UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 भूमि संसाधन (अनुभाग – तीन)

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विस्तृत उत्तरीय प्रत

प्रश्न 1.
भारत में पायी जाने वाली मिट्टियों का संक्षेप में वर्णन कीजिए तथा उनका आर्थिक महत्त्व लिखिए। [2011]
या

जलोढ़ मिट्टी वाले क्षेत्र में जनसंख्या के अधिक घनत्व के कारणों की व्याख्या कीजिए।
या
भारत में कितने प्रकार की मिट्टियाँ पायी जाती हैं ? उनके क्षेत्र तथा महत्त्व बताइए।
या
मरुस्थलीय मिट्टी पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
या
जलोढ़ मिट्टी और काली मिट्टी में अन्तर बताइए। [2011]
या

भारत में पायी जाने वाली दो मिट्टियों का नाम क्षेत्र सहित लिखिए। [2011]
या

मिट्टी के किन्हीं दो महत्त्वों का वर्णन कीजिए। [2013]
या

जलोढ़ मिट्टी से आप क्या समझते हैं? इसके दो प्रमुख क्षेत्र तथा प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
या
काली मिट्टी की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए। [2018]
या

भारत में पायी जाने वाली किसी एक प्रकार की मिट्टी का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए
(क) क्षेत्र, (ख) विशेषताएँ, (ग) उपयोगिता।
या
भारत की मिट्टियों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए तथा किसी एक मिट्टी की किन्हीं दो विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

भारतीय मिट्टियाँ, उनके क्षेत्र एवं आर्थिक महत्त्व

भारत में निम्नलिखित प्रकार की मिट्टियाँ पायी जाती हैं—

1. पर्वतीय मिट्टी,
2. जलोढ़ मिट्टी,
3. काली अथवा रेगुर मिट्टी,
4. लाल मिट्टी,
5. लैटेराइट मिट्टी तथा
6. मरुस्थलीय मिट्टी।

1. पर्वतीय मिट्टियाँ- हिमालय पर्वतीय प्रदेश में नवीन, पथरीली, उथली तथा सरन्ध्र मिट्टियाँ पायी जाती हैं। इन मिट्टियों का विस्तार भारत में लगभग 2 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्रफल में है। हिमालय पर्वत के दक्षिणी भागों में कंकड़-पत्थर तथा मोटे कणों वाली बालूयुक्त मिट्टी पायी जाती है। नैनीताल, मसूरी तथा चकरौता क्षेत्र में चूने के अंशों की प्रधानता वाली मिट्टी पायी जाती है। हिमालय के कुछ क्षेत्रों में आग्नेय शैलों के विखण्डन से निर्मित मिट्टियाँ पायी जाती हैं। हिमाचल प्रदेश में काँगड़ा, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग तथा असम के पहाड़ी ढालों पर इसी मिट्टी की अधिकता मिलती है। चाय उत्पादन के लिए यह मिट्टी सर्वश्रेष्ठ है। इसी कारण इसे ‘चाय की मिट्टी’ के नाम से पुकारा जाता है।

2. जलोढ़ मिट्टी- भारत के विशाल उत्तरी मैदान में नदियों द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों से बहाकर लाई गयी जीवांशों से युक्त उपजाऊ मिट्टी मिलती है, जिसे ‘काँप’ या ‘कछारी’ मिट्टी भी कहते हैं। इस मिट्टी का विस्तार देश के 40% क्षेत्रफल में है। यह मिट्टी हिमालय पर्वत से निकलने वाली तीन बड़ी नदियों सतलुज, गंगा एवं ब्रह्मपुत्र तथा उनकी सहायक नदियों द्वारा बहाकर लाई गयी है। जलोढ़ मिट्टी पूर्वी तटीय मैदानों, विशेष रूप से महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी नदियों के डेल्टा प्रदेश में भी सामान्य रूप से मिलती है। जिन क्षेत्रों में बाढ़ का जल नहीं पहुँच पाता, वहाँ पुरानी जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है, जिसे ‘बाँगर’ कहा जाता है। वास्तव में यह मिट्टी भी नदियों द्वारा बहाकर लाई गयी प्राचीन काँप मिट्टी ही होती है। जिन क्षेत्रों में नदियों ने नवीन काँप मिट्टी का जमाव किया है, उसे ‘खादर’ के नाम से पुकारा जाता है। नवीन जलोढ़ मिट्टियाँ प्राचीन जलोढ़ मिट्टियों की अपेक्षा अधिक उपजाऊ होती हैं। सामान्यतः जलोढ़ मिट्टियाँ सर्वाधिक उपजाऊ होती हैं।

इनमें पोटाश, चूना तथा फॉस्फोरिक अम्ल पर्याप्त मात्रा में होता है, परन्तु नाइट्रोजन तथा जैविक पदार्थों की कमी होती है। शुष्क प्रदेशों की मिट्टियों में क्षारीय तत्त्व अधिक होते हैं। भारत की लगभग 50% जनसंख्या का भरण-पोषण इन्हीं मिट्टियों द्वारा होता है। इन मिट्टियों में गेहूँ, गन्ना, चावल, तिलहन, तम्बाकू, जूट आदि फसलों का उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जाता है। इन्हीं कारणों से यहाँ जनसंख्या का घनत्व अधिक है।

