UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 1 भोजस्यौदार्यम्

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 1 भोजस्यौदार्यम्

अवतरणों का ससदर्भ अनुवाद

(1) ततः कदाचिद् …………………………………… पुनरुद्धमुचितः।।
अये लाजानुच्चैः ……………………………….. पुनरुद्धर्तुमुचितः। [2010, 15]

[ कौपीनावशेषो (कौपीन + अवशेषः) = जिसके पास एकमात्र लँगोटी ही बच रही है (अति दरिद्र)। हर्षाभूणि (हर्ष + अश्रूणि) = हर्ष के आँसू। लाजानुच्चैः (लाजान् + उच्चैः) = खीलें (लेने का) उच्च (शब्द)। सुपिहितवती = अच्छी तरह बन्द कर दिये। दीनवदना = दीन मुख वाली (अर्थात् जिसके मुख से ही दीनता प्रकट हो रही है वह)। क्षीणोपाये (क्षीण + उपाये) = हीन साधन वाले (धनहीन) पर। दृशावश्रुबहुले (दृशौ + अश्रुबहुले) = आँसुओं से भरी दृष्टि। यदकृत (यत् + अकृत) = जो की (कर डाली)। (अकृत’ कृ धातु के परस्मैपद के सामान्यभूत या लङ् के प्रथम पुरुष एकवचन का रूप है)। तदन्तःशल्यम् (तत् + अन्तःशल्यम्) = हृदय में गड़े उस काँटे को। उद्धर्तुम् उचितः = निकालने में समर्थ।].

सन्दर्भ-यह गद्यखण्ड हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘भोजस्यौदार्यम्’ पाठ से उधृत है।
[ विशेष—इस पाठ के सभी अवतरणों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]
अनुवाद-इसके बाद तभी द्वारपाल ने आकर महाराज भोज से कहा, “देव, केवल लँगोटी पहने (अति दरिद्र) एक विद्वान् द्वार पर खड़े हैं।” (राजा बोले)-“प्रवेश कराओ। तब प्रविष्ट होकर उस कवि ने भोज को देखकर ‘आज मेरी दरिद्रता का नाश हो जाएगा यह मानकर (विश्वास कर) प्रसन्न हो खुशी के आँसू बहाये। राजा ने उसे देखकर कहा—“हे कवि, रोते क्यों हो ?” तब कवि बोला, “राजन् मेरे घर की दशा सुनिए’’
“(घर से बाहर) रास्ते पर (खील बेचने वाले के द्वारा) ऊँचे स्वर से ‘अरे, खीले लो’ की आवाज सुनकर मेरी दीन मुख वाली पत्नी ने बच्चों के कानों को सँभालकर बन्द कर दिया (जिससे कि वे सुनकर खोलें दिलवाने का हठ न करें) और मुझे दरिद्र पर जो आँसुओं से भरी दृष्टि डाली, वह मेरे हृदय में काँटे की तरह गड़ गयी, जिसे निकालने में आप ही समर्थ हैं।”

(2) राजा शिव, शिव ……………………………… भिक्षाटनम् ।।

[ उदीरयन् = कहते हुए। शिवसन्निधौ = शिवजी के समीप दानववैरिणा = भगवान विष्णु द्वारा। गिरिजयाप्यर्द्धम् (गिरिजया + अपि + अर्द्धम्) = पार्वती जी द्वारा भी आधा। शिवस्याहतम् (शिवस्य + आहृतम्) = शिवजी का ले लिया। देवेत्थम् (देव + इत्थम्) = हे देव! इस। पुरहराभावे (पुरहर + अभावे) = त्रिपुरारि शिव के अभाव में। समुन्मीलति = प्रकाशित करती है (सुशोभित करती है)। गङ्गासागरम् = गंगा सागर को। अम्बरं शशिकला = चन्द्रकला आकाश को। नागाधिपः = नागों के राजा (शेषनाग)। क्षपातलम् = पृथ्वीतल को (यहाँ, पृथ्वी के नीचे पाताल को)। सर्वज्ञत्वमधीश्वरत्वमगमत् (सर्वज्ञत्वम् + अधीश्वरत्वम् + अगमत्) = सर्वज्ञता और ईश्वरत्व
(शक्तिमत्ता, प्रभुता) प्राप्त हुई। भिक्षाटनम् = भिक्षा के लिए घूमते फिरना। ]

