।
  • अठारह बड़े और नौ छोटे विषम चतुर्भुजों का एक बड़ा घन- इनकी सहायता से बालक ज्यामिति की भिन्न-भिन्न आकृतियाँ बनाकर ज्यामिति का ज्ञान प्राप्त करते हैं।
  • वर्ग तथा त्रिभुज- इनका प्रयोग भी रेखागणित के विभिन्न चित्रों को बनाने में किया जाता है।

4. व्यापार या कार्य- फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-पद्धति में व्यापार या कार्य को विशेष महत्त्व दिया है। ये कार्य बालक को तब दिए जाते हैं जब उपहारों के प्रयोग द्वारा उनमें विचार-शक्ति विकसित हो जाती है। फ्रॉबेल ने उपहारों तथा कार्यों में बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध बताया है। उपहारों के द्वारा बालक में विचार उत्पन्न होते हैं और विचारों के आधार पर बालक कार्य करते हैं। बालक को उपहारों द्वारा बिना वस्तुओं का आकार बदले उन्हें मिलाने तथा क्रमबद्ध करने का अभ्यास कराया जाता है और इससे बालक वस्तुओं के आकार, रूप, रंग इत्यादि का ज्ञान प्राप्त करते हैं।

5. पाठ्यक्रम- फ्रॉबेल की शिक्षा-पद्धति में बालकों को खेलों तथा कार्यों के अतिरिक्त कुछ विषयों का ज्ञान भी कराया जाता है; जैसे—भाषा, गणित, विज्ञान, कला, धार्मिक निर्देश, बागवानी, इतिहास, भूगोल, संगीत आदि।

प्रश्न 3.
किण्डरगार्टन शिक्षा-पद्धति के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
या
किण्डरगार्टन शिक्षा-विधि के गुण-दोषों की विवेचना कीजिए।
या
खेल प्रणाली के गुण-दोषों का वर्णन कीजिए।
उतर:

किण्डरगार्टन पद्धति के गुण
(Merits of Kindergarten Method)

1. शिशु की शिक्षा हेतु उपयोगी- यह पद्धति छोटे बच्चों की शिक्षा के लिए बड़ी उपयोगी और उपयुक्त है। फ्रॉबेल के अनुसार, “स्कूल की शिक्षा में तभी सफलता प्राप्त हो सकती है, जब शिक्षा में सुधार कर उसकी नींव मजबूत कर दी जाए।”

2. सरल, रुचिपूर्ण और आकर्षक पद्धति- शिक्षा देते समय बालक की आयु, रुचियों, क्षमताओं और योग्यताओं का ध्यान रखा जाता है। वह खेल, गीत, अभिनय, रचना इत्यादि के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करता है। इस प्रकार यह पद्धति सरल है। इसके अन्तर्गत बालक रुचिपूर्ण ढंग से शिक्षा प्राप्त करता है, इस कारण यह पद्धति आकर्षक कही जाती है।

3. इन्द्रियों का प्रशिक्षण- इस पद्धति में बालकों की ज्ञानेन्द्रियों किण्डरगार्टन पद्धति के गुण को प्रशिक्षित होने का अवसर मिलता है, क्योंकि इसके खेल और शिशु की शिक्षा हेतु उपयोगी उपहार इस प्रकार के बने हैं कि बालक की इन्द्रियाँ प्रशिक्षित हो जाती , सरल, रुचिपूर्ण और आकर्षक हैं। इसके साथ-ही-साथ उनकी मानसिक क्रियाओं में तत्परता और पद्धति स्पष्टता आ जाती है। इन्द्रियों का प्रशिक्षण

4. आत्मक्रिया पर बल- इस पद्धति में बालकों को आत्मक्रिया में आत्मक्रिया पर बल के सजीव तथा स्वाभाविक माध्यम से शिक्षा दी जाती है। क्रियाशीलता शिक्षक मित्र व पथप्रदर्शक की प्रधानता के कारण बालक स्वयं कार्य करके सीखते हैं। विभिन्न व्यावसायिक क्रिया को महत्त्व वस्तुओं तथा उपकरणों द्वारा खेलने से बालकों की स्वक्रिया को शारीरिक श्रम पर बल उत्तेजना मिलती है, जिससे उनमें आत्मशक्ति, क्रियाशीलता और » नैतिक तथा सामाजिक गुणों का आत्मविश्वास आदि का विकास होता है। विकास