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 (Section 3) 1
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3. काली अथवा रेगुर मिट्टी- इस मिट्टी का निर्माण ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित लावा की शैलों के विखण्डन के फलस्वरूप हुआ है। इस मिट्टी का रंग काला होता है, जिस कारण इसे ‘काली मिट्टी’ अथवा ‘रेगुर मिट्टी’ भी कहा जाता है। इस मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती है। इसमें लोहांश, मैग्नीशियम, चूना, ऐलुमिनियम तथा जीवांशों की मात्रा अधिक पायी जाती है। वर्षा होने पर यह चिपचिपी-सी हो जाती है तथा सूखने पर इसमें दरारें पड़ जाती हैं। इस मिट्टी का विस्तार दकन ट्रैप के उत्तर-पश्चिमी भागों में लगभग 5.18 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल पर है। महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा तथा दक्षिणी मध्य प्रदेश के पठारी भागों में यह मिट्टी विस्तृत है। इस मिट्टी का विस्तार दक्षिण में गोदावरी तथा कृष्णा नदियों की घाटियों में भी है।

इस मिट्टी में कपास का पर्याप्त मात्रा में उत्पादन होने के कारण इसे ‘कपास की काली मिट्टी के नाम से भी पुकारा जाता है। इसमें पोषक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं। कैल्सियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम कार्बोनेट, पोटाश और चूना इसके प्रमुख पोषक तत्त्व हैं। इस मिट्टी में फॉस्फोरिक तत्त्वों की कमी होती है। ग्रीष्म ऋतु में इस मिट्टी में गहरी दरारें पड़ जाती हैं। इस मिट्टी में कपास, गन्ना, मूंगफली, तिलहन, गेहूं, चावल, ज्वार, बाजरा, तम्बाकू, सोयाबीन आदि फसलों का उत्पादन पर्याप्त मात्रा में किया जाता है।

4. लाल मिट्टी- यह मिट्टी लाल, पीले या भूरे रंग की होती है। इसमें लोहांश की मात्रा अधिक होने के कारण उनके ऑक्साइड में बदलने से इस मिट्टी का रंग ईंट के समाने लाल होता है। प्रायद्वीपीय पठार के दक्षिण-पूर्वी भागों पर लगभग 6 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल में इस मिट्टी का विस्तार पाया जाता है। लाल मिट्टी ने काली मिट्टी के क्षेत्र को चारों ओर से घेर रखा है। भारत में इस मिट्टी का विस्तार कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र के दक्षिण-पूर्वी भाग, तमिलनाडु, ओडिशा, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, मेघालय तथा छोटा नागपुर के पठार पर है। लाल मिट्टी में फॉस्फोरिक अम्ल, जैविक तथा नाइट्रोजन पदार्थों की कमी पायी जाती है। इस मिट्टी में मोटे अनाज; जैसे-ज्वार, बाजरा, गेहूँ, दलहन, तिलहन आदि फसलें उगायी जाती हैं।

5. लैटेराइट मिट्टी- उष्ण कटिबन्धीय भारी वर्षा के कारण होने वाली तीव्र निक्षालन की क्रिया के फलस्वरूप इस मिट्टी का निर्माण हुए है। इस मिट्टी का रंग गहरा पीला होता है, जिसमें सिलिका तथा लवणों की मात्रा अधिक होती है। इसमें मोटे कण, कंकड़-पत्थर की अधिकता तथा जीवांशों का अभाव पाया जाता है। भारत में यह मिट्टी 1.26 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल पर विस्तृत है। यह मिट्टी केरल, कर्नाटक, राजमहल की पहाड़ियों, ओडिशी, आन्ध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, पूर्वी बिहार, उत्तर-पूर्व में मेघालय तथा दक्षिण महाराष्ट्र में पायी जाती है। लैटेराइट मिट्टी कम उपजाऊ होती है। यह केवल घास तथा झाड़ियों को पैदा करने के लिए ही उपयुक्त है, परन्तु उर्वरकों की सहायता से इस मिट्टी में चावल, गन्ना, काजू, चाय, कहवा तथा रबड़ की कृषि की जाने लगी है।

6. मरुस्थलीय मिट्टी- मरुस्थलीय क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होने के कारण यहाँ ऊसर, धूर, राँकड़ तथा कल्लर जैसी मिट्टियाँ पायी जाती हैं। यह मिट्टी लवण एवं क्षारीय गुणों से युक्त होती है। इस मिट्टी में सोडियम, कैल्सियम व मैग्नीशियम तत्त्वों की प्रधानता होती है, जिससे यह अनुपजाऊ हो गयी है। इसमें नमी एवं वनस्पति के अंश नहीं पाये जाते हैं। इसमें सिंचाई करके केवल मोटे अनाज ही उगाये जाते हैं। यह मिट्टी सरन्ध्र होती है तथा इसमें बालू के पर्याप्त कण दिखलायी पड़ते हैं। भारत में इस मिट्टी का विस्तार 1.5 लाख वर्ग हेक्टेयर क्षेत्रफल पर मिलता है। मरुस्थलीय मिट्टी पश्चिमी राजस्थान, उत्तरी गुजरात, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दक्षिणी पंजाब एवं हरियाणा राज्यों में पायी जाती है। बालू के मोटे कणों की प्रधानता होने के कारण इस मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता बहुत कम होने के साथ-साथ जीवांश तथा नाइट्रोजन की मात्रा भी कम होती है। आर्थिक दृष्टि से मरुस्थलीय मिट्टियाँ उपयोगी नहीं होतीं, परन्तु इनमें सिंचाई करके मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, मूंग तथा उड़द) उगाये जा सकते हैं।