अनुवाद–राजा ने ‘शिव शिव’ कहते हुए (अर्थात् अत्यधिक करुणा प्रकट करते हुए) प्रत्येक अक्षर के लिए एक-एक लाख (रुपये) देकर कहा, “तुरन्त घर जाओ। तुम्हारी पत्नी दु:खी हो रही होगी।” दूसरे दिन (अन्य किसी दिन) भोज शिवजी को प्रणाम करने शिवालय गये। वहाँ किसी ब्राह्मण ने शंकर के समीप जाकर कहा-
भगवान् शंकर की आधी देह दानव वैरी अर्थात् भगवान् विष्णु ने ले ली, आधी पार्वती जी ने। (तब) हे देव ? इस पृथ्वीतल पर गंगा भगवान् शिव के देहरहित हो जाने पर सागर को सुशोभित करने लगीं (सागर को चली गयीं), चन्द्रकला आकाश को, शेषनाग पृथ्वीतल से नीचे (पाताल को), सर्वज्ञता और ईश्वरता (शक्तिमत्ता या प्रभुता) आपको प्राप्त हुई और भीख माँगते फिरना मुझे (इस प्रकार भगवान् शंकर के समस्त गुण विभिन्न स्थानों पर बँट गये)।

(3) राजा तुष्टः ……………………….. लक्ष्मीनुद्यमिनामिव ।।
विरलविरला: ………………………………………… लक्ष्मीनुद्यमिनामिव। [ 2013]

[ स्थूलास्ताराः = बड़े तारे। विरलविरलाः = थोड़े-थोड़े। कलाविव (कलो + इव) = जैसे कलियुग में। प्रसन्नमभून्नभः (प्रसन्नम् + अभूत् + नभः) = आकाश निर्मल हो गया। ध्वान्तम् – अन्धकार। चित्तात्सतामिव (चित्तात् + सताम् + इव) = जैसे सज्जनों के चित्त से। लक्ष्मीनुद्यमिनामिव (लक्ष्मीः + अनुद्यमिनाम् + इव) = उद्यमरहित (आलसी या पुरुषार्थहीन) लोगों की सम्पदा के समान।]

अनुवाद–राजा ने सन्तुष्ट होकर उसे प्रत्येक अक्षरे पर एक-एक लाख (रुपये) दिये। अन्य किसी दिन राजा ने पास में स्थित सीता (नाम की किसी कवयित्री) से कहा, “देवि ! प्रभात का वर्णन करो।’ सीता ने कहा-(इस प्रभात बेला में) बड़े तारे कलियुग में सज्जनों के समान बहुत कम हो गये हैं, मुनियों के मन (या अन्त:करण) के सदृश आकाश सर्वत्र निर्मल (स्वच्छ) हो गया है, अन्धकार सज्जनों के चित्त से दुर्जनों (के कुकृत्यों की स्मृति) के समान दूर हो गया है और रात्रि उद्योगरहित (पुरुषार्थहीन) व्यक्ति की समृद्धि के समान शीघ्र समाप्त होती जा रही है (अर्थात् जो व्यक्ति धन कमाने में उद्योग न करके पहले से जमा धन ही व्यय किये जाता है, जिस प्रकार उसकी समृद्धि शीघ्रतापूर्वक घटती जाती है, उसी प्रकार रात भी शीघ्रता से समाप्त होती जा रही है)।

(4) राजा तस्यै लक्षं …………………………………………….. लक्षं दद।
अभूत् प्राची ………………………………………… द्रविणरहितानामिव गुणाः। [2011, 14]

[ प्राची = पूर्व दिशा। पिङ्गा = पीली। रसपतिरिव (रसपतिः + इव) = पारे के समान। गतच्छायश्चन्द्रः = चन्द्रमा कान्तिमान हो गया। ग्राम्यसदसि = आँवारों की सभा में। द्रविणरहितानाम् इव = धनहीनों के समान।]

अनुवाद-राजा ने उसे एक लाख (रुपये) देकर कालिदास से कहा, “मित्र तुम भी प्रभात का वर्णन करो।’ तब कालिदास ने कहा-
पूर्व दिशा उसी प्रकार पीली हो गयी है जैसे सुवर्ण के संयोग से पारा (पीला हो जाता है), चन्द्रमा उसी प्रकार कान्तिहीन ((फीका) दिख पड़ता है जैसे गॅवारों (मूर्खा) की सभा में विद्वान्। तारे क्षणभर में ((सहसा) उसी प्रकार क्षीण हो गये हैं जैसे उद्योगरहित राजागण की राज्यश्री (क्षीण हो जाती है) और दीपक उसी प्रकार शोभा नहीं पाते जैसे धनहीन व्यक्तियों के गुण। (निर्धन व्यक्ति चाहे कितना भी गुणी हो, समाज में उसके गुणों का उचित मूल्यांकन या आदर नहीं होता और धनी व्यक्ति गुणहीन हो, तो भी समाज उसे आदर देता है।)
राजा ने अति सन्तुष्ट होकर उसे प्रत्येक अक्षर पर एक लाख (रुपये) दे दिये।

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