5. शिक्षक मित्र वे पथप्रदर्शक- यह शिक्षा-पद्धति के आधुनिक शिक्षा का आधार बालकप्रधान है और इसमें शिक्षक का स्थान गौण होता है। इस पद्धति के सौन्दर्यात्मक विकास में शिक्षक का स्थान केवल मित्र, सहायक तथा पथप्रदर्शक के रूप में होता है। शिक्षक केवल बालकों के कार्य-कलापों का निरीक्षण हैं और उन पर दबाव नहीं डालते हैं।

6. व्यावसायिक क्रिया को महत्त्व- फ्रॉबेल ने अपनी मनोवैज्ञानिक पद्धति शिक्षा-पद्धति में कार्य और व्यापारों को अत्यधिक महत्त्व दिया है। ये कार्य बालकों को भावी जीवन के लिए तैयार करते हैं। इससे उनकी कल्पना तथा रचनात्मक शक्ति का विकास होता है।

7. शारीरिक श्रम पर बल- इस पद्धति में शारीरिक श्रम पर विशेष बल दिया गया है। बालक अनेक शारीरिक कार्यों; जैसे–चटाई बुनना, बागवानी, लकड़ी का काम, सीना-पिरोना आदि को सीखता है। ऐसे कार्य करने से बालकों के मन में शारीरिक श्रम करने की इच्छा उत्पन्न हो जाती है और वे किसी कार्य को निम्न स्तर का नहीं समझते हैं।

8. नैतिक तथा सामाजिक गुणों का विकास- यह पद्धति बालकों के वैयक्तिक विकास के साथ-ही-साथ उनके नैतिक और सामाजिक विकास पर भी बल देती है। फ्रॉबेल ने अपनी पद्धति में सामूहिक क्रियाओं तथा सामूहिक खेलों पर बल दिया है, जिससे बालकों में सामाजिक तथा नैतिक गुणों का विकास होता है।

9. आधुनिक शिक्षा का आधार- किण्डरगार्टन पद्धति ने आधुनिक शिक्षा को कुछ महत्त्वपूर्ण तथा उपयोगी सिद्धान्त प्रदान किए हैं, जिन पर आधुनिक शिक्षा आधारित है; जैसे–स्वतन्त्र अनुशासन का महत्त्व, क्रिया द्वारा शिक्षा आदि। आधुनिक शिक्षा को मनोवैज्ञानिक आधार भी किण्डरगार्टन पद्धति की ही देन है।

10. सौन्दर्यात्मक विकास- इस पद्धति द्वारा संचालित विद्यालयों में बालकों को इस प्रकार के अवसर प्रदान किए जाते हैं, जिससे वह सुन्दर-सुन्दर प्राकृतिक दृश्यों का निरीक्षण कर सके। इस प्रकार बालकों के अन्दर सौन्दर्यात्मक अनुभूति का विकास होता है। |

11. विद्यालय का आकर्षक वातावरण- किण्डरगार्टन पद्धति ने विद्यालय के नीरस वातावरण का अन्त करके वहाँ पर सरसता और उल्लास का वातावरण उत्पन्न कर दिया है। किण्डरगार्टन स्कूलों में शिक्षण कार्य प्रशिक्षित महिलाओं द्वारा किया जाता है। वे अपने मृदु व्यवहार और कुशल कार्यों से विद्यालय में भी घर के समान वातावरण उत्पन्न कर देती हैं, जिससे छोटे-छोटे बच्चों को घर जैसा वातावरण मिलने से किसी प्रकार की घबराहट नहीं होती है।

12. आध्यात्मिकता का विकास- इस पद्धति के द्वारा बालकों को विश्व की अनेकता में एकता का अनुभव होता है। इसकी अनुभूति कराने के लिए गीत, खेल व उपहारों का प्रयोग विशिष्ट प्रकार से किया जाता है। विश्व की एकता का ज्ञान होने से बालकों को ईश्वर के अस्तित्व के बारे में जानकारी प्राप्त होती है और उनका आध्यात्मिक विकास भी होता है।