प्रश्न 2.
‘भू-क्षरण’ या ‘मृदा-अपरदन’ से आप क्या समझते हैं ? इनके कारण तथा निवारण के उपायों पर विस्तार से प्रकाश डालिए।
या
मृदा-अपरदन किसे कहते हैं ? मृदा-अपरदन के चार कारण लिखिए। [2009]
या

मृदा-संरक्षण के दो उपाय बताइए। [2013]
या

मृदा-संरक्षण नियन्त्रण हेतु चार सुझाव सुझाइए। [2016]
या

भूमि-क्षरण के किन्हीं दो कारणों का उल्लेख कीजिए। [2013]
या

भारतीय मिट्टी के संरक्षण हेतु पाँच सुझाव दीजिए। [2011, 17]
या

मृदा संरक्षण से आप क्या समझते हैं। मृदा संरक्षण के कोई छः उपाय बताइए। [2016, 18]
उत्तर :

भू-क्षरण या मृदा-अपरदन

भू-क्षरण या मृदा-अपरदन से अभिप्राय प्राकृतिक साधनों (जल या वर्षा, पवन आदि) के द्वारा भूमि की ऊपरी परत या आवरण के नष्ट होने से है। भूमि-अपरदन से भौतिक हानि के अलावा आर्थिक हानि भी होती है, क्योंकि इससे भूमि की ऊपरी परत में मौजूद उर्वर पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं तथा भूमि अनुर्वर हो जाती है। ऐसा कहा जाता है कि भू-क्षरण वास्तव में मिट्टी के विनाश के लिए रेंगती हुई मृत्यु के समान है।

भू-क्षरण के कारण
मृदा-अपरदन अथवा भू-क्षरण के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

  1. पवन-अपरदन- मरुस्थलों और अर्द्ध-मरुस्थलों में पवन मिट्टी के महीन कणों को उड़ाकर ले जाती . है, जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति नष्ट हो जाती है।
  2. अत्यधिक चराई- पहाड़ी ढालों पर पशुओं और विशेषकर बकरियों द्वारा अत्यधिक चराई के फलस्वरूप मिट्टी का अपरदन होता है।
  3. प्राकृतिक वनस्पति का विनाश- वृक्षों की जड़ें मिट्टी के कणों को बाँधे रहती हैं और उन्हें बह जाने से रोकती हैं। किन्तु जिन स्थानों पर वृक्षों को अन्धाधुन्ध काट दिया जाता है, वहाँ पानी के बहाव की गति तेज हो जाती है और मिट्टी का अपरदन बढ़ जाता है।
  4. मूसलाधार वर्षा- मूसलाधार वर्षा अपने साथ मृदा को बहाकर ले जाती है, जिससे अत्यधिक भूमि-अपरदन होता है।
  5. मिट्टी के प्रकार- जिन क्षेत्रों में मिट्टी ढीली, असंगठित या तीव्र ढाल वाली होती है, वहाँ मिट्टी का अपरदन भी अधिक या शीघ्र होता है। अधिक तीव्र ढालों पर बहता हुआ जल अधिक अपरदन करता
    है, जिसे अवनालिका अपरदन कहते हैं।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि भारत में भू-क्षरण के लिए तीव्र एवं मूसलाधार वर्षा का होना, नदियों में प्रतिवर्ष बाढ़ों का आना, वनों का अधिकाधिक विनाश, खेतों को खाली एवं परती छोड़ देना, तीव्र पवनप्रवाह का होना, कृषि-भूमि पर पशुओं की अनियमित एवं अनियन्त्रित चराई, खेतों की उचित मेड़बन्दी न किया जाना, भूमि का अधिक ढालूपन, जल निकास की उचित व्यवस्था का न होना आदि कारक उत्तरदायी हैं।

निवारण (मृदा संरक्षण) के उपाय
भू-क्षरण की समस्या के निवारण के लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक हैं

1. वृक्षारोपण- 
जिन प्रदेशों में बढ़े अधिक आती हैं, वहाँ जल की गति को नियन्त्रित करने के लिए वृक्षारोपण किया जाना चाहिए। वृक्षों से गिरने वाली पत्तियाँ खेतों में जीवांश की वृद्धि कर उसकी उर्वरा शक्ति को बढ़ाने में भी कारगर सिद्ध होती हैं।

2. नदियों पर बाँधों का निर्माण- 
नदियों पर बाँधों का निर्माण कर दिये जाने से जल-गति नियन्त्रित होती है तथा बाढ़ के प्रकोप में भी कमी आती है। बाढ़ में कमी आने से भू-क्षरण भी स्वत: ही कम होता है।

3. खेतों की मेड़बन्दी करना- 
भू-क्षरण में कमी लाने के लिए खेतों में ऊँची-ऊँची मेड़बन्दी करना अति आवश्यक है।

