भू चुम्बकत्व क्या है | पृथ्वी के चुम्बकत्व की पुष्टि

भू चुम्बकत्व की परिभाषा क्या है – Bhu Chumbakatva Kya Hai

चुम्बकत्व वह प्रक्रिया है, जिसमें एक वस्तु दूसरी वस्तु पर आकर्षण या प्रतिकर्षण बल लगाती है। सभी वस्तुएँ न्यूनाधिक मात्रा में चुम्बकीय क्षेत्र की उपस्थिति से प्रभावित होती हैं। पृथ्वी भी चुम्बकीय क्षेत्र प्रदर्शित करती है। इसे ‘भू-चुम्बकत्व’ कहते हैं।

पृथ्वी एक विशाल चुम्बक है, जिसका अक्ष लगभग पृथ्वी के घूर्णन अक्ष पर पड़ता है। यह मुख्यत: ‘द्वि-ध्रुवीय’ है और पृथ्वी के आंतरिक क्रोड से उत्पन्न होता है।

वहीं, शीतल ज्वालामुखी लावा, जमी हुई तलछट और प्राचीन ईंट प्रेरित चुंबकत्व का अध्ययन ‘पुरा-चुंबकत्व’ कहलाता है। ‘पुरा-चुंबकत्व’ शताब्दियों, सहस्त्राब्दियों और युगों पूर्व के भू-चुंबकीय परिवर्तनों की जानकारी प्रदान करता है।

इस रूप में भू-चुम्बकत्व का संबंध पृथ्वी के वर्तमान चुंबकीय क्षेत्र के अध्ययन से है, जबकि पुरा-चुंबकत्व का संबंध पृथ्वी के प्राचीन चुम्बकीय क्रियाओं के अध्ययन से है। यह चट्टानों, ठण्डे ज्वालामुखी लावा आदि में निहित चुम्बकीय प्रेरण को इंगित करता है।

पृथ्वी के चुम्बकत्व की पुष्टि:

पृथ्वी के चुम्बकीय व्यवहार की पुष्टि निम्न प्रयोगों से हुई है:-

  •  स्वतन्त्रता पूर्वक लटकी हुई चुम्बकीय सुई सदैव उत्तर-दक्षिण दिशा में ठहरती है : जब चुम्बकीय सुई को किसी धागे से इस प्रकार स्वतंत्रता पूर्वक लटकाया जाए की यह घूम सके तो चुम्बक सुई का उत्तरी ध्रुव भौगोलिक उत्तर दिशा में तथा दक्षिणी ध्रुव भौगोलिक दक्षिण दिशा में ठहरता है। इससे यह सिद्ध होता है की पृथ्वी में दक्षिण से उत्तर की तरफ कोई चुम्बकीय क्षेत्र उपस्थित है।
  • पृथ्वी में गाडी गयी लोहे की छड का चुम्बक बन जाना : जब किसी लोहे की छड को पृथ्वी में उत्तर दक्षिण दिशा में गाड़ा जाता है तो यह लोहे की छड कुछ समय बाद चुम्बक की भांति व्यवहार करती है , यह चुम्बकीय गुण कहा से आया ? , ऐसा तभी संभव है जब पृथ्वी एक शक्तिशाली चुम्बक हो और लोहे की छड जब इसके संपर्क में आती है तो इसमें कुछ चुम्बकीय गुण आ जाते है।
  • दण्ड चुम्बक के लिए बल रेखाएं खीचने पर उदासीन बिन्दु का प्राप्त होना : जब किसी दण्ड चुम्बक को इस प्रकार रखा जाए की इसका उत्तरी ध्रुव भोगोलिक उत्तर की तरफ हो , इस स्थिति में चुम्बक की चुम्बकीय बल रेखाएं खीचने पर निरक्ष बिन्दु पर दोनों तरफ उदासीन बिन्दु प्राप्त होता है।
  • इसी प्रकार यदि चुम्बक को इस प्रकार रखा जाए की चुंबक का उत्तरी ध्रुव भौगोलिक दक्षिण की तरफ हो तो इस स्थिति में चुम्बकीय रेखायें खींचने पर अक्षीय बिन्दु पर दोनों तरफ उदासीन बिंदु प्राप्त होता है।  ऐसा तभी संभव है जब पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र , चुम्बक के चुम्बकीय क्षेत्र को उदासीन कर दे और उदासीन बिन्दु प्राप्त हो।
  • स्वतंत्रता पूर्वक लटकायी गयी चुम्बकीय सुई भिन्न भिन्न स्थानों पर अलग व्यवहार करती है , ऐसा इसलिए हो सकता है की पृथ्वी का भू चुम्बकत्व अलग अलग स्थानों पर अलग अलग होताहै।

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