13. खेल द्वारा शिक्षा- यह पद्धति खेल द्वारा शिक्षा पर विशेष बल देती है। बालक खेल-खेल में लिखना, पढ़ना, गणित आदि विषयों का ज्ञान प्राप्त करता है। रस्क ने लिखा है, ‘फ्रॉबेल ने किण्डरगार्टन में खेल तथा व्यापार की ऐसी विधिवत् व्याख्या की है, जिससे उसको सामान्य रूपों से अपनाया गया। जिस प्रकार जेसुइटो तथा कमेनियस को शिक्षा को एक व्यवस्थित विधिशास्त्र देने का श्रेय है, उसी प्रकार फ्रॉबेलको खेल की विधि प्रदान करने का श्रेय है।”

14. मनोवैज्ञानिक पद्धति- किण्डरगार्टन पद्धति बाल मनोविज्ञान के सिद्धान्तों पर आधारित है। यह बाल-केन्द्रित है। यह पद्धति बालकों के व्यक्तित्व के विकास पर पूरा ध्यान देती है।

किण्डरगार्टन पद्धति के दोष
(Defects of Kindergarten Method)

इस पद्धति के मुख्य दोषों का विवरण निम्नलिखित है

1. अस्पष्ट रहस्यवादी सिद्धान्त- कुछ शिक्षाशास्त्रियों का किण्डरगार्टन पद्धति के दोष विचार है कि फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा प्रणाली में जिन रहस्यवादी सिद्धान्तों को आधार बनाया है, वे अमनोवैज्ञानिक, भ्रामक तथा अस्पष्ट रहस्यवादी सिद्धान्त अस्पष्ट हैं। फ्रॉबेल के रहस्यवाद में कल्पना का बाहुल्य है और उसके 4 सीमित स्वतन्त्रता द्वारा बालक वास्तविक जीवन से बहुत दूर पहुँच जाते हैं। 9 वैयक्तिकता के विकास पर कम

2. सीमित स्वतन्त्रता- यद्यपि इस पद्धति में बालक की ध्यान । स्वतन्त्रता पर बहुत अधिक बल दिया गया है, लेकिन वास्तव में यह विषयों की अन्योन्याश्रितता को स्वतन्त्रता सीमित है। इस पद्धति के द्वारा बालक को निश्चित उपहारों, अभाव कार्यो, गीतों तथा खेलों में बँधना पड़ता है, जिस कारण बालक अपने ५ उपहार बनावटी तथा मनमाने आपको पूर्ण स्वतन्त्र अनुभव नहीं कर पाते हैं। वे उस वातावरण में कुछ गीत और चित्र पुराने कुछ बन्धनों का अनुभव करते हैं। प्रशिक्षित शिक्षकों को अभाव

3. वैयक्तिकता के विकास पर कम ध्यान- इस पद्धति में ज्ञान की प्रक्रिया का गलत अर्थ सामूहिक एकता और सामूहिक जीवन पर इतना अधिक बल दिया उत्तरदायित्व की शिक्षा का अभाव गया है कि बालक की वैयक्तिकता की उपेक्षा की जाती है। अमनोवैज्ञानिक पद्धति मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह उचित नहीं है।

4. विषयों की अन्योन्याश्रितता का अभाव-इस पद्धति में विषय अलग-अलग करके पढ़ाए जाते हैं, इसलिए विभिन्न विषयों में समन्वय स्थापित नहीं किया जा सकता। उत्तम शिक्षण-प्रणाली वही हो सकती है, जिसमें सभी विषय परस्पर अन्योन्याश्रित हों।

5. उपहार बनावटी तथा मनमाने- अधिकांश शिक्षाशास्त्रियों का मत है कि फ्रॉबेले के उपहार स्वरूप में बनावटी और प्रस्तुत करने के क्रम में मनमाने हैं। इनका प्रयोग स्वेच्छापूर्वक किया गया है। फ्रॉबेल ने इस तथ्य की उपेक्षा कर दी है कि बालक विद्यालय में जाने से पहले ही भिन्न-भिन्न आकृतियों, रूपों और रंगों से परिचित हो जाता है और उसे उपहारों की कोई आवश्यकता नहीं रहती। इसीलिए आजकल बहुत-सेविद्यालयों ने इन उपहारों को अनावश्यक समझकर पाठ्यक्रम से निकाल दिया है।