4. पशुचारण पर नियन्त्रण- 
पशुओं द्वारा खाली या जोती हुई भूमि पर चराई नहीं करानी चाहिए, क्योंकि पशुओं के खुरों से मिट्टी टूटती है। अत: चरागाहों पर ही पशुचारण किया जाना उचित होता है।

5. ढाल के विपरीत दिशा में जुताई करना- 
भू-क्षरण रोकने के लिए भूमि के ढाल की विपरीत दिशा में जुताई करनी चाहिए। इससे निर्मित नालियाँ जल की गति को कम कर भू-क्षरण को रोकने में कारगर सिद्ध हो सकती हैं।

6. जल के निकास की उचित व्यवस्था- 
ढालू खेतों में वर्षा के जल के निकास की उचित व्यवस्था कर भू-क्षरण को कुछ सीमा तक रोका जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ीदार खेतों का ही निर्माण किया जाना चाहिए, अन्यथा भू-क्षरण अत्यधिक होगा।

7. खेतों में हरी खाद वाली फसलें उगाना- 
वर्षा ऋतु में खेतों को खुला नहीं छोड़ना चाहिए, वरन् उनमें हरी खाद वाली फसलें—लैंचा, सनई, मूंग नं० 1 आदि बोनी चाहिए। ऐसा करने से मिट्टी को पोषक तत्त्वों की प्राप्ति होगी तथा भू-क्षरण भी रुक सकेगा।

8: नाली एवं गड्ढों को एक सम बनाना- 
वर्षा के आधिक्य के कारण जल-प्रवाह द्वारा निर्मित गड्ढों एवं नालियों को मिट्टी से भरकर भूमि को समतल बना देना चाहिए। इससे भूमि का कटाव स्वत: ही रुक जाएगा।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार का ध्यान भू-क्षरण की ओर गया है तथा इस समस्या के निवारण हेतु सन् 1953 ई० में केन्द्रीय भू-क्षरण बोर्ड की स्थापना की गयी है, जिसका मुख्य कार्य सरकार को इस
समस्या के सम्बन्ध में सुझाव देना है। वर्तमान समय तक 180 लाख हेक्टेयर कृषि- भूमि का संरक्षण किया जा चुका है तथा 110 लाख हेक्टेयर भूमि पर वृक्षारोपण का कार्य पूरा किया जा चुका है।

प्रश्न 3.
भारत में भूमि उपयोग की विभिन्न श्रेणियों की व्याख्या कीजिए।
या
किसी देश में भूमि के उपयोग के बारे में जानने की आवश्यकता क्यों पड़ती है ? भारत में विभिन्न प्रकार की भूमि के उपयोग पर प्रकाश डालिए।
या
भारत में भूमि उपयोग का प्रारूप बताइए। [2013]
या
भूमि उपयोग से आप क्या समझते हैं ? भारत में भूमि उपयोग के प्रारूप पर प्रकाश डालिए। [2010]
उत्तर :

भूमि-उपयोग

किसी भी देश के आर्थिक विकास में संसाधनों का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। संसाधन दो प्रकार के होते हैं–प्राकृतिक तथा मानव द्वारा निर्मित। प्राकृतिक संसाधनों में भूमि तथा खनिज, जल, वन तथा पशुधन आदि प्रमुख हैं। पृथ्वी पर प्राकृतिक संसाधन सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं, जब कि जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है। घने बसे देशों; जैसे-भारत में भूमि संसाधन दुर्लभ होते जा रहे हैं।

बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए आवास, अन्न तथा वनों की लकड़ी उपलब्ध कराने के लिए भूमि संसाधन का विवेकपूर्ण उपयोग अति आवश्यक हो गया है। अतः यह जरूरी है कि बंजर तथा बेकार भूमि का पुनरुद्धार, राष्ट्रीय उद्यानों तथा अभयारण्यों की स्थापना, वनारोपण उपायों द्वारा भूमि संसाधने का संरक्षण किया जाए जिससे भावी पीढ़ियों के लिए यह सुरक्षित रह सके। भूमि उपयोग से यही अभिप्राय है कि हम भूमि संसाधन का विवेकपूर्ण दोहन करें, क्योंकि भूमि संसाधन की उपयोगिता पर ही किसी देश की आर्थिक समृद्धि निर्भर करती है। अफगानिस्तान की आर्थिक दुर्दशा का कारण भूमि-संसाधन का प्रयोग में न आना ही है। इसके विपरीत भारत 108 करोड़ से भी अधिक देशवासियों को अन्न देकर भी अन्न बचा रहा है।

भूमि-उपयोग के ज्ञान की आवश्यकता

भूमि किसी भी देश का सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन है, क्योंकि भूमि पर ही कृषि, पशुपालन, खनन, उद्योग आदि व्यवसाय आधारित हैं। भूमि से ही किसी भी देश की जनसंख्या का पोषण होता है। मानव-मात्र की समस्त प्राथमिक आवश्यकताएँ (भोजन, वस्त्र, आवास) भूमि से ही पूरी होती हैं। प्रत्येक देश में उपलब्ध भूमि संसाधनों की प्रकृति तथा स्वरूप भिन्न-भिन्न होते हैं। तदनुसार वहाँ भूमि का उपयोग किया जाता है। किसी भी देश के भूमि-उपयोग के बारे में जानना निम्नलिखित कारणों से आवश्यक होता है

  • इससे कुल प्राप्त भूमि संसाधनों के उचित उपयोग को नियोजित किया जा सकता है।
  • भूमि-उपयोग प्रारूप के ज्ञान से भूमि की विविध समस्याओं (जैसे-अपरदन, मरुस्थलीकरण, अनुर्वरता आदि) को नियन्त्रित किया जा सकता है।
  • बंजर भूमि तथा परती भूमि का उचित उपयोग किया जा सकता है।
  • आवश्यकतानुसार भूमि के उपयोग में परिवर्तन किया जा सकता है।

भारत में भूमि का उपयोग

भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र 3287.3 लाख हेक्टेयर में से 92.2% भूमि का उपयोग होता है। इसमें 19.3% भाग वनों से आच्छादित है। भारतीय सांख्यिकीय रूपरेखा में देश की भूमि के उपयोग को निम्नवत् प्रदर्शित किया गया है–

1. कृषि-भूमि- 
नवपाषाण काल के भारतीयों ने देश में लगभग 14 हजार हेक्टेयर भूमि पर कृषि- कार्य आरम्भ कर दिया, जो वर्ष 1993-94 तक 1,86,420 हजार हेक्टेयर तक पहुंच चुका था। इस प्रकार देश की लगभग आधी से अधिक भूमि कृषि के अन्तर्गत आ चुकी थी।

2. वन-भूमि- 
भारत के कुल क्षेत्रफल के 68,830 हजार हेक्टेयर भूमि (1995-96) अर्थात् 21% क्षेत्र वनों के अन्तर्गत है। वन वर्षा के जल को मिट्टी के अन्दर रिसने में सहायक होते हैं। इससे जल का संरक्षण होता है। वन मृदा का भी संरक्षण करते हैं, जिससे बाढ़ों पर नियन्त्रण होता है।

3. चरागाह भूमि- 
हमारा देश कृषि प्रधान देश है और यहाँ पशुपालन कृषि के सहायक उद्योग के रूप में प्रचलित है। अधिकांशतः पशुओं को चारे की फसलों; पुआल, भूसा आदि; पर पाला जाता है। वर्ष 1993-94 में हमारे देश में 11,176 हजार हेक्टेयर भूमि अर्थात् देश के कुल क्षेत्र के लगभग 4% भाग पर स्थायी चरागाह थे।

4. बंजर भूमि- 
वह भूमि जिस पर कोई उपज पैदा नहीं होती, बंजर भूमि कहलाती है। अन्धाधुन्ध वृक्ष काटने, स्थानान्तरी कृषि तथा अत्यधिक नहरीय सिंचाई द्वारा भूमि बंजर हो जाती है। औद्योगिक कूड़ेकचरे को भूमि पर फेंकने से भी भूमि बंजर हो जाती है। देश की लगभग 24% भूमि बंजर है, जिसके अन्तर्गत पर्वतीय, पठारी, हिमाच्छादित, मरुस्थलीय, दलदली तथा अन्य भूमि जो कृषि के लिए अनुपयुक्त है, सम्मिलित हैं।

5. परती भूमि- 
परती भूमि वह भूमि होती है, जिस पर प्रत्येक वर्ष खेती नहीं की जाती, अपितु दो या तीन वर्षों में एक बार फसल उगायी जाती है। यह सीमान्त भूमि होती है, जिसे उर्वरता बढ़ाने के लिए खाली छोड़ दिया जाता है। वर्तमान समय में देश का लगभग 7% क्षेत्र इस प्रकार की भूमि के अन्तर्गत

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय मिट्टियों की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
भारतीय संसाधनों में मिट्टियों का भूमि संसाधन के रूप में बड़ा महत्त्व है, क्योंकि इन्हीं पर देश का सम्पूर्ण कृषि उत्पादन एवं जैव-जगत् निर्भर करता है। अमेरिकी भूमि विशेषज्ञ डॉ० बेनेट के अनुसार, ‘मिट्टी भू-पृष्ठ पर मिलने वाले असंगठित पदार्थों की वह ऊपरी परत है, जो मूल शैलों, जलवायु एवं जैव क्रिया से बनती है।” भारतीय मिट्टियों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • पुरानी एवं परिपक्व- रचना की दृष्टि से अधिकांश भारतीय मिट्टियाँ बहुत पुरानी और पूर्णत: परिपक्व हैं।
  • प्राचीन जलोढ़- भारत के मैदानी भागों की अधिकांश मिट्टियाँ प्राचीन जलोढ़ हैं, जो न केवल शैलों के विखण्डन से बनी हैं, वरन् उनके निर्माण में जलवायु सम्बन्धी कारकों का भी प्रमुख हाथ रहा है।
  • मिट्टियों में नाइट्रोजन, जीवांश, वनस्पति अंश और खनिज लवणों की कमी- भारत की प्रायः सभी मिट्टियों में इन उपयोगी तत्त्वों की कमी पायी जाती है।
  • ऊँचे तापमान- उपोष्ण कटिबन्धीय भारत में मिट्टियों के तापमान प्राय: ऊँचे पाये जाते हैं। इससे शैलों के टूटते ही उनका रासायनिक विघटन शीघ्र आरम्भ हो जाता है।
  • हल्का आवरण- पहाड़ी एवं पठारी भागों में मिट्टी का आवरण हल्का और फैला हुआ होता है, जबकि मैदानी और डेल्टाई क्षेत्रों में यह गहरों और संगठित होता है।