6. कुछ गीत और चित्र पुराने- इस पद्धति में जिन गीतों और चित्रों का समावेश किया गया है, उनमें बहुत-से काफी पुराने हैं। आज जब कि विश्व में बहुत अधिक परिवर्तन हो गया है, लेकिन इस पद्धति के गीतों और चित्रों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। ये सब आज की शैक्षिक परिस्थितियों के अनुकूल नहीं हैं और इनका प्रयोग प्रत्येक देश के प्रत्येक विद्यालय में नहीं किया जा सकता।

7. प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव- इस पद्धति में प्रयुक्त उपहार, व्यापार आदि प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी के कारण समस्या उत्पन्न करते हैं और धन की कमी के कारण प्रत्येक विद्यालय में इनकी व्यवस्था नहीं की जा सकती।।

8. ज्ञान की प्रक्रिया का गलत अर्थ- फ्रॉबेल ने ज्ञान की प्रक्रिया के सम्बन्ध में गलत अर्थ निकाला था। फ्रॉबेल का मत था कि विकास एक आन्तरिक क्रिया है। शिक्षा द्वारा जो कुछ बालक के भीतर होता है, वही बाहर निकालता है। परन्तु यह विचार पूर्णतया सत्य प्रतीत नहीं होता है, क्योंकि विकास तभी होता है, जब बालक वातावरण को समझ लेता है और उसे अपने अनुकूल बनाता है। बहुत-सा ज्ञान और अनुभव बालक में बाहर से अन्दर प्रवेश करता है।

9. उत्तरदायित्व की शिक्षा का अभाव- किण्डरगार्टन पद्धति में पूर्व निश्चित योजना के अनुसार कार्य करना पड़ता है और बालकों को ऐसे अवसर नहीं दिए जाते हैं कि वह स्वयं विचार कर उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से कार्य कर सकें। इस कारण बालकों में उत्तरदायित्व की भावना का विकास नहीं हो पाता।

10. अमनोवैज्ञानिक पद्धति- कुछ शिक्षाशास्त्री किण्डरगार्टन पद्धति को बाल मनोविज्ञान के विपरीत बताकर उसकी आलोचना करते हैं। इनका मत है कि फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-पद्धति में जिन गोल, बेलन एवं घन आदि आकारों की वस्तुओं का प्रयोग करके अपने दार्शनिक विचारों के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है, उनको समझना और प्रयोग करना बालक के लिए असम्भव है। बालकों में उन वस्तुओं का प्रयोग करते समय प्रतीकवाद से सम्बन्धित उन सूक्ष्म भावों का विकास नहीं हो सकता, जिनकी फ्रॉबेल ने कल्पना की है। इसलिए फ्रॉबेल का प्रतीकवाद अमनोवैज्ञानिक है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फ्रॉबेल द्वारा प्रतिपादित शिक्षा-प्रणाली किण्डरगार्टन की मुख्य विशेषताओं का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:

किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ ।
(Main Characteristics of Kindergarten Education Method)

फ्रॉबेल ने रूसो तथा पेस्टालॉजी द्वारा प्रतिपादित मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों के आधार पर एक नवीन शिक्षा-प्रणाली का प्रतिपादन किया, जिसे किण्डरगार्टन शिक्षा प्रणाली कहा जाता है। इस शिक्षा-प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. स्वाभाविक बाल-विकास को महत्त्व- किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में स्वाभाविक बाल विकास को ध्यान में रखते हुए बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था की जाती है।
  2. बाल-रुचियों के अनुसार उनकी क्रियाओं का विकास- किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में बच्चों को विभिन्न क्रियाओं के माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाती है तथा इन क्रियाओं के चुनाव एवं निर्धारण के लिए। बालक की रुचियों एवं स्वभाव को ध्यान में रखा जाता है। रुचियों से सम्बद्ध होने के कारण शिक्षा प्रदान करना सरल हो जाता है तथा अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।
  3. विद्यालय का वातावरण पूर्णरूप से भयमुक्त-इस शिक्षा प्रणाली की एक मुख्य विशेषता यह है कि इस प्रणाली के अन्तर्गत विद्यालय का वातावरण पूर्णरूप से भयमुक्त होता है। भयमुक्त वातावरण में बच्चों का विकास स्वाभाविक रूप में होता है।
  4. खेल के माध्यम से शिक्षा- खेल बच्चों की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में खेल को ही शिक्षा का माध्यम बनाया जाता है। खेल के माध्यम से शिक्षा की प्रक्रिया सरल एवं उत्तम बने जाती है। 
  5. शिक्षक: एक पथप्रदर्शक-किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में शिक्षक द्वारा बच्चों पर किसी कार्य या विचार को थोपा नहीं जाता। वह बच्चों का केवल पथ-प्रदर्शन मात्र ही करता है।
  6. नैतिक तथा सामाजिक शिक्षा को प्राथमिकता किण्डरगार्टन शिक्षा प्रणाली में बच्चों के नैतिक विकास पर बल दिया जाता है तथा उन्हें सामाजिक सद्गुणों की भी समुचित शिक्षा दी जाती है।