प्रश्न 2.
काली मिट्टी (रेगुर) तथा लैटेराइट मिट्टी में दो अन्तर लिखिए।
या
काली मिट्टी तथा लैटेराइट मिट्टी में अन्तर बताइए।
उत्तर :
काली मिट्टी तथा लैटेराइट मिट्टी में निम्नलिखित प्रमुख अन्तर हैं
UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 (Section 3) 2
UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 (Section 3) 3
प्रश्न 3.
खादर और बाँगर में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2011, 12, 16]
उत्तर :
बाँगर मिट्टी तथा खादर मिट्टी में निम्नलिखित प्रमुख अन्तर हैं
UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 (Section 3) 4
प्रश्न 4.
जलोढ़ मिट्टी व लैटेराइट मिट्टी में अन्तर लिखिए।
उत्तर :
जलोढ़ मिट्टी व लैटेराइट मिट्टी में निम्नलिखित प्रमुख अन्तर हैं
UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 (Section 3) 5
प्रश्न 5.
बंजर भूमि किसे कहते हैं ? मनुष्य बंजर भूमि का क्षेत्र बढ़ाने में किस प्रकार सहायक है ? दो बिन्दु दीजिए।
उत्तर :
वह भूमि जिस पर कोई उपज पैदा नहीं होती, ‘बंजर भूमि’ कहलाती है। प्रायः उच्च पहाड़ी. चट्टानी, रेतीली तथा दलदली भूमियाँ बंजर होती हैं। बंजर भूमि के क्षेत्रफल की वृद्धि में मनुष्य की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसके दो बिन्दु अग्रलिखित हैं

  • अन्धाधुन्ध वृक्ष काटने, स्थानान्तरी कृषि तथा अत्यधिक नहरी सिंचाई द्वारा भूमि बंजर हो जाती है।
  • औद्योगिक कूड़े-कचरे को भूमि पर फेंकने से भी वह भूमि बंजर हो जाती है।

प्रश्न 6.
भूमि संसाधन का क्या तात्पर्य है? भूमि संसाधन के कोई तीन महत्त्व लिखिए। [2011]
या
भूमि से आप क्या समझते हैं ? [2010]
उत्तर :
किसी देश या प्रदेश के अन्तर्गत सम्मिलित भूमि को भूमि संसाधन कहते हैं। इसके अन्तर्गत कृष्य भूमि, चरागाह भूमि, कृषि-योग्य भूमि, बेकार भूमि, वन भूमि, बंजर भूमि, परती भूमि आदि सम्मिलित की जाती हैं। मनुष्य इस उपलब्ध भूमि पर विविध प्रकार से क्रिया-कलाप करता है। कृषि, पशुपालन, वनोद्योग, खनन, निर्माण उद्योग, परिवहन, व्यापार, संचार आदि सभी का सम्बन्ध भूमि संसाधन से होता है। भूमि संसाधन जल-संसाधनों को आधार प्रदान करते हैं तथा मनुष्य विभिन्न रूपों में इनका उपयोग अपने क्रिया-कलापों की पूर्ति में करता है।

प्रश्न 7.
हमारे देश में वनों के क्षेत्र को बढ़ाना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर :
वन किसी भी राष्ट्र की प्राकृतिक सम्पदा होते हैं। देश के आर्थिक विकास तथा पारिस्थितिक सन्तुलन के लिए यह आवश्यक है कि देश में कम-से-कम एक-तिहाई क्षेत्र पर वनों का विस्तार हो। भारत में 20% से कम क्षेत्र पर ही वन उगे हुए हैं। देश की तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वनों का विस्तार करना आवश्यक है। वन प्राकृतिक सौन्दर्य में वृद्धि तो करते ही हैं, जीव-जन्तुओं और पक्षियों के अभयारण्य भी होते हैं। ये पारिस्थितिक सन्तुलन बनाने में भी महत्त्वपूर्ण होते हैं। वन जलवायु के नियन्त्रक भी कहे जाते हैं तथा वर्षा कराने में भी इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। अतएव इनके क्षेत्र का विस्तार करना अत्यावश्यक है।

प्रश्न 8.
भारतीय काली मिट्टी को कपास की मिट्टी क्यों कहा जाता है ?
उत्तर :
इस मिट्टी का निर्माण ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित लावा की शैलों के विखण्डन के फलस्वरूप हुआ है। इस मिट्टी का रंग काला होता है, जिस कारण इसे ‘काली मिट्टी’ अथवा ‘रेगुर मिट्टी’ भी कहा जाता है। इस मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती है। इसमें लोहांश, मैग्नीशियम, चूना, ऐलुमिनियम तथा जीवांशों की मात्रा अधिक पायी जाती है। इस मिट्टी का विस्तार लगभग 5 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल पर महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा तथा दक्षिणी मध्य प्रदेश के पठारी भागों में है। इसके अतिरिक्त दक्षिण में गोदावरी तथा कृष्णा नदियों की घाटियों में भी यह मिट्टी पायी जाती है। इस मिट्टी में कपास का भारी मात्रा में उत्पादन होने के कारण इसे ‘कपास की काली मिट्टी’ के नाम से भी पुकारा जाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐसे दो राज्यों के नाम लिखिए जहाँ काली मिट्टी पायी जाती है।
उत्तर :
महाराष्ट्र तथा गुजरात ऐसे दो राज्य हैं, जहाँ काली मिट्टी बहुतायत से पायी जाती है।

प्रश्न 2.
लैटेराइट मिट्टियाँ कहाँ पायी जाती हैं ?
उत्तर :
भारत में पश्चिमी घाट, छोटा नागपुर के पठार, मेघालय तथा तमिलनाडु की पहाड़ियों, केरल तथा पूर्वी घाट के क्षेत्रों में लैटेराइट मिट्टियाँ पायी जाती हैं।

प्रश्न 3.
मरुस्थलीय मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण लिखिए।
उत्तर :
मरुस्थलीय मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण निम्नलिखित हैं|

  • मरुस्थलीय मिट्टी में आर्द्रता धारण करने की क्षमता कम होती है।
  • इनमें नाइट्रोजन तथा जीवांश की कमी होती है।

प्रश्न 4.
‘बाँगर’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
बाँगर एक प्रकार की मिट्टी है, जो उत्तरी मैदान में नदियों की पुरानी काँप द्वारा निर्मित होती है।

प्रश्न 5.
लैटेराइट मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण लिखिए।
उत्तर :
लैटेराइट मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण निम्नलिखित हैं

  • लैटेराइट मिट्टी सिलिका तथा लवण (नमक) के कणों से युक्त होती है, जिसमें मोटे-मोटे कण तथा कंकड़-पत्थर का बाहुल्य होता है।
  • शुष्क मौसम में लैटेराइट मिट्टी ईंट की भाँति सख्त हो जाती है। इस मिट्टी में कैल्सियम, मैग्नीशियम तथा नाइट्रोजन की कमी तथा पोटाश का अभाव होता है।

प्रश्न 6.
लाल-पीली मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण लिखिए।
उत्तर :
लाल-पीली मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण निम्नलिखित हैं

  • प्राचीन क्रिस्टलीय शैलों के विखण्डन से बनने के कारण ये छिद्रयुक्त होती हैं; अत: इनमें जलधारण की क्षमता कम होती है।
  • इनमें फॉस्फोरिक अम्ल, जैविक तथा नाइट्रोजन पदार्थ (ह्यूमस) की कमी होती है।

प्रश्न 7.
जलोढ़ मिट्टी की किन्हीं दो प्रमुख विशेषताओं को लिखिए। [2016, 17]
उत्तर :
जलोढ़ मिट्टी की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • इसके कण सूक्ष्म होते हैं और इसमें जल देर तक ठहर सकता है।
  • इसमें पोटाश तथा चूने की पर्याप्त मात्रा होती है।

प्रश्न 8.
‘भू-क्षरण’ अथवा ‘भू-अपरदन’ के प्रमुख कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
‘भू-क्षरण’ अथवा ‘भू-अपरदन’ के प्रमुख कारक हैं—

  • पवन,
  • अत्यधिक पशुचारण,
  • मूसलाधार वृष्टि तथा
  • प्राकृतिक वनस्पति का विनाश।

प्रश्न 9.
‘भू-क्षरण के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
सामान्यतया भू-क्षरण निम्नलिखित दो प्रकार का होता है

  • चादरी भू-क्षरण-जब पवन अथवा जल के द्वारा भूमि की ऊपरी कोमल सतह काटकर उड़ा दी जाती है अथवा बहा दी जाती है, तो उसे समतल अथवा चादरी भू-क्षरण कहते हैं।
  • नालीदार भू-क्षरण–तीव्र गति से बहता हुआ जल जब भूमि में गहरी-गहरी नालियाँ बना देता है, तो उसे गहन अथवा नालीदार भू-क्षरण कहते हैं।

प्रश्न 10.
चाय की खेती के लिए उपयोगी मिट्टी कहाँ पायी जाती है ?
उत्तर :
मध्य हिमालय के पर्वतीय ढालों पर मिट्टी में वनस्पति अंशों की अधिकता होती है। इसमें लोहे की मात्रा अधिक तथा चूने का अंश कम होता है। यह मिट्टी चाय के उत्पादन के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है। काँगड़ा, देहरादून, दार्जिलिंग तथा असोम के पहाड़ी ढालों पर यह मिट्टी अधिकता से पायी जाती है।

प्रश्न 11.
डेल्टाई काँप मिट्टी कहाँ पायी जाती है ?
उत्तर :
डेल्टाई काँप मिट्टी नदियों के डेल्टा में पायी जाती है, जहाँ नदियाँ काँप मिट्टी का जमाव करती रहती हैं। यह मिट्टी अत्यधिक उपजाऊ होती है।

प्रश्न 12.
भारत की मिट्टी में किन तत्त्वों की कमी पायी जाती है ?
उत्तर :
भारत की मिट्टी में नाइट्रोजन, जीवांश, वनस्पति अंश और खनिज लवणों की कमी पायी जाती है।

प्रश्न 13.
समुचित भूमि उपयोग न करने के कौन-से दो दृष्परिणाम हो सकते हैं ?
उत्तर :
समुचित भूमि का उपयोग न करने के निम्नलिखित दो दुष्परिणाम हो सकते हैं|