प्रश्न 2.
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली की शिक्षण-विधि का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

किण्डरगार्टन प्रणाली की शिक्षण-विधि
(Educational Methods of Kindergarten Method)

फ्रॉबेल ने क्रिया द्वारा बालकों को शिक्षा देने पर विशेष बल दिया। उनका मत था कि क्रिया के द्वारा या खेल के द्वारा बालकों को आत्मविश्वास के अवसर प्राप्त होते हैं, जिससे उनका विकास होता है। इस प्रकार फ्रॉबेल की शिक्षा-पद्धति का उद्देश्य बालकों को कोरा ज्ञान देना नहीं, बल्कि उन्हें आत्माभिव्यक्ति के अवसर प्रदान करना है। उसने आत्माभिव्यक्ति के साधन माने हैं—(1) गीत, (2) गति और (3) रचना।

यद्यपि देखने पर आत्माभिव्यक्ति के ये तीनों रूप पृथक्-पृथक् प्रतीत होते हैं, लेकिन वास्तव में ये तीनों क्रियाएँ सह-सम्बन्धित हैं और व्यापारिक रूप से एक हो जाती हैं। उदाहरण के लिए, जब बालक को कहानी सुनाई जाती है तो सुनने के बाद वह उसका गीत गा सकता है। गीत गाते समय भावों को व्यक्त करने के लिए वह अपने अंगों का संचालन करता है तथा नाट्य द्वारा उसे प्रकट करता है। फिर वह उसे रचनात्मक क्रिया द्वारा अथवा लकड़ी की वस्तु, कागज, मिट्टी तथा अन्य किसी पदार्थ से रचना करके प्रकट कर सकता है। इस प्रकार संगीत, गति तथा रचना में एकता स्थापित करने के लिए यह आवश्यक है कि शिक्षक बालक से काम कराए, कामे से सम्बन्धित गाना गवाए, गाने के साथ-साथ भाव-भंगिमा का प्रदर्शन कराए और गति में वर्णित वस्तुओं का निर्माण कराए।

प्रश्न 3.
भारत में किण्डरगार्टन शिक्षा-पद्धति के प्रयोग के विषय में अपने विचार प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

भारत में किण्डरगार्टन पद्धति का प्रयोग
(Experiments of Kindergarten Method in India)

किण्डरगार्टन पद्धति के गुण एवं दोषों को ध्यान में रखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यदि हम देश, काल तथा व्यक्ति की आवश्यकताओं के अनुसार इसमें परिवर्तन एवं सुधार करके इसका प्रयोग करें। न केवल भारत में, वरन् विश्व के लगभग सभी देशों में किण्डरगार्टन पद्धति कुछ परिवर्तनों के साथ प्रचलित है। भारत में किण्डरगार्टन पद्धति के प्रयोग में कुछ कठिनाइयाँ अवश्य हैं, तथापि इस पद्धति को निम्नांकित संशोधनों के साथ सफलतापूर्वक अपनाया जा सकता है

  1. भारत में शिशु-शिक्षा के विकास के लिए इस पद्धति का प्रयोग बड़ा उपयोगी है, क्योंकि स्कूल की शिक्षा में तभी सफलता प्राप्त हो सकती है जब शिक्षा में सुधार कर उसकी नींव मजबूत कर दी जाए।
  2. इस पद्धति को कम खर्चीली बनाया जाए, ताकि भारत जैसे निर्धन देश के सामान्य बच्चे इस पद्धति का लाभ उठा सकें।
  3. इस पद्धति की शिक्षण-सामग्री में कुछ कमी की जानी चाहिए और उसमें नवीनतम सामग्री का समावेश करना चाहिए।
  4. इस पद्धति के प्रयोग में प्रशिक्षित-प्रशिक्षिकाओं की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण है। इनकी पूर्ति के लिए प्रशिक्षण विद्यालयों की स्थापना भी आवश्यक है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में अपनाए जाने वाले मुख्य खेलों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
किण्डरगार्टन शिक्षा प्रणाली में मुख्य रूप से अग्रलिखित प्रकार के खेलों को अपनाया जाता है

  1. मनोरंजक तथा रचनात्मक खेल-इस प्रकार के खेलों में उन खेलों को सम्मिलित किया जाता है। जो बालकों का मनोरंजन करते हैं और उनमें रचनात्मक प्रतिभा का विकास करते हैं; जैसे-दौड़ना, झूला । झूलना, विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ बनाना।
  2. कल्पना-शक्ति का विकास करने वाले खेल-इस प्रकार के खेलों में वे खेल आते हैं, जिनमें बालक की कल्पना-शक्ति का विकास होता है और उन्हें आत्माभिव्यक्ति के अवसर मिलते हैं। उनसे अवसरों के द्वारा विभिन्न प्रकार की आकृतियों का निर्माण करने को कहा जाता है। वह अपनी कल्पना शक्ति के सहारे नई-नई आकृतियों का प्रयोग करते हैं।
  3. सामूहिक भावना की वृद्धि करने वाले खेल-इनमें उन खेलों का समावेश होता है, जो बालकों में सामाजिकता तथा सामूहिक भावना को विकास करते हैं। उन्हें एक साथ रहकर सामूहिक रूप से काम करने और जीवन-निर्वाह करने के लिए प्रेरित करते हैं। इस दृष्टि से सामूहिक नृत्य, सामूहिक संगीत, नाटक आदि को महत्त्व दिया जाता है, क्योंकि उनके द्वारा बालकों को सामूहिक रूप से काम करने के अवसर प्राप्त होते हैं।
  4. चरित्र का विकास करने वाले खेल-विभिन्न प्रकार से शिक्षाप्रद खेलों द्वारा बालक के चरित्र का विकास किया जाता है और उनमें अच्छी-अच्छी आदतें डाली जाती हैं; जैसे-भाषा की शिक्षा के लिए बालू के अक्षरों का बनाना।

प्रश्न 2.
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली के आधारभूत सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
किण्डरगार्टन शिक्षा प्रणाली के मुख्य आधारभूत सिद्धान्त हैं—

  • एकता का सिद्धान्त,
  • स्वत: विकास का सिद्धान्त,
  • स्वक्रिया का सिद्धान्त,
  • खेल का सिद्धान्त,
  • स्वतन्त्रता का सिद्धान्त तथा
  • सामाजिकता तथा सामूहिकता का सिद्धान्त।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
खेल के माध्यम से बच्चों को शिक्षा प्रदान करने वाली प्रथम शिक्षा-प्रणाली कौन-सी है?
उत्तर:
खेल के माध्यम से बच्चों को शिक्षा प्रदान करने वाली प्रथम शिक्षा प्रणाली किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली है।

प्रश्न 2.
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली के प्रवर्तक कौन थे?
या
खेल शिक्षा-प्रणाली के प्रवर्तक कौन थे?
उत्तर:
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली के प्रवर्तक फ्रॉबेल थे।

प्रश्न 3.
किस शिक्षा-पद्धति से फ्रॉबेल का नाम जुड़ा हुआ है?
उत्तर:
किण्डरगार्टन शिक्षा-पद्धति से फ्रॉबेल का नाम जुड़ा हुआ है।

प्रश्न 4.
फ्रॉबेल ने किस विद्वान् के विचारों से प्रेरित होकर किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली का प्रतिपादन किया था?
उत्तर:
फ्रॉबेल ने रूसो के विचारों से प्रेरित होकर किण्डरगार्टन शिक्षा प्रणाली का प्रतिपादन किया था।

प्रश्न 5.
फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-प्रणाली में शिक्षा का माध्यम किसे बनाया?
उत्तर:
फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-प्रणाली में खेल को शिक्षा का माध्यम बनाया है।

प्रश्न 6.
फ्रॉबेल द्वारा अपनाए गए शब्द ‘किण्डरगार्टन’ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
फ्रॉबेल द्वारा अपनाए गए शब्द ‘किण्डरगार्टन’ का अर्थ है-‘बच्चों का बगीचा’ या ‘बच्चों का उद्यान’।