  • कृषि-योग्य भूमि बंजर भूमि में बदल सकती है।
  • भूमि की उत्पादकता में कमी हो सकती है।

प्रश्न 14.
भारत में कहवा उत्पन्न करने वाले दो राज्यों के नाम लिखिए।
या
भारत में कहवा उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्यों के नाम बताइए।
उत्तर :
उर्वरकों की सहायता से लैटेराइट मिट्टी में कहवा की खेती कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र के दक्षिणी भागों, आन्ध्र प्रदेश आदि राज्यों में की जाती है।

प्रश्न 15.
चाय की खेती के लिए दो उपयोगी भौगोलिक दशाओं को लिखिए।
उत्तर :
चाय की खेती के लिए उपयोगी दो भौगोलिक दशाएँ निम्नलिखित हैं

  • मिट्टी में वनस्पति के अंशों व लोहे के अंशों की अधिकता तथा चूने के अंश की न्यूनता।
  • आग्नेय शैलों के विखण्डन से निर्मित नवीन, पथरीली, दलदली तथा प्रवेश्य मिट्टियाँ।

प्रश्न 16.
कपास की खेती के लिए सर्वोत्तम मिट्टी कौन-सी है ? उसकी एक विशेषता को लिखिए। [2015]
उत्तर :
कपास की खेती के लिए सर्वोत्तम मिट्टी ‘काली मिट्टी’ अथवा ‘रेगुर मिट्टी’ है। इस मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता पर्याप्त होती है तथा इसमें पोषक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं।

प्रश्न 17.
लाल मिट्टी भारत में सबसे ज्यादा कहाँ पायी जाती है ?
उत्तर :
भारत में लाल मिट्टी कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के दक्षिण-पूर्वी भागों, तमिलनाडु, मेघालय, ओडिशा में पायी जाती है।

प्रश्न 18.
मिट्टी का निर्माण करने वाले दो कारकों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  • वायु तथा
  • जल

प्रश्न 19.
उत्तर प्रदेश के अधिकतर भागों में किस प्रकार की मिट्टी पायी जाती है ? [2010]
उत्तर :
उत्तर प्रदेश के अधिकतर भागों में जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है।

‘बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. कौन-सी मिट्टी वर्षा से चिपचिपी हो जाती है? ‘
(क) लाल
(ख) काली
(ग) जलोढ़
(घ) पर्वतीय

2. काली मिट्टी कौन-सी फसल के लिए उपयुक्त है? [2013]
(क) गेहूँ
(ख) चना
(ग) कपास
(घ) गन्ना

3. लैटेराइट मिट्टी किस राज्य में अधिक मिलती है?
(क) कर्नाटक में
(ख) असोम में
(ग) मेघालय में
(घ) उत्तर प्रदेश में

4. जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है [2012]
(क) पर्वतीय क्षेत्रों में
(ख) मैदानी क्षेत्रों में
(ग) पठारी क्षेत्रों में
(घ) रेगिस्तानी क्षेत्रों में

5. लैटेराइट मिट्टी का रंग होता है
(क) काला
(ख) पीला
(घ) लाल

6. निम्नलिखित में से कौन-सी मिट्टी कपास उत्पादन के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है? [2010]
या
कपास की खेती के लिए सबसे उत्तम मिट्टी है [2012, 13, 14]
(क) जलोढ़ मिट्टी
(ख) लाल मिट्टी
(ग) काली मिट्टी
(घ) लैटेराइट मिट्टी

7. जलोढ़ मिट्टी का निर्माण मुख्यतः किसके द्वारा होता है? [2014, 16]
(क) ज्वालामुखी द्वारा
(ख) पवन द्वारा
(ग) हिमानी द्वारा
(घ) नदियों द्वारा

8. भारत के किस राज्य में काली मिट्टी का विस्तार सर्वाधिक है?
(क) महाराष्ट्र
(ख) उत्तर प्रदेश
(ग) असोम
(घ) राजस्थान

9. वन हमारी सहायता करते हैं
(क) मिट्टी का कटाव रोककर
(ख) बाढ़ रोककर
(ग) वर्षा की मात्रा बढ़ाकर
(घ) इन सभी प्रकार से

10. जलोढ़ मिट्टी किस फसल की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है? [2011]
(क) चाय
(ख) रबड़
(ग) कपास
(घ) गेहूँ

11. भारत की सर्वाधिक उपजाऊ मिट्टी है [2016]
(क) जलोढ़ मिट्टी
(ख) लाल मिट्टी
(ग) लैटेराइट मिट्टी
(घ) पर्वतीय मिट्टी

12. निम्न में से कौन-सी मिट्टी चाय की खेती के लिए उपयुक्त है? [2017]
(क) पर्वतीय मिट्टी
(ख) काली मिट्टी
(ग) जलोढ़ मिट्टी
(घ) लाल मिट्टी

13. काली मिट्टी का निर्माण होता है [2017]
(क) वायु से
(ख) ग्लेशियरों से
(ग) ज्वालामुखी विस्फोट से
(घ) नदियों से

उत्तरमाला

1. (ख), 2. (ग), 3. (ग), 4. (ख), 5. (ख), 6. (ग), 7. (घ), 8. (क), 9. (घ), 10. (घ), 11. (क), 12. (क), 13. (ग)

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