प्रश्न 7.
“बालक एक अविकसित पौधा है, जो शिक्षकरूपी माली की देखरेख में अपने आन्तरिक नियमों के अनुसार विकसित होता है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन फ्रॉबेल का है।

प्रश्न 8.
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली की सैद्धान्तिक मान्यता के अनुसार विद्यालय का शैक्षिक वातावरण किस प्रकार का होना चाहिए?
उत्तर:
किण्डरगार्टन शिक्षा प्रणाली की सैद्धान्तिक मान्यता के अनुसार विद्यालय का शैक्षिक वातावरण पूर्ण रूप से भयमुक्त होना चाहिए।

प्रश्न 9.
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में किस प्रकार के अनुशासन को सर्वोत्तम माना गया है?
उत्तर:
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में स्वतः अनुशासन को सर्वोत्तम माना गया है।

प्रश्न 10.
फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-प्रणाली में शिक्षक को क्या स्थान प्रदान किया है?
उत्तर:
फ्रॉबेल ने अपनी शिक्षा-प्रणाली में शिक्षक को पथप्रदर्शक का स्थान प्रदान किया है।

प्रश्न 11.
किण्डरगार्टन क्या है?
उत्तर:
किण्डरगार्टन छोटे बच्चों को शिक्षित करने की एक शिक्षा पद्धति है।

प्रश्न 12.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य–

  1. किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली के जन्मदाता किलपैट्रिक थे।
  2. किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में शिक्षण-सामग्री को उपहार कहा जाता है।
  3. किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली अपने आप में एक अध्यापिका-केन्द्रित शिक्षा प्रणाली है।
  4. किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में बाहरी कठोर अनुशासन को अपनाया जाता है।
  5. किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में स्वत: विकास के सिद्धान्त को स्वीकार किया गया है।

उत्तर:

  1. असत्य,
  2. सत्य,
  3. असत्य,
  4. असत्य,
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रण

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
फ्रॉबेल किस शिक्षण-पद्धति का प्रवर्तक था?
(क) मॉण्टेसरी
(ख) डाल्टन
(ग) बुनियादी शिक्षा
(घ) किण्डरगार्टन

प्रश्न 2.
किण्डरगार्टन प्रणाली के जनक हैं
(क) मॉण्टेसरी
(ख) एनीबेसेण्ट
(ग) डीवी
(घ) फ्रॉबेल

प्रश्न 3.
किण्डरगार्टन का क्या अर्थ है?
(क) बच्चों का घर
(ख) बच्चों का बागीचा
(ग) बच्चों की नर्सरी ।
(घ) बच्चों की पाठशाला

प्रश्न 4.
किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणाली में किसे प्रमुख स्थान दिया गया है?
(क) बालक को
(ख) शिक्षक को
(ग) विद्यालय को
(घ) समाज को

प्रश्न 5.
फ्रॉबेल ने शिक्षक को क्या संज्ञा दी है?
(क) माली
(ख) मास्टर
(ग) रखवाला
(घ) निर्देशक

प्रश्न 6.
किण्डरगार्टन प्रणाली का प्रमुख गुण है
(क) सस्ती प्रणाली
(ख) बाल-केन्द्रित प्रणाली
(ग) उपहारयुक्त प्रणाली
(घ) व्यक्तिवादी प्रणाली

प्रश्न 7.
किण्डरगार्टन प्रणाली का प्रमुख दोष है
(क) रचनात्मक कार्यों की प्रधानता
(ख) नैतिक व सामाजिक गुणों का विकास
(ग) कृत्रिम वातावरण
(घ) संवेदी अंगों का प्रशिक्षण

प्रश्न 8.
फ्रॉबेल का जन्म हुआ था–
(क) इटली में
(ख) अमेरिका में
(ग) जर्मनी में
(घ) इंग्लैण्ड में

उत्तर:

1. (घ) किण्डरगार्टन,
2. (घ) फ्रॉबेल,
3. (ख) बच्चों का बगीचा,
4. (क) बालक को,
5. (क) माली,
6. (ख) बाल-केन्द्रित प्रणाली,
7. (ग) कृत्रिम वातावरण,
8. (ग) जर्मनी में।

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